
पहचाना? कन्नड़ अभिनेत्री और लेखक। इन्हें दो बार फिल्मों में अभिनय का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।1970 में संस्कार और मृत्युपरांत 1977 में सोन कसारी के लिए। ये तो कोई खास बात नहीं। जब से राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की स्थापना हुई तब से हर साल किसी न किसी को मिलता ही है।
यू एन अनंतमूर्ति की उपन्यास पर बनी संस्कार तब देखी थी। गज़ब की थी। लेकिन आज की चर्चा इसलिए भी नहीं। तो फिर किसलिए? *दूसरी सीता* नाटक याद है? हम, वाहिनी वालों ने किया था। वह दौर था महिला आंदोलन के इस दौर की शुरुआत का। आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की घोषणा हो चुकी थी। महानगरों समेत छोटे बड़े शहरों में युग के करवट की एक गूंज थी। महिलाओं के दर्द, संघर्ष, सपने सब कुछ जो अब तक निराकार थे, वे आकार लेने लगे थे। उन्हीं दिनों सामयिक वार्ता (संपादक किशन पटनायक) में इन्हीं स्नेहलता रेड्डी का एक नाटक छपा- *दूसरी सीता*। तब हम बहुत कुछ सामुहिक रूप से पढ़ा करते थे। इसे भी पढ़ा और मुरीद हो गए। इस नाटक के और इसकी लेखक स्नेहलता रेड्डी के भी। किशन जी के तो पहले से थे ही। उन्हीं के जरिए हमारा साक्षात्कार इस कन्नड़ लेखिका से हुआ था। हम इतने बह गए इस नाटक में कि इसे खेलने का तय कर लिया। किशन जी के पास जाते ही रहते थे। अबकी बार गए तो पूछ लिया कि हम इसे खेलें? खेलना चाहते हैं। उन्होंने तुरन्त कहा, “तो खेलो। किसने रोका है?” हमने कहा कि इतनी बड़ी हिरोइन रह चुकी हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। फिर बगैर ईजाजत? किशन जी ने कहा वो तो रही नहीं। लेकिन जो छ्प चुका वह पब्लिक का हो चुका। करो। कुछ मदद चाहिए होगा तो बता देना।
पहले तो कोशिश की कि हम खुद कर लें। ऑल इंडिया रेडियो पर आवाज अभिनय के मौके मिला करते थे। इप्टा को जावेद-परवेज बंधुओं के थिएटर ग्रुप में आना-जाना था। तो थोड़ा-बहुत बेसिक्स सीखा था। पर यह सब नाकाफी था इस गंभीर नाटक के लिए।
बहुत मगज़मारी करने के बाद परेश सिन्हा के पास जाने का फैसला किया। यूं तो वे रेेल्वेेज में काम करते थे पर जाने जाते थे थिएटर कलाकार और निदेशक के रूप में। हुलिया और चेहरा-मोहरा दिलिप कुमार से मिलता जुलता था। एकाध फिल्मों में दिलिप कुमार के बाॅडी डबल का काम भी कर चुके थे। कविताई करते थे। समाजवादी थे। आंदोलन का समर्थन करते थे। वाहिनी (छात्र युवा संघर्ष वाहिनी) को बहुत प्यार भी करते थे।
तो वो *दूसरी सीता* के निर्देशन और मंचन को तैयार हो गए। एक छोटी सी शर्त रखी कि महिला किरदारों के लिए कलाकार जुटाने की जिम्मेदारी हमारी होगी। हमने भी एक आग्रह किया कि पहले दो दिनों में आए टिकट के पैसे हाल, बुकिंग और बाकी खर्च में जाएगा। तीसरे और आखिरी दिन के पैसे वाहिनी को मिलेंगे। उस दिन के टिकट की कीमत वाहिनी ही तय करेगी।
शुरू हो गया रिहर्सल। मैं चाहती थी कि सीता का किरदार मैं करूं। वैसे मैं कभी भी सीता के पारम्परिक किरदार के प्रति आकर्षित नहीं रही। लेकिन यह तो दूसरी सीता थी। इसे करना चाहती थी। लेकिन मुझे नहीं मिला यह किरदार। मोटी थी बहुत। बाल भी छोटे। लंबाई कम। नाक-नक्श भी तीखे सांचे में ढले हुए नहीं। आवाज़ भी कड़क। मैं सीता कैसे बन सकती थी। हालांकि मैं ने बहस बहुत की थी । यह दूसरी सीता है। रंगरूप नाक-नक़्श में कैसी भी हो सकती है। लेकिन नाटक तो देखने वालों के लिए किया जाता है। पब्लिक को जितना पचे उतना ही। खैर! किरदार और कलाकार तय हो गए ।
