कहा जाता है कि मौजूदा समय में ज्ञान का विस्फोट हो गया है। मगर ज्ञान है कहां? जिसकी लाठी उसकी भैंस का युग बन गया है। जहां लाठी मजबूत हो और चलायी भी जा रही हो, वहां ज्ञान रह कहां जाता है? जिस युग में किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति और उसकी पत्नी को घसीट कर बंधक बनाया जा रहा हो, उस युग को ज्ञान का युग कहना, भारी बेवकूफी है। ट्रंप को जिसने वोट दिया, वह समझे कि एक बददिमाग को आदमी को उसने वोट दिया है। अगर लोग सावधान नहीं रहे तो ट्रंप दुनिया को गटर बना देगा। ट्रंप की सदिच्छा है कि उसे नोबेल शांति पुरस्कार मिले। हो सकता है कि उसे मिल भी जाए। भय से त्रस्त होकर उसे नोबेल पुरस्कार समिति पुरस्कार दे दे। नोबेल पुरस्कार प्राप्त लोगों का हश्र देखिए। बांग्लादेश में हो हंगामे के बाद मोहम्मद युनूस को सत्ता सौंपी गयी। उसे भी नोबेल पुरस्कार प्राप्त है और वह काम क्या कर रहा है? कट्टरपंथियों के साथ उसका याराना है और अल्पसंख्यकों पर घोर अन्याय कर रहा है। जिंदा जलाने की घटना घटने के बाद भी उसे शर्म नहीं आयी। मुझे तो बांग्लादेश के हो हंगामे में ट्रंप का हाथ लगता है।
अमेरिका को इस बात का गुस्सा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उसकी बात नहीं मानी और उसने मुजीबुर्रहमान को बांग्लादेश बनाने में मदद की। यह खुन्नस वह आज निकाल रहा है और अंदर ही अंदर भारत के खिलाफ सभी पड़ोसी देशों को भड़का रहा है। वेनेज़ुएला में जो कुछ हुआ। वह भयानक घटना है। ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है और वेनेजुएला पर सीधा हमला कर दिया है। अभी तक वह अंदर ही अंदर कई देशों में घुसपैठ करता रहा है। मजा यह है कि वेनेजुएला की सत्ता प्राप्ति के लिए एक नोबेल पुरस्कार विजेता आगे है जिसका नाम मारिया कोरिना है। लगता है कि नोबेल पुरस्कार भी एक खेल ही है। पुरस्कार की एक राजनीति तो होती ही है। पुरस्कार मिल जाने से बेवकूफी खत्म नहीं हो जाती है।
2003 में ईराक का राष्ट्राध्यक्ष सद्दाम हुसैन मारा गया और 2011 में लीबिया के राष्ट्राध्यक्ष गद्दाफी भी। क्यों? दोनों ने अमेरिका के डालर की हुक्मउदुली की थी।
हेनरी किसिंजर ने सऊदी अरब के साथ 1978 में समझौता किया था कि तेल की कीमत डालर में निर्धारित किया जायेगा। दोनों देशों ने इसे नहीं माना। नतीजा दोनों देशों को भुगतना पड़ा। वेनेज़ुएला के साथ भी यही हुआ। वह डालर में अपना तेल नहीं बेच कर दूसरे देशों की करेंसी में तेल बेचने लगा। अमेरिका ने पहले अनेक तरह के प्रतिबंध लगाये। देश में लोगों को सत्ता के खिलाफ भड़काया और अब उसके चुने हुए राष्ट्रपति को ही गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क के जेल में रखा है। आज वह घोषणा कर रहा है कि वेनेजुएला का तेल भंडार उसका है। वेनेज़ुएला में पूरी दुनिया का 20 प्रतिशत तेल भंडार है। रूस, चीन और ईरान ने खुल कर विरोध किया है। हमारा देश चुप ही रहेगा, क्योंकि विश्व में इसका डंका बज रहा है। दरअसल मुझे तो अब लगता है कि शांति तभी तक अख्तियार करनी चाहिए, जब तक हमला न हो। हमला कोई कर दे तो शांति का कोई मतलब नहीं रह जाता। अमेरिका के नख- दंत को तोड़ना जरूरी है। अगर वह संयुक्त राष्ट्र संघ के समझौते का उल्लंघन करता है तो विश्व में ऐसी ताकत होनी चाहिए जो उसे बताये कि संयुक्त राष्ट्र संघ के समझौते का मानना होगा। ज्ञान के इस युग में अज्ञानता की यह पराकाष्ठा है!
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