— परिचय दास —
हिंदी कोई एक भाषा नहीं, वह एक चलता हुआ समय है~जिसमें स्मृति है, स्वप्न ; सत्ता और प्रतिरोध भी। वह केवल व्याकरण की अनुशासित पंक्तियों में नहीं रहती बल्कि गली के मोड़ पर, खेत की मेड़ पर, रेल के डिब्बे में, मोबाइल की स्क्रीन पर और प्रवासी मनुष्य की जेब में रखे हुए उस छोटे-से शब्दकोश में भी साँस लेती है जो उसे घर की याद दिलाता है। विश्व हिंदी दिवस इसी जीवित, गतिशील, बहुस्वर हिंदी का उत्सव है—एक ऐसा दिन, जब भाषा स्वयं को देखती है, अपने फैलाव को, अपने संकटों को और अपने भविष्य को भी।
विश्व हिंदी दिवस की तिथि कैलेंडर में एक तारीख भर नहीं है; वह हिंदी की वैश्विक यात्रा का पड़ाव है। वह उस क्षण की स्मृति है जब हिंदी राष्ट्र की सीमाओं से निकलकर विश्व की गलियों में पहुँची—कभी प्रवास के सहारे, कभी श्रम के, कभी साहित्य के और कभी बाज़ार के कंधे पर सवार होकर। मॉरिशस, फ़िजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद, दक्षिण अफ़्रीका—इन भूगोलों में हिंदी किसी सरकारी निर्णय से नहीं बल्कि जीवन की ज़रूरत बनकर पहुँची। वह वहाँ पूजा-पाठ की भाषा भी बनी, गीत की भी और धीरे-धीरे स्मृति की भाषा भी। विश्व हिंदी दिवस इस स्मृति को वर्तमान में बदलने का अवसर देता है।
आज का परिदृश्य, हालांकि, सरल नहीं है। हिंदी के सामने पहली चुनौती अपने ही घर में है। एक ओर हिंदी की बोलचाल की ताक़त है~ जो करोड़ों कंठों में प्रतिदिन प्रकट होती है~ दूसरी ओर उसकी औपचारिक, अकादमिक और प्रशासनिक उपस्थिति सिकुड़ती हुई दिखाई देती है। हिंदी का संकट यह नहीं कि लोग उसे बोलना छोड़ रहे हैं; संकट यह है कि लोग उसे विचार की भाषा मानने से हिचकने लगे हैं। उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और वैश्विक संवाद के क्षेत्र में हिंदी को अब भी मानो प्रवेश-पत्र दिखाना पड़ता है।
फिर भी, यही समय हिंदी के लिए सबसे अधिक संभावनाओं का समय भी है। डिजिटल युग ने भाषा के पुराने द्वारपालों को हटा दिया है। अब कोई संपादक, कोई प्रकाशक, कोई संस्था तय नहीं करती कि कौन बोलेगा और कौन नहीं। सोशल मीडिया, ब्लॉग, पॉडकास्ट, यूट्यूब, ओटीटी~ इन सब मंचों पर हिंदी नए रूपों में प्रकट हो रही है। यह हिंदी कभी शुद्ध नहीं होती, कभी अशुद्ध नहीं; वह मिश्रित, चलायमान और कई बार विद्रोही होती है। यह वह हिंदी है जो अंग्रेज़ी से डरती नहीं, उसे आत्मसात करती है; जो स्थानीय बोलियों से संवाद करती है, उन्हें दबाती नहीं।
आज की हिंदी कविता देखें~ वह मंचों से उतरकर स्क्रीन पर आ गई है। आज का कवि कभी इंस्टाग्राम रील में दिखता है, कभी किसी वेब-सीरीज़ के संवाद में, कभी किसी गीत में। यह बदलाव कुछ लोगों को विचलित करता है लेकिन भाषा का स्वभाव ही परिवर्तन है। हिंदी हमेशा माध्यम बदलती रही है—शिलालेख से पांडुलिपि तक, पत्रिका से अख़बार तक और अब स्क्रीन तक। विश्व हिंदी दिवस हमें याद दिलाता है कि माध्यम बदलने से भाषा का अस्तित्व कम नहीं होता बल्कि उसकी संवेदनशीलता नए रूप में प्रकट होती है।