कनक,(मेरी सहपाठी, दोस्त और आंदोलन की साथी) सीता के किरदार में होगी। ऐसा तय हुआ। सांंवली थी। सुंदर थी। नाक-नक़्श तीखे।सुमधुर भाषिणी। पहले से अभिनय का कोई अनुभव नहीं था। पर सिर्फ एक को छोड़ किसी को नहीं था। सब के सब कलाकार के रूप में नए थे। ललित को छोड़कर। उसे थिएटर का अनुभव तो था ही, कुछेेक फिल्मों में भी किरदार निभाए थे। उसने राम का किरदार किया। तीन माह के लगातार अभ्यास के बाद हम नाटक खेलने को तैयार हुए।
पहले दो दिन तो ठीक ठाक गुजरे। टिकट बिक गए। गांधी मैदान के पास कालीदास मुक्ताकाश रंगालय में शो रखा गया था। दर्शक खुले में बैठे थे। मौसम भी अच्छा था। नाटक का क्लाइमेक्स जो अंत भी था सवाल छोड़ जाने में सक्षम रहा।
अब आया तीसरा और अंतिम दिन। यह दिन हमारे लिए खास यूं था कि हम अपने समर्थकों के घर-घर जाकर कूपन देकर *यथाशक्ति* सहयोग मांग कर लाए थे। आज के जमा पैसे वाहिनी के लिए थे। दर्शक भी खास। सभी व्यक्तिगत तौर पर परिचित। नाटक शुरू हुआ। थोड़ी देर बाद ही अचानक से झमाझम बारिश। दर्शक उठकर जाने लगे तो परेश जी ने दर्शकों को मंच पर और इसके आसपास बुला लिया। मंचीय नाटक नुक्कड नाटक बन गया। पर शो जारी रहा। मैं धोबन की भूमिका में थी। हां, वही धोबन, जिसके धोबी ने राम पर तंज कसा था और सीता के किरदार पर कीचड उछाला था। धोबी भी अपनी धोबन को राम के नक्शेकदम घर से बाहर फेंकना चाहता था।
उसे उसपर शक था। मैं बारिश, बारिश में उठकर जाते दर्शकों और मंच पर एवं इर्द-गिर्द सिमट आए दर्शकों को देखकर जार जार रोने लगी। रो इसलिए रही थी घर घर से बुला लाए थे उन्हें। पैसे भी लिए थे। और उन्हें दिखा भी न सके ठीक से। मेरा किरदार रोने धोने वाला ही था। बारिश ने इतना रुलाया कि बस। कुछ करना ही नहीं पड़ा था। नाटक खत्म हुआ। पर्दा था ही नहीं कि गिरे। नाटक करने वाले और देखने वाले आमने सामने थे। खुब तालियां बजी। खूब शाबासी मिली। सब बस यही कहते सुने जा रहे थे कि क्या कमाल को अभिनय किया। बिना ग्लिसीरीन इतने आंसू? अरे मैं तो सच्ची में रो रही थी। चलिए, अब यह बताए देते हैं कि *स्नेहलता* की इस *दूसरी सीता* के पीछे हम इस कदर पागल क्यों थे। इस सीता ने अग्निपरीक्षा देने से इंकार कर दिया था। कहा था जितने बरस मैं राम से अलग रही उतने साल वह भी मुझसे अलग रहें। फिर सिर्फ मेरी ही अग्निपरीक्षा क्यों? राम, तुम्हारी भी क्यों नहीं? आओ, दोनों आग में साथ-साथ जलते हैं। आग एक ही साथ दोनों को पवित्रता का सर्टिफिकेट देगी। राम के इंकार करने पर वह कहती है तुमसे बेहतर तो रावण है। उसे मैं अच्छी लगी। एकतरफ़ा चाहा। पवित्रता की परीक्षा नहीं ली, ना ही ज़बरदस्ती की।
बस! सवालों का यही क्लाइमेक्स हमें दीवाना बना गया था। आज भी बनाए हुए है। स्नेहलता रेड्डी और उनकी दूसरी सीता जेहन में ऐसी रच बस गई कि निकलती ही नहीं।
आज ही के दिन 1977 में जेल से पैरोल पर निकलने के पांंच दिन बाद ही सांस की तकलीफ से अंतिम सांस लेकर अलविदा कह गईं। आपातकाल की प्रताड़ना से उन्हें यह मर्ज मिली थी। श्रद्धांजलि।
Discover more from समता मार्ग
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
















