आम लोगों की सुरक्षा पर कब होगी बहस?

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— राजेन्द्र राजन —

कुछ दिनों से देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक का मुद्दा गरमाया हुआ है। मीडिया के हर मंच पर इस पर बहस हो रही है। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुँच गया है, सो अब टीका-टिप्पणी करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर होनेवाली जाँच का नतीजा आने का इंतजार करना ही ठीक होगा।

लेकिन यह सवाल जरूर उठना चाहिए कि आखिर आम लोगों की सुरक्षा पर देश में बहस कब होगी? इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री की तुलना आम नागरिक से नहीं की जा सकती। इसी तरह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों आदि की तुलना भी आम आदमी से नहीं की जा सकती। ये सभी संवैधानिक पदों पर बैठे हुए अति विशिष्ट जन हैं, इन पर राज्य व्यवस्था की महती जिम्मेदारियाँ हैं। इनके विशेषाधिकारों और इनकी भूमिकाओं को देखते हुए इनके जीवन को खतरा कहीं अधिक हो सकता है, इसलिए इनकी सुरक्षा के विशेष प्रबंध किया जाना हमने खुशी-खुशी स्वीकार किया हुआ है। लेकिन एक लोकतंत्र के लिए यह शुभ लक्षण नहीं कि आम लोगों की सुरक्षा का सवाल गौण या उपेक्षणीय मान लिया जाए या बना दिया जाए। यह लोकतंत्र है या वीआईपी तंत्र?

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में नेतृत्व की शक्ति और देश की संप्रभुता का स्रोत जनता होती है। इसलिए सुरक्षा के सवाल पर इस तरह से बहस नहीं होनी चाहिए मानो हम राजतंत्र में रह रहे हों। लोकतंत्र के अलावा मानवता के तकाजे से भी सुरक्षा का प्रश्न आम लोगों के मद्देनजर भी उठना चाहिए। क्या हमें यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि देश की जनता, जो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से लेकर तमाम वीआईपी के सारे खर्च उठाती है, कितनी सुरक्षित है? और जो लोग सत्ता में बैठे हैं, पुलिस से लेकर तमाम सुरक्षा एजेंसियों की कमान जिनके हाथ में है, वे जनता की सुरक्षा को लेकर कितने फिक्रमंद हैं?

राष्ट्रीय महिला आयोग के आँकड़े बताते हैं कि अभी-अभी बीते वर्ष में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के रिकार्ड मामले दर्ज हुए हैं और इनमें से आधे से ज्यादा अकेले उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा की डबल इंजन की सरकार है, जो बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचारकहते हुए सत्ता में आयी थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस बात का दम भरते रहते हैं कि उनकी सरकार के होते हुए अपराधी भय खाते हैं। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि उनके राज में अपराधियों का हौसला बढ़ा हुआ है। मोदी जी पिछले दिनों हर दूसरे-तीसरे दिन योगी जी के लिए वोट माँगने जाते रहे हैं। क्या उन्होंने सुरक्षा के मसले को कभी आम लोगों के मद्देनजर देखा? देखा होता तो वह योगी को यूपी के लिए उपयोगी न कहते!

किसी भी सरकार का पहला कर्तव्य नागरिकों के जान-माल (जिसमें औरतों की इज्जत की रक्षा भी शामिल है) की रक्षा करना होता है। इस बुनियादी कसौटी पर ही योगी सरकार नाकाम नजर आती है। और भी अफसोसनाक तथ्य यह है कि उन्नाव कांड जैसे कई संगीन मामलों में सत्तारूढ़ पार्टी का ही कोई चेहरा आरोपी है। उत्तर प्रदेश में अपराधियों की कौन कहे, पुलिस से भी बहुतेरे लोग खौफ खाते हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध के अलावा हिरासत में मौत के मामले में भी उत्तर प्रदेश नंबर एक पर है। इसी तरह फर्जी मुठभेड़ के मामले में भी। सुरक्षा के लिहाज से उत्तर प्रदेश से बाहर नजर डालनी हो तो कठुआ कांड को भी याद कर लें, जब भाजपा के स्थानीय (और कुछ प्रदेश स्तरीय) नेताओं को बलात्कारी के बचाव में रैली करने में तनिक भी संकोच नहीं हुआ था। इस घटना को लेकर सारी दुनिया में भारत की किरकिरी हुई, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव तक ने बयान जारी किया।

वीआईपी सुरक्षा को ही तरजीह देने और आम नागरिकों की सुरक्षा को दरकिनार कर दिये जाने की हकीकत भाजपा या एनडीए शासित राज्यों तक सीमित नहीं है। खबरें और आंकड़े खँगालेंगे तो अन्य सभी नहीं तो अन्य अधिकतर राज्यों में भी कमोबेश यही तस्वीर दिखाई देगी। सवाल यह है कि कौन सुरक्षित है? और सुरक्षा कहाँ से आती है?

