— परिचय दास —
भुवनेश्वर की उस शांत सुबह में जब वाणी मंजरी दास ने अंतिम श्वास ली, तब यह केवल एक जीवन का अवसान नहीं था; यह दो समानांतर धाराओं के एक दीर्घ संवाद का विराम था। यह संवाद था—वाणी और किशन का; नारी चेतना और समाजवादी दृष्टि का; निजी सादगी और सार्वजनिक प्रतिबद्धता का। उनके जीवन को केवल घटनाओं से नहीं समझा जा सकता, उसे विचार-तत्त्वों की उस आंतरिक संरचना से पढ़ना होगा, जिसने उनकी साधारण प्रतीत होने वाली जीवन-यात्रा को असाधारण अर्थ दिया।
वाणी मंजरी दास का मूल विचार-तत्त्व था—गरिमा की अनिवार्यता। वे मानती थीं कि मनुष्य की पहचान उसके अधिकारों से पहले उसकी गरिमा से बनती है। स्त्री के संदर्भ में यह गरिमा दोहरी चुनौती से घिरी है—परंपरा के बोझ और आधुनिकता के भ्रम से। वे कहती थीं कि स्त्री को केवल दृश्यता मिल जाना पर्याप्त नहीं; उसे निर्णय की भागीदारी और आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता चाहिए। उनके लिए स्त्री-मुक्ति का अर्थ था—आत्मस्वीकृति। जब स्त्री स्वयं को पूर्ण मनुष्य के रूप में स्वीकार करती है, तभी समाज उसकी स्वीकृति की ओर बढ़ता है।
उनकी दृष्टि में नारीवाद आक्रोश का उफान नहीं, चेतना का विस्तार था। वे उग्रता से अधिक संयम को महत्त्व देती थीं क्योंकि उनका विश्वास था कि दीर्घकालिक परिवर्तन धैर्य से जन्म लेते हैं। वे कहती थीं—“असमानता का प्रतिकार असमानता से नहीं, संतुलन से होगा।” यह संतुलन उनके व्यक्तित्व का भी आधार था। वे आलोचना करती थीं पर अपमान नहीं करती थीं। वे असहमति रखती थीं, पर संवाद का सेतु नहीं तोड़ती थीं।
किशन पटनायक का विचार-तत्त्व भारतीय समाजवाद की उस धारा से जुड़ा था जो सत्ता-केन्द्रित राजनीति से अलग खड़ी होती है। वे मानते थे कि लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है~
विकेन्द्रीकरण, स्वायत्तता और नैतिक राजनीति
उनके लिए समाजवाद केवल आर्थिक पुनर्वितरण नहीं बल्कि जीवन-मूल्यों का पुनर्संयोजन था। वे बड़े औद्योगिक मॉडल के अंधानुकरण के आलोचक थे। उनका कहना था कि यदि विकास मनुष्य को उसकी भूमि, उसकी भाषा, उसके श्रम और उसकी गरिमा से अलग कर दे, तो वह विकास नहीं, विस्थापन है।
वाणी जी ने इस विचार को आत्मसात किया। उन्होंने देखा कि स्त्री का प्रश्न केवल घरेलू नहीं, आर्थिक और राजनीतिक भी है। यदि संसाधनों पर स्त्री की पहुँच नहीं, यदि निर्णय-प्रक्रिया में उसकी भागीदारी नहीं, तो समानता अधूरी रहेगी। इस प्रकार वे नारी-चेतना को समाजवादी संरचना से जोड़ती थीं। उनके लिए रसोई, खेत, दफ्तर और संसद—सब एक ही विचार-मानचित्र के हिस्से थे।
दोनों के विचारों का संगम तीन मूल तत्त्वों पर टिका था—सादगी, नैतिकता और संवाद।
सादगी उनके जीवन का आभूषण थी। यह सादगी केवल वस्त्र या घर की बनावट में नहीं, बल्कि विचार की पारदर्शिता में थी। वे जटिल शब्दावली से बचते थे। उनके लिए विचार तब सार्थक होता था जब वह आमजन की भाषा में उतर सके। वाणी जी की बैठकों में अक्सर देखा जाता था कि वे किसी कठिन सिद्धांत को घरेलू उदाहरण से स्पष्ट कर देती थीं। यही उनकी रचनात्मकता थी—विचार को जीवन से जोड़ना।
