जब तक हम गांधी को याद करते रहेंगे, भारत में इन्सानियत जिन्दा रहेगी।

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mahatma gandhi ji

“तुमने मेरा सर ऊँचा कर दिया है”

— सैयद अजीज़ हसन ‘बकाई’ —

क़ाई साहब दिल्ली से प्रकाशित उर्दू साप्ताहिक ‘हुर्रियत’ के सम्पादक थे, और हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक। आप मुस्लिम लीग का उस समय भी विरोध करते रहे, जब कि भारत के बडे नेताओं ने उसकी अभिलाषा के आगे घुटने टेककर भारत-विभाजन मंजूर कर लिया। आपने लीगी गुण्डों के धमकाने और उत्पात की तनिक भी चिन्ता नहीं की और उसकी घातक नीति का डटकर विरोध करते रहे। लीगके साम्प्रदायिक-विषैले प्रचार के कारण जो घटनाएँ घटित हुई, उसकी एक बानगी बक़ाई साहबकी ज़बानी सुनिये ।

“सितम्बर 1947 की भयानक रात थी। कोई 11 बजे होंगे । दिल्ली में 86 घण्टेका कफ्यू लगा हुआ था । मैं मुस्लिम रिलीफ़ कमेटी के दफ़्तर में काम करके दिन भर का थका-हारा घर आया ही था कि जामा मस्जिद की पुलिस चौकी के सब-इन्सपेक्टर ने सड़क पर खड़े होकर आवाज दी। मैंने सहन में खड़े होकर देखा, तो सब-इन्सपेक्टरने मेरी सूरत देखते ही कहा, “वक़ाई साहब ! एक सरदारजी आपको बुलाते है ।”

मैने कहा- “इतनी रात गये क्या काम है ?”
जवाब मिला- “काम तो वह आपको ही बतायेंगे, लेकिन एक
मुसलमान लड़की उनके साथ है !”

मैंने कपड़े बदले, रिवाल्वर भरा और उसे जेबमें डालकर नीचे आया। चौकी पर जाकर देखा, तो एक सूट बूटसे सुसज्जित सिख नौजवान ने मेरा नाम लेकर हाथ जोड़कर सलाम किया और कहा, “आपसे मैं अच्छी तरह से वाक़िफ़ हूँ। आपका अखबार बरसोंसे पढ़ता हूँ। आप अमनके लिए जो काम कर रहे है, उसको मैं जानता हूँ, लेकिन आपकी खिदमतमें पहली मरतवा दाखिल हुआ हूँ। ये मेरी बहन नसरीन है।” फिर उस मुसलमान लड़की से मुखातिब होकर बोला- “वकाई साहव तुम्हारे पिता है। तुम इनके पास महफूज भी रहोगी और खुश भी।”

मैने उस नौजवान से कहा-“आपका नाम क्या है ? ये साहबजादी कौन है? किस हालातमें आपको मिली ?”

नौजवान सिख ने कहा- मेरा नाम कुलवन्तसिंह है, रिफ्यूजी हूँ। इन्सानियत के नाते मे नसरीन मेरी बहन है। मे शर्मिदा हूँ कि मेरे कौमी भाइयों के हाथों इसको तकलीफ पहुँची और रजीदा हूँ कि इमको आराम न पहुँचा सका।

मैने कहा- अजीज कुलवन्तसिंह, तुम अपनी कौम और इसानियतके लिए वाइने फनू (गौरव योग्य) हो। आपके शुक्रिया अदा करता हूँ। कभी आपने मुझमे कोई खिदमत ली तो मुझे खुशी होगी।”

कुलवन्तसिह ने मेरे पैर छुए और मुझसे रुखसत की इजाजत लेकर मोटर स्टार्ट की। मेरी आँखें उस बहादुर और नेक सिख को देखती रह गई ।

मैने उस मुसीबतजदा बच्ची से पूछा- ‘बेटी नसरीन। ये सामने मेरा जनाना मकान है। अगर तकलीफ न हो, तो पाँच कदम पैदल चलो। खुदा ने चाहा तो तुमको मेरे घर में कोई तकलीफ न होगी । जब तक तुम्हारे अभिभावकों का पता न चले, तुम इस घर को अपने बाप का घर समझकर रहना ।

