भारत की लोकसंस्कृति में शिव — राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी

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Rajendra Ranjan Chaudhary

भारत की लोकसंस्कृति शिवमय है। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक प्रत्येक जनपद में शिव की कीर्ति है। प्रत्येक जनजाति के गीतों और कहानियों में कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में “बं-बं हर-हर” का नाद गूँजता है। वे भूत-पिशाच आदि गणों को साथ लेकर हिमालय के घर की ओर बारात लेकर जा रहे हों, अथवा दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने की मुद्रा में हों; वे प्रलय के समय तांडव-नृत्य कर रहे हों या कामदेव का संहार करने के लिए तीसरा नेत्र खोल रहे हों; वे भस्मासुर को वरदान देकर स्वयं ही संकट में पड़ गए हों या भगीरथ के आग्रह को स्वीकार कर गंगा के अवतरण के लिए संनद्ध हों; वे श्मशान पर चिता-भस्म लपेटे हुए हों या कैलाश पर साधना-तपस्या में लीन हों; वे गौरा-पार्वती के संग नंदी पर बैठे लोक-भ्रमण कर रहे हों अथवा किसी किसान की सूखी धरती पर शंख बजाकर मेघों को संकेत दे रहे हों—वे प्रलयंकर हों अथवा मृत्युंजय, वे वेद-परंपरा के रुद्र हों अथवा अवैदिक परंपरा के अघोर; वे अर्धनारीश्वर हों अथवा हरिहर—इसमें तनिक भी संशय नहीं कि प्रत्येक रूप में शिव, शिव ही हैं।

यों तो मिथकशास्त्र का “समुद्र-मंथन” सभ्यता के विकास की कहानी है, किन्तु उससे निकले अमृत की बूँद पाने के लिए संघर्ष हुआ, पर जो विष निकला उसे स्वीकार करने को कोई तैयार नहीं था। उस विष को कंठ में धारण करने वाला शिव के अतिरिक्त और कौन हो सकता था?

देश-काल में शिव का विस्तार इतना व्यापक है कि हिमालय की दुर्गम पर्वत-श्रृंखलाओं में अमरनाथ, केदारनाथ और कुमाऊँ के बागेश्वर, जागेश्वर, विभाण्डेश्वर, पिनाकेश्वर, भीमेश्वर, हंतेश्वर, डंडेश्वर से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वरम् तक; झारखंड के वैद्यनाथ, उज्जैन के महाकाल, सौराष्ट्र के सोमनाथ, नर्मदा तट के ओंकारेश्वर, नासिक के त्र्यंबकेश्वर, आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम् में मल्लिकार्जुन, गुजरात के नागेश्वर, महाराष्ट्र के भीमाशंकर और घृष्णेश्वर, काशी के विश्वनाथ, बंगाल के दक्षिणेश्वर, केरल के अन्तिमहाकालन, गोवा के श्रीमंगेश, कुरुक्षेत्र के स्थाण्वीश्वर—भारत के कण-कण में शंकर का भाव बसा है। चिदम्बरम् के नटराज, तिरुवण्णामलै, नेपाल के पशुपतिनाथ और तिब्बत के कैलास पर्वत के बिना तो शिव की कथा पूर्ण ही नहीं होती। संक्षेप में, भारत शिव-रूप है।

स्थान-स्थान पर हजारों किंवदंतियाँ शिव से जुड़ी हैं। मणिकर्ण की कथा इसका उदाहरण है। कुल्लू घाटी के पास स्थित मणिकर्ण में धरती से खौलते जल का स्रोत निकलता है। वहाँ की लोककथा कहती है कि शिव ने उमा के मुख से झूलती लट हटाई तो पार्वती की नथ का मणि नदी में गिर गया। खोजने पर ज्ञात हुआ कि शेषनाग ने उसे धारण कर लिया है। शिव ने त्रिशूल से प्रहार किया, तब शेषनाग ने मणि लौटा दी। तभी से वह स्थान मणिकर्ण कहलाया।

पुराणों में शिव और मुनियों के बीच सांस्कृतिक संघर्ष का वर्णन मिलता है। वामनपुराण, कूर्मपुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण आदि में वर्णित कथाएँ दर्शाती हैं कि शिव की उपासना क्रमशः व्यापक स्वीकृति प्राप्त करती गई। यह केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया का संकेत है।

दक्ष-यज्ञ की कथा भी आर्य वेदाचार और शिवोपासना के मध्य द्वंद्व का प्रतीक मानी गई है। शिव किरात-वेशी, शबर-पूजित और जनजातीय देवता के रूप में भी पूजित रहे। आचार्य क्षितिमोहन सेन ने भारतीय संस्कृति में विभिन्न जातीय-समुदायों—यक्ष, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, किरात, नाग आदि—के समन्वय को शिव की परंपरा से जोड़ा है।

लोकगीतों में शिव एक सहज, गृहस्थ और किसान के रूप में भी उपस्थित हैं। कहीं वे किसान बनकर हल चला रहे हैं, कहीं पार्वती उनसे चूड़ियाँ माँग रही हैं, तो कहीं वे सूखे में शंख बजाकर वर्षा का आह्वान करते हैं। लोकजीवन के सुख-दुःख, तकरार और करुणा—सब शिव-पार्वती की कथाओं में प्रतिबिंबित हैं।

शिव न केवल देवों के, बल्कि असुरों के भी देव हैं। वे आर्य भी हैं, अनार्य भी; द्रविड़ भी हैं और किरात भी। वे जितने देवताओं के हैं, उतने ही गणों और जनों के। शिव भारतीयता की मूर्तिमान व्याख्या हैं। उनसे बड़ी एकात्मता कहाँ मिलेगी?

लोकमानस की विराट भाव-संपदा शिव की मंगलमूर्ति में समाहित है। शिव के यहाँ न जातिभेद है, न वर्णभेद। वे अघोरी भी हैं और वैष्णवों में श्रेष्ठ भी—“वैष्णवानां यथा शंभुः।” वे शक्ति में ऐसे रमे कि अर्धनारीश्वर हुए और विष्णु में ऐसे रमे कि हरिहर बने। वे भोले हैं, सरल हैं, पर प्रलयंकर भी वही हैं।

नटराज का तांडव केवल नृत्य नहीं, सृष्टि-स्थिति-लय का दार्शनिक प्रतीक है। आनन्द कुमारस्वामी ने “द डांस ऑफ शिव” में इसे जीवन की जटिलताओं की कुंजी कहा है। डमरू और अग्नि सृष्टि और संहार के प्रतीक हैं। यह कला भी है, दर्शन भी और विज्ञान का सत्य भी।

अंततः, शिव की कथा भारत के लोकजीवन की कथा है—उतनी ही पुरानी, उतनी ही नई। न कभी महादेव ने लोकजीवन का साथ छोड़ा, न लोकजीवन ने महादेव को भुलाया। भारत के लोकजीवन के क्रमविकास के साथ ही महादेव की अवधारणा का विकास पहचाना जा सकता है।


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