दून लाइब्रेरी में हुए व्याख्यान में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने मौजूदा व्यवस्था और पत्रकारिता की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए.
अपनी अब तक की सबसे गंभीर असमानता के दौर से गुजरता भारत
दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए. सभागार में बड़ी संख्या में छात्र, शोधार्थी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे. व्याख्यान के दौरान साईनाथ ने असमानता, न्याय और मीडिया की भूमिका पर तीखे सवाल उठाए.
वरिष्ठ पत्रकार ने कहा है कि भारत आज अपनी अब तक की सबसे गंभीर असमानता के दौर से गुजर रहा है. यह असमानता केवल आमदनी या संपत्ति तक सीमित नहीं है बल्कि न्याय व्यवस्था, मीडिया, राजनीति, सार्वजनिक संसाधनों और नागरिक अधिकारों, हर स्तर पर एक संगठित ढांचे का रूप ले चुकी है. दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित तीसरे सुरजीत दास मेमोरियल लेक्चर में साईनाथ ने कहा कि मौजूदा दौर में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह सत्ता और मुनाफ़े के साथ खड़ी होगी या न्याय के साथ.
अपने व्याख्यान की शुरुआत करते हुए साईनाथ ने कहा Every Indian language is my language. उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए उसकी भाषाओं, गांवों, श्रमिकों, किसानों और हाशिये पर खड़े समाज की आवाज़ को सुनना जरूरी है, लेकिन मौजूदा मीडिया उस भारत से लगातार दूर होता चला गया है.
साईनाथ ने कहा कि कोविड, रिवर्स माइग्रेशन और नीतिगत फैसलों ने भारत को उसके इतिहास की सबसे बड़ी असमानता तक पहुंचा दिया है.
*करोड़ों की शादी और टली हुई किसान शादियां*
साईनाथ ने कॉरपोरेट जगत से जुड़े परिवार में हुए हालिया विवाह का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें करोड़ों रुपये खर्च किए गए और इस शादी को मीडिया ने उत्सव में बदल दिया. उन्होंने कहा कि यह शादी केवल सामाजिक आयोजन नहीं थी, बल्कि सत्ता, नौकरशाही और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुंच मजबूत करने का बेहद सफल कारोबारी निवेश थी.

वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां हर साल सैकड़ों किसान परिवार शादियां इसलिए रद्द कर देते हैं क्योंकि उनके पास खर्च करने की क्षमता नहीं होती.
उन्होंने विदर्भ के सरकारी सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि सिर्फ छह जिलों में लाखों परिवारों ने यह घोषित किया था कि वे अपनी बेटियों की शादी कराने की स्थिति में नहीं हैं. साईनाथ ने कहा कि आज हालत यह है कि गांवों में 30-30 साल के युवक अविवाहित हैं, क्योंकि कोई भी किसान परिवार अपनी बेटी किसान से ब्याहने को तैयार नहीं है.
*अरबपतियों की दौलत और सार्वजनिक संसाधन*
साईनाथ ने कहा कि भारत के अरबपतियों की संपत्ति का बड़ा हिस्सा जंगल, जमीन, खनिज, गैस और तेल जैसे सार्वजनिक संसाधनों से आता है. यह संविधान के उस मूल सिद्धांत के खिलाफ है, जो कहता है कि समाज के संसाधन कुछ गिने-चुने हाथों में केंद्रित नहीं होने चाहिए.
उन्होंने कहा कि 1991 में भारत में एक भी अरबपति नहीं था, जबकि आज उनकी संख्या 200 से अधिक है. हम अरबपतियों की संख्या में दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं, लेकिन मानव विकास सूचकांक में 130 से नीचे.
*कोविड में GDP गिरी, अरबपतियों की दौलत दोगुनी हुई*
साईनाथ ने कहा कि कोविड के पहले साल में अर्थव्यवस्था 7.7 प्रतिशत गिरी, लेकिन उसी दौरान अरबपतियों की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोगुनी हो गई. अगर GDP गिर रही थी, तो यह दौलत ऊपर से नहीं आई, यह नीचे से खींची गई.
उन्होंने मनरेगा को ग्रामीण भारत, खासकर महिलाओं के लिए जीवन रेखा बताया. साईनाथ ने आगे कहा कि अगर मेहनत से अमीरी आती, तो ग्रामीण भारत की हर महिला अरबपति होती.
उन्होंने गणना पेश करते हुए कहा कि मनरेगा की औसत दिहाड़ी पर काम करने वाले व्यक्ति को देश के सबसे अमीर उद्योगपति की संपत्ति तक पहुंचने में लाखों साल लगेंगे.
*न्याय व्यवस्था पर क्या बोले साईनाथ*
न्याय प्रणाली पर बोलते हुए साईनाथ ने कहा कि असमानता की सबसे खतरनाक तस्वीर अदालतों और पुलिस व्यवस्था में दिखाई देती है. उन्होंने एक दलित ग्रामीण नेता के हवाले से कहा सुप्रीम कोर्ट के सारे जज मेरे लोकल हवलदार की ताकत के सामने कुछ नहीं हैं.
उन्होंने कहा कि ताकतवर और अमीर आरोपी आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं, जबकि गरीब और असहमत आवाज़ों को सालों तक जेल में रखा जाता है. बेल इस बात पर निर्भर करती है कि आप कौन हैं.
*किसान आंदोलन और मीडिया की चुप्पी*
साईनाथ ने किसान आंदोलन को बीते तीन दशकों का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संघर्ष बताया. उन्होंने कहा कि 54 हफ्तों तक चले इस आंदोलन में सैकड़ों किसानों की मौत हुई, लेकिन मीडिया ने न तो आंदोलन की मांगें ठीक से बताईं और न ही किसानों के नारों को.
उन्होंने कहा कि 1857 के बाद यह पहली बार था जब भारतीय किसान सीधे कॉरपोरेट ताकत से टकराए.
*मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं*
साईनाथ ने कहा मीडिया और पत्रकारिता एक चीज़ नहीं हैं. उन्होंने कहा कि मीडिया कॉरपोरेट संस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य मुनाफा है, जबकि पत्रकारिता का उद्देश्य जनहित और न्याय होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि कोविड के दौरान मीडिया को आवश्यक सेवा घोषित किए जाने के बावजूद हजारों पत्रकारों और मीडिया कर्मचारियों को नौकरी से निकाला गया. कम से कम 750 पत्रकार कोविड में मरे, जिनके संस्थानों ने उनके नाम तक नहीं छापे.
*‘पत्रकारिता में J का मतलब Justice’*
साईनाथ ने कहा कि अगर पत्रकारिता को बचाना है, तो उसके केंद्र में न्याय होना होगा. अगर पत्रकारिता में न्याय नहीं है, तो वह करने लायक नहीं है. उन्होंने लेखकों, फिल्मकारों और युवाओं से अपील की कि वे असमानता पर लिखें, फिल्म बनाएं और स्वतंत्र मीडिया का समर्थन करें.
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