कला-साहित्य के बहुवचन : शिव

0
Shiv

Parichay Das

— परिचय दास —

शिव के रहस्य में वसंत है, मुस्कान में कलाएं । भंगिमा में लीला है तो संपूर्ण जीवन प्रसादमय। हम भारत के लोग सौभाग्यशाली हैं कि हमने ऐसा महानायक अपने बीच गढ़ा है। नटराज नायक। सृजन व विनाश को एक साथ साधने वाला महाशिल्पी। हमारा महासहचर।

शिव का उल्लेख आते ही मन में एक ऐसे भोले देवता की छवि उभरती है, जो गरीब और हाशिए पर पड़े व्यक्ति के साथ हैं। आदि-अनादि। किसी राजा के कुल में नहीं जन्मे। लोकमन में आम आदमी की तरह बसते हैं और उसकी वैसी ही सहायता करते हैं। शरीर पर विभूति लगाए, अपनी ही मस्ती में बैठे हुए सबके कल्याण की भावना से रचे-बसे। पास में नंदी के होने का अर्थ मनुष्येतर प्राणियों के साथ रचनात्मक संबंध व भारत की कृषि-व्यवस्था की संपुष्टि।

संस्कृति में शिव का प्रवेश विभिन्न अर्थों से संपन्न व बहुआयामी है। वे भारतीय समाजों के सहज-प्राप्य सांस्कृतिक स्वरूप हैं। उनमें जितनी अलौकिकता है, उससे अधिक लौकिकता। उनमें जितना संहार पक्ष है,उससे अधिक सृजन पक्ष। शिवलिंग सृजन का हेतु ही माना गया है। वे जितने प्राचीन हैं, उतने ही नवीन।

वे जितने समय में होते हैं, उतने ही समय से परे उन्हें महाकाल कहा जाता है। वे शुभ-रूप हैं, अशुभ का खंडन करते हैं तथा मंगल का हेतु हैं। वे एकवचन हैं, साथ ही बहुवचन भी। वेद में ‘रुद्र” शब्द का एकवचन व बहुवचन दोनों में ही प्रयोग हुआ है।

शिव इतने सहज हैं कि एक लोकगीत में उल्लेख आता है कि उन्हें कैसे मनाएं -‘का लेके सिव के मनाईं  हो सिव मानत नाहीं। पूड़ी मिठाई सिव के मनहीं ना भावे, भंगिया धतूर कहां पाईं हो सिव मानत नाहीं। कोठा अटारी सिव के मनहिं ना भावे, टूटही मड़इया कहां पाईं हो सिव मानत नाहीं।” यानी सामान्य मनुष्य के सामान्य दोस्त जैसे देवता। बल्कि देवता से भी ऊपर। यह अकेले ऐसे देवता हैं, जिनका दोेस्त या साथी होना उनके देवता होने से बड़ा है। उनका डमरु सबके लिए बजता है। कलाओं के आधार स्तंभ हैं शिव।

नृत्य-संगीत के प्रथम पुरुष। तांडव नृत्य के वे ही हेतु हैं। जिस मांगलिकता के वे हेतु हैं, अर्थात् ‘शिव” हैं, उसका अभाव हर किसी को शव बना देता है। वे पशुपति हैं। ऋग्वेद में उल्लेख है कि रुद्रदेव हम लोगों की संपत्ति बढ़ाते हैं और हमारे घोड़े,भेड़ें और गाय आदि पशुओं का कल्याण करते हैं।

उनको चाहने वाले राम हैं तो रावण भी। ऐसा सर्वग्राही मंगल स्वरूप कहां मिलेगा? जो नीलकंठ होगा, वही सबका हृदय जीत सकता है। वे विषपायी थे। जो संगीत, कला, साहित्य की मार्मिकता में प्रवेश करेगा, उसे विषपायी ही होना होगा। कालिदास ने ‘कुमारसंभव” में इसीलिए उन्हें ‘स्वयंभू” कहा। समुद्र-मंथन सर्वदा चलता रहता है, हमारे समकाल में भी। हमारे भीतर-बाहर अमृत है और विष भी। कोई परम करुणामय ही होगा हमारे बीच, जो विष-वेग से हमें बचाए। कलाएं वास्तव में वही करुणारूप हैं, जो असमय में भी हमारे साथ होती हैं। शिव उसी के हेतु हैं। जो लोक की संरक्षा व दुष्ट का संहार करे, वही विश्वनाथ हो सकता है।

गंगा हमारे देश की सिर्फ एक नदी का नाम नहीं है। वह एक सांस्कृतिक धारा है। गंगा के माध्यम से संस्कृतियां पनपी हैं। गंगा-अवतरण हेतु भगीरथ की तपस्या की कथा आती है। गंगा के आने पर वेग की प्रबलता को शिव ने ही साधा। उनकी जटाएं जैसे हिमालय के विशाल गह्वर। औषधियों के परम ज्ञाता, भूमि के उर्वरता साधक व वीरता की प्रतिमूर्ति हैं शिव। उन्हें चिकित्सकों के मध्य प्रधान चिकित्सक कहा गया है। कई स्थलों पर उन्हें और अग्नि को पर्याय बताया गया है, तो कई जगहों पर पृथक।

किंतु इससे उनकी तेजस्विता व ऊष्मामयता का पता चलता है। सामवेद में भी यह बात आती है। विद्युत शिव का ही प्रहरण है। जिस शिव ने मदन को भस्म व त्रिपुर को दहन किया, वह वैद्युतिक शक्ति का ही लीला-विकास है। विद्युत ही रुद्र शक्ति है। वे कई शस्त्रों के आविष्कारक हैं। शिवास्त्र और वज्रहस्त का उल्लेख है। त्रिशूल तो लोकमन में सदा ही रमा रहता है। ये सभी शुभत्व की रक्षा के लिए हैं।

शिव जैसी मंगलमूर्ति हमारे समाजों में आत्मीय रचाव की तरह है। शिव शास्त्र से अधिक हमारे लोकमन में बसे हैं। साधारण तरह से रहने वाले साधारणजन के बीच। भारत व उसके बाहर उनकी लोककथाएं चलती हैं। संहार
में भी निर्माण की दृष्टि रखने वाले महादेवता यानी महाकलाधर्मी।


Discover more from समता मार्ग

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Comment