नैतिकता किशन पटनायक के चिंतन का केंद्रीय तत्त्व था। वे राजनीति को नैतिक अनुशासन से अलग नहीं मानते थे। उनके लिए वैचारिक प्रतिबद्धता का अर्थ था—सुविधा के अनुसार न बदलना। वाणी जी इस नैतिकता की साक्षी थीं। उन्होंने देखा कि संघर्ष में हार-जीत से अधिक महत्त्वपूर्ण है—ईमानदारी। इसलिए उन्होंने कभी लोकप्रियता को लक्ष्य नहीं बनाया; उन्होंने प्रामाणिकता को चुना।
संवाद दोनों के जीवन का प्राण था। वे मानते थे कि विचारों का मतभेद लोकतंत्र की शक्ति है, कमजोरी नहीं। वाणी जी विशेष रूप से इस बात पर जोर देती थीं कि स्त्रियों के बीच भी संवाद आवश्यक है—केवल पुरुष सत्ता से नहीं, अपने भीतर की संकोच-ग्रंथियों से भी। वे स्त्रियों को यह विश्वास दिलाती थीं कि उनकी अनुभूति वैध है, उनका प्रश्न सार्थक है।
विचार-तत्त्वों की दृष्टि से देखें तो वाणी मंजरी दास का जीवन ‘नैतिक स्त्रीवाद’ का उदाहरण था—ऐसा स्त्रीवाद जो सामाजिक न्याय से जुड़ा है, जो वर्ग और लिंग दोनों को साथ पढ़ता है। वहीं किशन पटनायक का समाजवाद ‘मानवीय समाजवाद’ था—जो व्यक्ति की स्वतंत्रता और समुदाय की साझेदारी को साथ रखता है।
२०२५ के कालीकट समाजवादी सम्मेलन में जब वाणी जी पहुँचीं, तो वे इन विचार-तत्त्वों की जीवित उपस्थिति थीं। उम्र के साथ उनका शरीर थक गया था, पर विचारों की स्पष्टता बनी रही। उन्होंने वहाँ कहा था कि समाजवाद और स्त्री-मुक्ति का संबंध बाहरी नहीं, आंतरिक है। यदि समाजवाद स्त्री के श्रम को अदृश्य रखता है, तो वह अधूरा है। यदि स्त्रीवाद आर्थिक असमानता को अनदेखा करता है तो वह भी अधूरा है। यह समग्र दृष्टि उनके चिंतन की विशेषता थी।
उनकी स्मृति को याद करते हुए यह स्पष्ट होता है कि वे किसी वाद की कठोर प्रतिनिधि नहीं थीं; वे जीवन की कोमल व्याख्याकार थीं। वे विचार को मनुष्य से अलग नहीं करती थीं। उनके लिए हर सिद्धांत का अंतिम परीक्षण यह था कि वह मनुष्य की गरिमा को कितना सुरक्षित रखता है।
आज जब हम “विचार और विरासत : वाणी–किशन का संवादमय जीवन” को स्मरण करते हैं, तो यह केवल अतीत का स्मारक नहीं, वर्तमान का प्रश्न भी है। क्या हमारी राजनीति नैतिक है? क्या हमारा समाज स्त्री की गरिमा को सचमुच स्वीकार करता है? क्या हमारा विकास मॉडल मनुष्य-केंद्रित है? ये प्रश्न उनकी विरासत हैं।
वाणी मंजरी दास का जीवन हमें बताता है कि विचार तब तक जीवित रहते हैं जब तक वे आचरण में धड़कते हैं। किशन पटनायक का समाजवाद और वाणी जी की नारी चेतना—ये दोनों मिलकर एक ऐसी दीप-शृंखला बनाते हैं जो तेज़ चमक से नहीं, स्थिर उजाले से पहचानी जाती है।
उनकी स्मृति केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, उन विचार-तत्त्वों को पुनः अपने जीवन में स्थान देना है। यही उनके संवादमय जीवन की सच्ची निरंतरता होगी।