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आँकड़े (जो कि सरकारी आँकड़े हैं) देखें तो सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं महिलाएँ; दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक। जो हमारे समाज के सबसे कमजोर तबके हैं। पुलिस द्वारा होनेवाले उत्पीड़न के भी यही सबसे ज्यादा शिकार हैं। यह असुरक्षा का सीधा सा सामाजिक यथार्थ है जो दिमागी अंधापन न हो तो हर किसी को नजर आ सकता है। यह यथार्थ हमारी सामाजिक संरचना से जुड़ा हुआ है। लेकिन जब राज-काज का तरीका लोकतांत्रिक न रह जाए और कानून का शासन (रूल ऑफ लॉ) के तकाजे की अनदेखी की जाए तो असुरक्षा का दायरा बढ़ता जाता है और असुरक्षा एक परिघटना की शक्ल अख्तियार करने लगती है।

पत्रकारों के एक अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्सकी ताजा रिपोर्ट बताती है कि पत्रकारों के लिए तीन सबसे हिंसक देशों में भारत भी शामिल है। क्यों न हो? जब त्रिपुरा की सरकार केवल इसलिए दिल्ली के कुछ पत्रकारों पर यूएपीए लगा दे कि वे त्रिपुरा जाकर दंगा-पीड़ितों से मिलकर कवरेज न कर सकें। दिल्ली के दंगों का सच बतानेवाले पत्रकारों को पुलिस के जरिए भी परेशान-प्रताड़ित किया गया और भीड़ को उकसाकर भी। तो हम ऐसी व्यवस्था में जी रहे हैं जहाँ पत्रकार भी दिनोदिन असुरक्षित होते जा रहे हैं। ध्यान रहे रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स की रिपोर्ट केवल काम के दौरान आनेवाली मुश्किलों और खतरों तथा हमलों व मार दिये जाने की घटनाओं का हवाला देती है, इससे भारत में पत्रकारिता की वह भयावह सच्चाई सामने नहीं आती, जो मीडिया माध्यमों पर सत्ता के प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण और दबाव से जुड़ी है।

सुरक्षा के सवाल की गंभीरता का अंदाजा हाल में हुई धर्म संसदोंसे भी होता है, जहाँ एक समुदाय-विशेष के जनसंहार का आह्वान किया गया। पुलिस और सेना का भी आह्वान किया गया कि वे जनसंहार में शामिल हों। सारी दुनिया स्तब्ध रह गयी। लेकिन संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री को मानो कुछ पता ही नहीं चला। जहाँ शासक इतने अनजानहों या कानून के मुताबिक कार्रवाई करने में इतने अनिच्छुक हों, वहाँ कैसी सुरक्षा, कैसी सुरक्षा!

महात्मा गांधी 30 जनवरी 1948 को बिड़ला भवन से प्रार्थना सभा के लिए निकले थे, लेकिन वह जिन्दा नहीं लौट पाये। वे क्यों जिन्दा नहीं लौट पाये, हर कोई जानता है। आज धर्म संसदआयोजित करके उनके हत्यारे को नमन किया जा रहा है। यह सुरक्षा का भरोसा जगाने की कवायद है, या डराने की? यह किसके इशारे पर, किसकी शह पर, किसकी सरपरस्ती में हो रहा है?