“मुझे पैदल में कोई दिक्कत नहीं है। कुदरत ने हकीकी बाप और भाई के बदले कुलवन्तसिंह-जैसा बहादुर भाई और आप जैसा नेकदिल बाप इनायत किया है। यह उसका करम है, वरना अल्लाह ही जानता है कि मैं इस वक्त कहाँ और किस हालात में होती ।”

सब-इन्सपेक्टरकी आँखो से आँसू निकलने लगे। सब-इन्सपेक्टर-ने कहा-‘क्या रिपोर्ट लिखी जायेगी ?” मैने कहा- ‘किसी रिपोर्ट की जरूरत नही। में गौर करके सुबह बताऊँगा ।’

घर पहुंचने पर मेरे कहने से नसीरन ने रोकर कहा- ‘अगर आप सुनने की ताकत रखते है तो सुनिये । मै पहाडगजमें रहती थी। मेरे वालिद सेक्रिटेरियेट में मुलाजिम थे। घर में माँ-बाप और हम दो भाई बहन थे। मै नवीं क्लास में पढती थी। भाई ने बी० एस० सी० का इम्तहान दिया था । वालिद उन्हें अमरीका भेजने के इन्तजामात में मसरूफ थे। 7 सितम्बर 1947 को जब मेरे वालिद आफिस गये हुए थे, और हमीद भाई नई देहली, तो पहाडगंज में फिसाद शुरू हो गया। उस वक्त जिन पड़ोसी हिन्दुओं ने इन्सानियत का सबूत देते हुए अपने मुसलमान पड़ोसियों की जानें बचाने में मदद दी, उनमें हमारे मुहल्ले का बनिया रामसहाय क़ाबिले जिक्र है। इसने मेरी वालिदा को खतरे से आगाह किया और कहा कि “पड़ोसके मुसलमान की दीवार में छेद करके आप सब मेरे मकान में आ जायें, शायद इज्जत और जान बच जाये । बड़े पेसोपेश के बाद अम्मा और पड़ोसी राजी हुए। वालिदा साहबा, मुझे और जेवर, नक़द रुपया, एक हैण्डबैग लेकर रामसहाय के घर पहुँची। यहाँ एक रात बड़ी हिफ़ाजत से हम रहे। मगर अम्मा और मुझे ग़श के दौरे आ रहे थे। दो दिनों से मुँह में एक दाना भी न गया था कि अचानक बलवाइयों ने उस मकान को घेर लिया जिसमें हम और दूसरे मुसलमानों ने पनाह लिया था। अचानक मकान का दरवाजा तोड़ा गया । बलवाई तलवारें और लाठियाँ लिये हुए अन्दर दाखिल हुए और उन्होंने बुलन्द आवाज़ में कहा- “हिन्दू औरतें-बच्चे अलग हो जायें और मुसलमान अलग।” रामसहायने वहुत खुशामद की, उसे ठोक दिया गया । मुसलमान मर्द और बच्चे मेरी आँखो के सामने कत्ल कर दिये गये, मालो-असवाव लूट लिया गया और औरतें आपस में तकसीम कर ली गई। मेरी वालदाको जब ले जांया जा रहा था, तो वे बेहोश थी। बड़ी मिन्नत और खुशामद से मैं और वालदा एक ही सिख के हिस्से में आई। पहाड़गंजमें हम दोनों एक मकान में क़ैद की गई। अम्मा सदमे को बरदाश्त न कर सकी और दूसरे दिन मर गई, तो उनकी लाश सड़क पर फेंक दी गई।

एक हफ्ते के बाद मुझे सरदार कुलवन्तसिंह के भाई दरशनसिंह के हाथ एक हजार रुपये में फ़रोख्त कर दिया गया। हर रोज मुझे शादी पर आमादा किया जाता था और धमकियाँ भी दी जाती थी, लेकिन मै मरनेके लिए तैयार थी और मैने फ़ैसला कर लिया था कि अस्मत बचानेके लिए काँच की चूड़ियाँ चबाकर जिन्दगी का खात्मा कर दूंगी। मुझे इस घर में तबदील हुए एक हफ़्ते से ज्यादा हो चुका था और अब मुझ पर सख्ती ज्यादा होने लगी थी कि आज उस घर के सब औरत-मर्द एक शादी में सब्जी-मण्डी गये। मुझे एक कोठरी में अकेला बन्द करके ताला लगा दिया गया । कई घण्टे के बाद सरदार कुलवन्तसिंहजी आये। उन्होंने मेरे रोने की आवाज सुनी, तो ताला तोड़कर मुझसे हक़ीक़त मालूम की। मैने सारी आप-बीती सुनाकर उनके पाँव पकड़कर अपनी रिहाई की माँग की। सरदार कुलवन्तसिंह महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा मे बड़ी पावन्दी से शरीक होते थे । अगरचे वह भी अपने बाप-भाई की तरह लाहौर से लुटकर और इन्तहाई मजालिम बरदाश्त करके दिल्ली पहुँचे थे, लेकिन बड़े नेक-दिल और शरीफ़ इन्सान थे।

