श्रद्धांजलि : समाजशास्त्री आंद्रे बेते की याद में

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sociologist André Béteille

Dr. Shubhnit Kaushik

— डॉ. शुभनीत कौशिक —

भारत में सामाजिक विषमता और जातिगत संरचना का गहन अध्ययन करने वाले समाजशास्त्री आंद्रे बेते का आज 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके काम और व्यक्तित्व से मेरा पहला परिचय इतिहासकार रामचंद्र गुहा के लेखों से हुआ था। वर्ष 2013 में नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी में आयोजित व्याख्यानमाला में आंद्रे बेते को पहली बार सुनने का अवसर मिला। जहाँ उन्होंने समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास और ‘होमो हायरार्किकस’ जैसी चर्चित कृति लिखने वाले लुई डुमों के समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों की चर्चा की थी।

फ्रांसीसी उपनिवेश रहे चंदननगर में वर्ष 1934 में पैदा हुए आंद्रे बेते की मां बंगाली और पिता फ्रांसीसी थे। स्नातक की पढ़ाई उन्होंने कोलकाता यूनिवर्सिटी से की, जहां निर्मल कुमार बोस जैसे शिक्षकों ने उन्हें खासा प्रभावित किया। एमए की पढ़ाई कोलकाता यूनिवर्सिटी से पूरी करने के बाद आंद्रे बेते कुछ समय के लिए भारतीय संख्यिकी संस्थान में शोध सहायक भी रहे। इसी दौरान उन्होंने रांची के ओरांव और हजारीबाग के संथाल आदिवासियों पर सर्वे का काम किया। यह फील्ड में काम करने का उनका पहला अनुभव था।

आगे चलकर वर्ष 1959 में वे डॉ. वीकेआरवी राव द्वारा स्थापित दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्र विभाग में अध्यापक नियुक्त हुए और वहीं से उन्होंने में एमएन श्रीनिवास के निर्देशन में अपनी पी-एच.डी. भी पूरी की, जो तंजौर के एक गांव के समाजशास्त्रीय अध्ययन पर केंद्रित थी। उनका यह शोध-ग्रंथ 1965 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी प्रेस से ‘कास्ट, क्लास एंड पावर’ शीर्षक से पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने तंजौर के उस गांव के सामाजिक स्तरीकरण के बदलते पैटर्न का विस्तृत अध्ययन किया था।

आगे भी उन्होंने जाति के बदलते हुए स्वरूप और खेतिहर समाज की सामाजिक संरचना पर अपना अध्ययन जारी रखा। जो ‘कास्ट ओल्ड एंड न्यू’ और ‘स्टडीज़ इन एग्रेरियन सोशल स्ट्रक्चर’ जैसी उनकी पुस्तकों में दिखाई पड़ता है। समाजशास्त्र के सैद्धांतिक पक्ष और विभिन्न देशों और सभ्यताओं का समाजशास्त्रीय दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन भी उन्होंने अपनी पुस्तकों में प्रस्तुत किया।

सामाजिक विषमता पर आधारित उनकी पुस्तकें ‘इनइक्वेलिटी एमंग मेन’ और ‘द आइडिया ऑफ़ नैचुरल इनइक्वेलिटी’ फ़ील्ड अनुभव पर आधारित साक्ष्य को प्रस्तुत करने के साथ ही मानव समाज में विभाजन और विभेद का सामाजिक सिद्धांत भी प्रस्तुत करती हैं। भारतीय लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं, भारतीय विश्वविद्यालयों के स्वरूप और उनकी संरचना पर भी उन्होंने विचारोत्तेजक पुस्तकें लिखीं।

उन्हें नमन!


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