अंधविश्वास उन्मूलन विषय पर लिखी मेरी दर्जन-भर से अधिक पुस्तकें हैं। पाठकों द्वारा पसंद किये जाने और प्रोत्साहन मिलने की वजह से उनके संस्करण भी दर्जन-भर से अधिक हो चुके हैं। इस विषय पर मैं पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लिखता आ रहा हूँ । भाषणों की तादाद पूछेगें, तो वे हज़ार से अधिक रहे होंगे । यह सब बताने-समझाने का कारण यह स्पष्ट करना भर है कि मैं पिछले 25 वर्ष से अंधविश्वास उन्मूलन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विवेकवान जैसे विषयों पर कलम, काग़ज़ और कृति से कथनी और करनी का अद्वैत निभा रहा हूँ।
-डॉ. नरेंद्र दाभोलकर
वे कल भी थे, वे आज भी हैं, तुम्हारे मारने से मरेंगे नहीं वो ! वे ज़िंदा हैं, ज़िंदा रहेंगे !
अविजित !
धर्म -ओ मज़हब के पिंजरे
आस्था-ओ विश्वास के मक़बरे
मजबूरों-मजलूमों को रहते घेरे
अज्ञानियों के डेरे
विवेक होता यहाँ तार-तार
इंसान होता शर्मसार
मुक्त मन यहाँ पिटता बार-बार
फिर भी मानता न कभी हार
कितने शार्ली एब्दो, कितने डाभोलकर
कितने पाश, कितने पानसारे
कितनी तस्लीमा, कितनी तिस्ता
कितनी रेहाना, कितनी रफीदा
आँखों में आँखे डाले
लड़ने को तैयार
मुक्त मन, मुक्त मस्तिष्क, मुक्त हवा
आतंक के पास कहाँ है इनकी कोई दवा
मर कर भी नहीं मर सकते तुम
अविजित थे, अविजित ही रहोगे तुम।
-सरला माहेश्वरी
