लाकडाउन में महानगरों से अपने गांव-घर जाने के लिए निकले कितने लोग जिन्दा नहीं लौट पाये, कि वे किसी को धन्यवाद कह पाते। वे भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हुए मृत्यु की गोद में सो गये। कोरोना सारी दुनिया में था लेकिन ऐसे दर्दनाक दृश्य अफ्रीका के गरीब से गरीब देश में घटित नहीं हुए जैसे दृश्य महाशक्ति बनने से बस कुछ ही कदम दूर होने का दम भरते इस देश में घटित हुए। जिनकी मेहनत से सारे महानगरों की अर्थव्यवस्था का पहिया घूमता है उन्हें उनके गाँव-घर पहुँचाने का इंतजाम नहीं किया जा सका। जबकि कोरोना काल में ही, आने-जाने की सर्वोच्च सुविधाएं पहले से होते हुए भी, प्रधानमंत्री के लिए हजारों करोड़ रुपये का हवाई जहाज खरीदा गया। अभी करोड़ों रुपए की कार खरीदी गयी। आँकड़े आए कि नब्बे फीसद से ज्यादा लोगों की आय घट गयी है। दूसरी ओर हमारे प्रधानमंत्री की दिलचस्पी अपना शाही खर्च बढ़ाने और दिन में चार बार कपड़े बदलने में है। प्रधानमंत्री देश के लिए हैं, या देश प्रधानमंत्री के लिए है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार कहा था कि अगर आज राममनोहर लोहिया होते तो उनकी सरकार के कामकाज से खुश होते। जिन लोहिया ने एक समय के अपने अग्रज-मित्र-मार्गदर्शक नेहरू को नहीं बख्शा और प्रधानमंत्री नेहरू पर होनेवाले खर्च का सवाल लोकसभा में नरम शब्दों में नहीं, तीखे ढंग से उठाया, वे आज होते तो खुश होते या उनका दिल जार जार रो रहा होता। वे आग उगल रहे होते, भले मीडिया को कितना भी बुरा लगता!

दिल्ली की सरहदों पर धरना दे रहे किसानों में से कोई सात सौ किसान जिन्दा नहीं लौट पाये। वे केंद्र सरकार की संवेदनहीनता की भेंट चढ़ गये। पिछले कुछ सालों में कितने लोग मॉब लिंचिंग में में मार दिये गये। कई लोग केवल इसलिए आतंकवाद निरोधक कानूनों के तहत कैद हैं क्योंकि वे गलत लगनेवाले एक कानून के विरोध में हुए आंदोलन में शामिल थे। देश के कई नामचीन, जन सरोकारी, साहसी, मानवाधिकारों को लेकर संवेदनशील बुद्धिजीवी बिना सजा सुनाये जेल में हैं क्योंकि उन्हें आतंकवाद और राजद्रोह से लेकर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने तक की कहानी में लपेट दिया गया है। जनसंहार के बर्बर आह्वान से इस व्यवस्था को कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन स्टेन स्वामी नाम के एक चौरासी साल के बूढ़े में उसे खतरा ही खतरा दिखा, जो अपना गिलास तक नहीं पकड़ सकता था।

देश के विचाराधीन कैदियों में आधे से अधिक ऐसे हैं जो बिना सजा हुए जेलों में सड़ रहे हैं। रोजाना लाखों लोग पुलिस और प्रशासन द्वारा सताए जाते हैं। विस्थापन के खिलाफ आवाज उठानेवाले आदिवासी नक्सली कहकर जेलों में ठूँस दिये या मार दिये जाते हैं। हाथरस कांड अफ्रीका के किसी गये-गुजरे देश में नहीं हुआ, इसी गर्वीले देश के सबसे गर्वीले प्रदेश में हुआ, जहाँ सरकार पीड़ित पक्ष की तरफ नहीं, दूसरी तरफ खड़ी थी। जो हर साल दो करोड़ नौकरी देने का वादा करके आए थे वे आज खाली पदों को भरने की गुहार लगाने पर बेरहमी से लाठियाँ चलवा रहे हैं। इस राज में कौन सुरक्षित है?

सुरक्षा शासकों के सीना फुलाने से नहीं, कानून का शासन सुनिश्चित करने से आती है, जिसका अर्थ होता है कि कानून बिना भेदभाव के अपना काम करेगा, कानून पीड़ित पक्ष के साथ खड़ा होगा, अन्यायी और उत्पीड़क किसी के भी करीबी, भी जाति, किसी भी वर्ग, किसी भी धर्म के हों, कानून उन्हें बख्शेगा नहीं। सुरक्षा जो कमजोर है उसके मन में अन्याय न होने और अगर हुआ तो न्याय दिलाने का भरोसा जगाने से आती है। आज सुरक्षा की नहीं असुरक्षा की, भरोसे की नहीं भय की भावना व्याप्त है। धार्मिक अल्पसंख्यक तो भयभीत हैं ही, धार्मिक बहुसंख्यकों के मन में भी अल्पसंख्यकों को लेकर रोज डर बिठाया जा रहा है। 

पिछले दिनों आईआईएम बंगलोर और अहमदाबाद के करीब दो सौ छात्रों और पाँच प्रोफेसरों ने प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र लिखकर हेट स्पीच जैसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहा कि आज देश में भय की भावना व्याप्त है। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? धर्म संसद जैसी घटनाओं पर प्रधानमंत्री ने क्या किया? प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में नंगी तलवारें लहराते हुए जुलूस निकला, उ. प्र. के मुख्यमंत्री ने क्या कार्रवाई की? क्या प्रधानमंत्री या उनके गृहमंत्री ने इस बारे में मुख्यमंत्री से जवाब तलब किया?