उनके जीवन का यह संवाद केवल सार्वजनिक मंचों तक सीमित नहीं था; वह उनके निजी क्षणों में भी धड़कता था। वाणी जी के घर का वातावरण किसी वैचारिक प्रयोगशाला की तरह नहीं, बल्कि आत्मीयता के खुले आँगन की तरह था। वहाँ बहसें होती थीं, पर बहस का ताप संबंधों को झुलसाता नहीं था। किशन पटनायक जब किसी राजनीतिक प्रसंग पर गहरे विश्लेषण में उतरते, तो वाणी जी उस विश्लेषण के भीतर छिपे मानवीय पक्ष को सामने रखतीं। वे पूछतीं—“इस निर्णय से सबसे अधिक प्रभावित कौन होगा?” यह प्रश्न उनके विचार का केन्द्रीय सूत्र था। वे हर नीति, हर प्रस्ताव, हर आंदोलन को मनुष्य के अनुभव से परखती थीं।
किशन पटनायक का आग्रह था कि भारत की राजनीति को आत्मनिर्भर चिंतन की आवश्यकता है। वे पश्चिमी विकास-मॉडल की अंधानुकरण प्रवृत्ति के आलोचक थे। उनका मानना था कि भारतीय समाज की संरचना, उसके गाँव, उसकी विविधता—इन सबको समझे बिना विकास की कोई भी परिकल्पना अधूरी है। वे ‘विकास’ शब्द की चमक से सावधान करते थे और कहते थे कि यदि विकास का अर्थ केवल उपभोग-वृद्धि है, तो वह मनुष्य को भीतर से रिक्त कर देगा। वाणी जी इस चेतावनी को गहराई से समझती थीं। वे स्त्रियों के संदर्भ में कहती थीं कि बाज़ार ने स्त्री को दृश्यता दी है, पर यह दृश्यता कई बार उपभोग की वस्तु बनाकर देती है। इसलिए स्वतंत्रता का अर्थ बाज़ार की स्वीकृति नहीं, आत्मनिर्णय की क्षमता है।
दोनों के विचारों में एक साझा तत्व था—स्वायत्तता। किशन जी राजनीतिक स्वायत्तता की बात करते थे—स्थानीय इकाइयों की, समुदायों की, व्यक्ति की। वाणी जी स्त्री की स्वायत्तता की बात करती थीं—उसके निर्णय की, उसके श्रम की, उसके समय की। वे कहती थीं कि स्त्री के पास अपना समय नहीं है; उसका समय परिवार, समाज, परंपरा में बँट जाता है। जब तक वह अपने समय की स्वामिनी नहीं बनेगी, तब तक उसकी स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। यह सूक्ष्म दृष्टि उनके विचार की गहराई को दिखाती है।
उनका स्त्री-विमर्श केवल अधिकारों की सूची नहीं था; वह संबंधों की पुनर्संरचना का प्रस्ताव था। वे मानती थीं कि परिवार को तोड़कर नहीं, भीतर से बदलकर ही स्थायी परिवर्तन संभव है। वे पुरुष-विरोध की भाषा से बचती थीं। उनका विश्वास था कि पितृसत्ता एक संरचना है, व्यक्ति नहीं। इसलिए संघर्ष संरचना से होना चाहिए, व्यक्ति से नहीं। यही कारण था कि वे संवाद को संघर्ष का अनिवार्य अंग मानती थीं।
किशन पटनायक की राजनीति में भी यही संवेदनशीलता थी। वे विरोध को शत्रुता में नहीं बदलते थे। वे कहते थे कि लोकतंत्र का अर्थ है—विरोध का सम्मान। यदि असहमति को देशद्रोह या शत्रुता मान लिया जाए तो लोकतंत्र का आधार ही कमजोर हो जाता है। वाणी जी इस लोकतांत्रिक संस्कार की जीवित मिसाल थीं। वे बैठकों में सबसे अलग मत रखने वाले व्यक्ति को भी ध्यान से सुनती थीं। उनका सुनना ही एक नैतिक क्रिया था—जैसे वे सामने वाले को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकार कर रही हों।