विश्व हिंदी दिवस का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं रही। आज वह एक वैश्विक संपर्क भाषा के रूप में उभर रही है—खासकर दक्षिण एशिया, खाड़ी देशों और प्रवासी समुदायों में। हिंदी फ़िल्में, वेब-सीरीज़ और गीतों ने भाषा को वह पहुँच दी है जो किसी सरकारी नीति से संभव नहीं थी। एक कोरियाई युवा अगर हिंदी गीत गुनगुनाता है या एक यूरोपीय छात्र हिंदी सीखना चाहता है तो यह भाषा की सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है।
लेकिन इसी के साथ एक खतरा भी जुड़ा है—कि हिंदी केवल मनोरंजन की भाषा बनकर न रह जाए। भाषा को जीवित रखने के लिए उसका विचारशील होना आवश्यक है। अगर हिंदी में गंभीर विमर्श, आलोचना, विज्ञान, दर्शन और सामाजिक चिंतन नहीं होगा तो उसकी चमक सतही समझी जाएगी। विश्व हिंदी दिवस इस आत्मालोचन का भी दिन होना चाहिए~ कि क्या हम हिंदी में जटिल प्रश्न पूछ पा रहे हैं? क्या हम सत्ता, बाज़ार और तकनीक की भाषा में हिंदी को सक्षम बना रहे हैं?
आज की हिंदी एक बहुस्तरीय यथार्थ में जी रही है। एक ओर वह संविधान की भाषा है, दूसरी ओर वह रोज़मर्रा की मज़दूरी की भी भाषा है। एक ओर वह विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम सूची में है, दूसरी ओर वह गाने के मुखड़े में। यही द्वंद्व हिंदी को जीवित रखता है। विश्व हिंदी दिवस इस द्वंद्व को स्वीकार करने का दिन है~ हिंदी को एकरूप बनाने का नहीं बल्कि उसके बहुरूप को समझने का। हिंदी का भविष्य उसके खुलेपन में है।
जो भाषा अपने भीतर अन्य भाषाओं के शब्दों को जगह देती है, वही लंबे समय तक जीवित रहती है। हिंदी ने फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, अंग्रेज़ी~ सबसे संवाद किया है। आज उसे तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से भी संवाद करना है। मशीनें हिंदी बोल रही हैं, अनुवाद कर रही हैं, लिख रही हैं। यह डर का नहीं बल्कि अवसर का क्षण है~बशर्ते हम हिंदी को केवल भावुकता का विषय न बनाएं बल्कि बौद्धिक और रचनात्मक चुनौती के रूप में लें।
विश्व हिंदी दिवस अंततः किसी उत्सव-सभागार में दिए गए भाषणों तक सीमित नहीं होना चाहिए। वह एक प्रश्न की तरह हमारे सामने खड़ा होना चाहिए~ हिंदी हमारे लिए क्या है? स्मृति, सुविधा, या संघर्ष? शायद तीनों और यही उसकी ताक़त है। हिंदी उस नदी की तरह है जो कई स्रोतों से आती है, कई दिशाओं में बहती है और फिर भी अपनी पहचान नहीं खोती।
आज के परिदृश्य में हिंदी को न तो दया की ज़रूरत है, न कृत्रिम संरक्षण की। उसे चाहिए विश्वास~ अपने वक्ताओं का, अपने लेखकों का, अपने शिक्षकों का और अपने पाठकों का। विश्व हिंदी दिवस उस विश्वास को सार्वजनिक करने का दिन है। यह स्वीकार करने का दिन है कि हिंदी जीवित है, क्योंकि वह बदल रही है; और वह बदलेगी, क्योंकि उसे जीने की ज़रूरत है।
हिंदी का उत्सव तब सच्चा होगा, जब हम उसे केवल गौरव का विषय नहीं बल्कि उत्तरदायित्व मानेंगे। जब हम उसमें सोचेंगे, सवाल उठाएँगे और भविष्य की कल्पना करेंगे। उसी क्षण विश्व हिंदी दिवस एक तारीख नहीं, एक सतत प्रक्रिया बन जाएगा~ जिसमें भाषा, समय और मनुष्य एक-दूसरे से संवाद करते रहेंगे।
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