केंद्र के एक मंत्री ने आंदोलन कर रहे किसानों को सबक सिखाने की खुलेआम धमकी दी। फिर कुछ ही दिन बाद उस मंत्री के बेटे ने किसानों पर गाड़ी चला दी, कइयों को कुचलकर मार डाला। फिर भी उस मंत्री को प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद में बनाये हुए हैं ताकि मंत्रिपरिषद की शोभा भी बनी रहे और देश में सुरक्षा-भाव का संचार भी होता रहे। देश में सुरक्षा की भावना और मंत्रिपरिषद की शोभा बढ़ाने के लिए ही प्रधानमंत्री के एक मंत्री ने खुलेआम गोली मारो… का नारा दिया। इतना गुड गवर्नेंस कहाँ मिलेगा? जनता की सुरक्षा की इतनी फिक्र कहाँ की जाती होगी?

मंत्रियों की सुरक्षा में कोई कमी न रह जाए, आमलोग चाहे जितने असुरक्षित और अपमानित होते रहें!

चुनाव हो तो नेतालोग हाथ जोड़े गली-गली घूमते मिलेंगे, दरवज्जे-दरवज्जे दस्तक देंगे, जनता के कदमों में बिछे नजर आएँगे, लेकिन निर्वाचित जनप्रतिनिधि हुए नहीं कि उन्हें जनता से भय लगने लगेगा। सुरक्षा का अभेद्य घेरा चाहिए। सुरक्षा की एक से बढ़कर एक श्रेणी; और किसको किस श्रेणी की सिक्योरिटी हासिल है, इससे पता चलता है कि वह कितना बड़ा वीआईपी है। ये श्रेणियां स्टेटस सिंबल बन गयी हैं। और एक छुटभैया भी बिना गनर के चलना अपनी तौहीन समझता है। सुरक्षा का घेरा उनको भी चाहिए जो खुद दूसरों के लिए असुरक्षा की वजह हैं। कई ऐसे लोग भी सरकारी खर्च पर अंगरक्षकों के घेरे में वीआईपी होने की ठसक से चलते हैं जिन्हें असल में सलाखों के पीछे होना चाहिए। आमलोग न सिर्फ असुरक्षा, भय और अपमान में जीते हैं बल्कि वे वीआईपी सुरक्षा के नाम पर बहुत सारा अवांछित खर्च भी उठाते हैं।

कहाँ है जनता की सुरक्षा? उसे पलीता कौन लगा रहा है? यह राजतंत्र है या प्रजातंत्र? लोकतंत्र है या वीआईपी तंत्र
जहाँ कानून का शासन के तकाजों को ताक पर रख दिया जाएगा, वहाँ कौन सुरक्षित रहेगा? कितने दिन सुरक्षित रहेगा?

कोई आश्चर्य नहीं कि अपने देश में अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है, भय की भावना गहराती जा रही है। हालत यह है कि आप अपने डर को कह भी नहीं सकते। कहा नहीं कि जवाब मिलेगा, पाकिस्तान चले जाओ। क्या पता कल बेरोजगारी या महंगाई की शिकायत करने पर भी यही कहा जाए।

प्रधानमंत्री देश के सिरमौर हैं, लिहाजा उनकी सुरक्षा भी सर्वोपरि है। उनकी सुरक्षा में बतायी जा रही चूक की जांच का आदेश देकर सर्वोच्च अदालत ने ठीक ही किया। लेकिन जनता कितनी सुरक्षित है, उसकी सुरक्षा में कहां कहां चूक हो रही है, किस-किस स्तर पर हो रही है, किस-किस के द्वारा हो रही है, कानून को कौन ठेंगा दिखा रहा है, जन-जीवन की सुरक्षा के लिए क्या-क्या करना होगा, इस सब की पड़ताल कौन करेगा?

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