मेरी यह हालत देखकर सरदार कुलवन्तसिह ने कहा- मै जानता हूँ तुम बेगुनाह हो। मैं यह भी जानता हूँ कि यह सब इन्सानियत के खिलाफ है और में यह भी जानता हूँ कि तुम्हारी रिहाई के बाद मेरे साथ इस घर में क्या सलूक होगा। मैं तुमको आसानीसे निकाल भी सकता हूं, लेकिन चन्द कदम चलने के बाद तुम फौरन पकड ली जाओगी। इसलिए में तुमको यहाँ से किसी हिफाजत की जगह पहुँचाऊँगा, तो उसका भी यही हस्र होगा, जो रामसहाय का हुआ। फिर थोडी देर सोचकर कहा- “बहन नसरीन, एक मिनट भी देर किये बगैर फौरन मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो जाओ।”

मेरे लिए तैयारी का सवाल ही न था। में फौरन साथ हो गई और वह मोटर में बिठाकर इस चौकी पर ले आये। रास्ते में उन्होने बताया कि में तुमको आपके हवाले कर दूंगा। आगे जो मुकद्दर मे लिखा होगा, भुगतना।” नसीरन की रोते-रोते हिचकी वंध गई। मैं और मेरे घर की औरतें भी बराबर रो रही थीं, यहाँ तक कि हमे यह भी ख्याल न रहा कि वह कई वक्त के फाके से है।

मैने कहा- ‘बेटी, तुम अब घबराओ मत । तुम्हारी मुसीबत के दिन खत्म हो चुके। बालिदा साया तो जिंदा नही हो सकती। अलबत्ता तुम्हारे बाप और भाई की तलाश करने में कोई कोर-कसर उठा न रखूंगा। यह घर अब तुम्हारा घर है। मेरी लाश पर से ही होकर तुम तक कोई गुजर सकता है।

कई रोज की तलाशके बाद नसीरन के बाप और भाई मिले। मैने इस वाकये का जिक्र महात्मा गांधीसे किया, तो उन्होने बडी मसर्रत का इजहार किया और उस नौजवान से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की। मैं एक रोज शाम को उनकी इबादत में शरीक था कि कुलवन्तसिंह पर नजर पडी। मैने उससे बापूकी ख्वाहिश जाहिर की, तो उसने पहले नसीरन का हाल पूछा और मेरे यह बताने पर कि वह अपने बाप-भाई से मिल चुकी है, उसका चेहरा खुशी से चमक उठा । तव उसने कहा- “बापू मुझे क्या जानें, आपने जिक्र किया होगा ।”

मैने कहा- “कुलवन्तसिंह । तुम्हारी नेकी और बहादुरी बापू से कैसे छिप सकती है ?”

बापू ने उसको अपनी छाती से लगा लिया और बोले- ‘मैने तुम्हारी बहादुरी का हाल सुन लिया है। तुमने मेरा सर ऊँचा कर दिया है। तुम्हारे जैसे नौजवान ही मेरे मिशन को कामयाब कर सकते हैं। मैं तुमको आशीर्वाद देता हूँ और आशा करता हूँ कि जब भी सम्भव होगा, तुम हर अत्याचार-पीडित महिला की अपने प्राण संकट में डालकर भी रक्षा करोगे।”

जंगलीपन के उस तूफान में कुलवन्त सिंहने यह साबित कर दिया कि बहादुर और नेक लोग अभी बाकी है और इन्सानियत जिदा है।” (ज्ञानोदय, जनवरी 1952 से साभार)

जब तक भारत के लोग महात्मा बुद्ध और गांधी की याद को अपना दिल मे संजोए रखेंगे, बहादुर और नेक लोग बहशीपन के खिलाफ लडते रहेगे और इन्सानियत जिदा रहेगी।


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