रवींद्रनाथ टैगोर के चिंतन, उनके साहित्य-कर्म और विश्व-भारती के संस्थागत इतिहास को लेकर जिन विद्वानों ने उल्लेखनीय काम किया है, उनमें इतिहासकार उमा दास गुप्त का नाम अग्रणी है। वर्ष 1983 में उमा दासगुप्त ने शांति निकेतन और श्रीनिकेतन पर एक विस्तृत लेख लिखा था, जो विश्व-भारती द्वारा पुस्तिका रूप में प्रकाशित किया गया। उस लेख में उमा दासगुप्त टैगोर के शिक्षा संबंधी विचारों के बारे में बताने के साथ ही उन परिस्थितियों का विवरण देती है, जिनमें शांतिनिकेतन, श्रीनिकेतन और विश्व-भारती की स्थापना हुई। वे इन संस्थाओं के इतिहास को अलग-अलग न देखकर रवींद्रनाथ टैगोर की शिक्षा दृष्टि की समग्रता के प्रतिफलन के रूप में देखती हैं।
रवींद्रनाथ टैगोर का कहना था कि किसी भी देश की शिक्षा को वहां के लोगों के जीवन से आत्मीय रूप से जुड़ा होना चाहिए। ऐसी शिक्षा ही देश के लोगों के भीतर आत्मविश्वास और आत्म-सम्मान की भावना जगा सकेगी और उन्हें आध्यात्मिक और बौद्धिक अवमानना के उस दुश्चक्र से मुक्त कर सकेगी, जिसमें अंग्रेज़ी राज ने उन्हें जकड़ रखा है। अकारण नहीं कि औपनिवेशिक भारत के तमाम विश्वविद्यालयों को गुरुदेव ने ऐसे परजीवी संस्थाओं के रूप में देखा, जो देश के जीवनरस को सोख रही थीं, मगर जिनका हिंदुस्तान की धरती और उसके लोगों से कोई संपर्क या जुड़ाव नहीं था।
संयोग नहीं कि शांतिनिकेतन में जो पाठ्यचर्या उन्होंने सहयोगी विद्वानों के साथ मिलकर तैयार की, उसमें ग्रामीण जीवन और वहाँ की दिनचर्या अपरिहार्य रूप से जुड़ी हुई थी। शांतिनिकेतन के आसपास स्थित गाँवों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्थापित ‘शिक्षा सत्र’, वयस्कों को शिक्षित करने के लिए बना ‘लोक शिक्षा संसद’ और गाँव के स्कूली शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए ‘शिक्षा चर्चा भवन’ की स्थापना टैगोर के इन्हीं सरोकारों का सूचक थी।
बच्चों को अपने आसपास के परिवेश के प्रति सचेत बनाने और ग्रामीण भारत के पुनर्निर्माण में उनकी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए ब्रती बालक संगठन भी अस्तित्व में आया। श्रीनिकेतन में आस-पास के गांवों में प्रचलित हस्तशिल्पों जैसे कताई-बुनाई, बढ़ईगिरी, कुम्हार, चर्मशोधन को प्रश्रय देने के साथ ही गाँवों के आर्थिक सहयोग की दृष्टि से सहकारी समितियों की भी शुरुआत की गई।
शांतिनिकेतन का यह समूचा प्रयोग ही मानव-समाज के परस्पर सहयोग, बंधुत्व, आत्मीयता और समन्वय जैसे गुणों पर आधारित था। यही नहीं उमा दास गुप्त बताती हैं कि रवींद्रनाथ टैगोर ने विश्व-भारती में आचार्य, छात्र, अध्यापक की संकल्पना को एक नया ही स्वरूप दिया। देश-विदेश में स्थित विश्व-भारती के सहयोगियों को उन्होंने ‘बांधव’ कहा।
इसी संदर्भ में शांतिनिकेतन से परे कुछ ऐसे संगठन भी बने, जिन्होंने शांतिनिकेतन को वित्तीय संकटों से उबारने में समय-समय पर मदद की, जिनमें ‘शांतिनिकेतन आश्रमिक संघ’, ‘विश्व-भारती सम्मिलनी’ प्रमुख थे। इन्हीं सम्मिलित प्रयासों से ही शांतिनिकेतन वह असाधारण केंद्र बन सका, जहाँ पूर्व और पश्चिम की ज्ञान परंपराओं का उन्मुक्त मिलन संभव हुआ। पाठ भवन, शिक्षा भवन, विद्या भवन जैसी इकाइयों ने इसमें अपनी भूमिका निभाई। साथ ही, कला भवन, संगीत भवन और शिल्प भवन के कुशल अध्यापकों ने छात्रों को संगीत, कला और शिल्प आदि के क्षेत्र में दक्ष बनाया।
तमाम आर्थिक संकटों के बावजूद जिस प्रकार रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन को प्रतिबद्धता के साथ संचालित किया, उसके विषय में भी यह किताब बताती है। साथ ही, त्रिपुरा, बड़ौदा, जयपुर, काठियावाड़, पोरबंदर, लिंबडी, हैदराबाद जैसी देसी रियासतों ने जिस प्रकार शांतिनिकेतन की आर्थिक मदद की, उसे भी यह पुस्तिका रेखांकित करती है।
टैगोर के शिक्षा सम्बन्धी विचारों और शांतिनिकेतन के प्रयोग के बारे में जानने के लिए, जरूर पढ़ें यह पुस्तिका।
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