विचार-तत्त्व की दृष्टि से उनके जीवन को देखें तो उसमें चार प्रमुख स्तंभ स्पष्ट दिखाई देते हैं~
गरिमा, स्वायत्तता, नैतिकता और सहअस्तित्व।
गरिमा—जिसे वे स्त्री और पुरुष दोनों के लिए अनिवार्य मानती थीं।
स्वायत्तता—जो व्यक्ति को निर्णय का अधिकार देती है।
नैतिकता—जो राजनीति और सामाजिक जीवन को आचरण से जोड़ती है।
सहअस्तित्व—जो मतभेद के बावजूद संबंधों को बनाए रखता है।
इन चारों स्तंभों पर खड़ा उनका जीवन किसी आंदोलन की ऊँची इमारत नहीं, बल्कि एक स्थिर घर जैसा था—जहाँ प्रवेश करते ही भरोसा जागता है। वे अपनी बात को अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत नहीं करती थीं। वे प्रश्न छोड़ती थीं—ऐसे प्रश्न जो भीतर जाकर काम करते हैं।
कालीकट के २०२५ के सम्मेलन की स्मृति आज विशेष अर्थ रखती है। वहाँ उन्होंने जो कहा, वह उनके दीर्घ अनुभव का सार था। उन्होंने कहा कि समाजवाद यदि स्त्री की देह और श्रम की राजनीति को नहीं समझता, तो वह आधा है। और स्त्रीवाद यदि वर्ग और संसाधनों की असमानता को अनदेखा करता है तो वह भी अधूरा है। यह समेकित दृष्टि उनके चिंतन की परिपक्वता का प्रमाण थी। वे किसी एक धारा की कठोर प्रतिनिधि नहीं थीं; वे धाराओं को मिलाने वाली सेतु थीं।
भुवनेश्वर की उस अंतिम सुबह में जब उनका शरीर शांत हुआ, तब भी उनके विचार गतिशील थे। वे विचार अब पुस्तक के पन्नों में नहीं, लोगों की स्मृतियों में हैं। जिन स्त्रियों ने उनके साथ बैठकर पहली बार अपने अनुभव साझा किए थे, वे आज भी उनके शब्द याद करती हैं—“अपनी कहानी को कम मत आँको।” जिन युवाओं ने किशन पटनायक के लेखन से राजनीति की नैतिकता सीखी थी, वे आज भी उस आग्रह को याद करते हैं।
वाणी मंजरी दास का जाना एक शून्य छोड़ता है, पर वह शून्य निराशा का नहीं, उत्तरदायित्व का है। उनकी विरासत हमें पुकारती है कि हम विचार को केवल स्मृति न बनने दें, उसे व्यवहार में उतारें। उनकी सादगी हमें याद दिलाती है कि बड़े परिवर्तन अक्सर शांत लोगों के हाथों होते हैं। उनकी दृढ़ता बताती है कि संयम कमजोरी नहीं, दीर्घकालिक शक्ति है।
“विचार और विरासत : वाणी–किशन का संवादमय जीवन” से यह स्पष्ट होता है कि यह संवाद समाप्त नहीं हुआ है। वह हमारे समय के प्रश्नों में जीवित है—लोकतंत्र की गुणवत्ता में, स्त्री की गरिमा में, विकास की दिशा में।
वाणी जी का जीवन एक दीप की तरह था—न बहुत ऊँचा, न बहुत चकाचौंध वाला; पर स्थिर, अडिग, शांत। किशन पटनायक का विचार उस दीप का तेल था—नैतिकता और प्रतिबद्धता का। जब तक यह तेल स्मृति में बचा है, तब तक दीप की लौ भी बुझने वाली नहीं।
उनकी स्मृति में झुकना केवल श्रद्धा नहीं, एक संकल्प भी है—कि हम गरिमा, स्वायत्तता और नैतिक राजनीति की उस परंपरा को जीवित रखें, जिसे उन्होंने अपने जीवन से आकार दिया। यही उनके संवादमय जीवन की सच्ची निरंतरता है।
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