मेरे संस्मरण – आचार्य नरेन्द्रदेव : चौथी किस्त

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आचार्य नरेन्द्रदेव (30 अक्टूबर 1889 - 19 फरवरी 1956)

धीरे-धीरे हममें से कुछ का क्रांतिकारियों से संबंध होने लगा। उस समय कुछ क्रांतिकारियों का विचार था कि आई.सी.एस. में शामिल होना चाहिए ताकि क्रांति के समय हम जिले का शासन सँभाल सकें। इस विचार से मेरे 4 साथी इंग्लैंड गये। मैं भी सन् 1911 में जाना चाहता था। किन्तु माता जी की आज्ञा न मिलने के कारण न जा सका। इधर सन् 1907 में सूरत में फूट पड़ चुकी थी और कांग्रेस से गरम दल के लोग निकल आए थे। कनवेंशन बुलाकर कांग्रेस का विधान बदला गया। इसे गरम दल के लोग कनवेंशन कांग्रेस कहते थे। गवर्नमेण्ट ने इस फूट से लाभ उठा कर गरम दल को छिन्न-भिन्न कर दिया। कई नेता जेल में डाल दिये गये। कुछ समय को प्रतिकूल देख कर भारत से बाहर चले गये और लंदन, पेरिस, जिनेवा और बर्लिन में क्रांति के केन्द्र बनाने लगे। वहाँ से ही साहित्य प्रकाशित होता था। मेरे जो साथी विलायत पढ़ने गये थे, वह इस साहित्य को मेरे पास भेजा करते थे। श्री सावरकर की वार ऑफ इंडिपेंडेंस की एक प्रति भी मेरे पास आयी थी और मुझे बराबर हरदयाल का वन्दे मातरम्, बर्लिन का तलवार और पेरिस का इण्डियन सोशियालजिस्ट मिला करता था। 

मेरे दोस्तों में से एक सन् 1914 की लड़ाई में जेल बंद कर दिये गये थे तथा अन्य दोस्त केवल बैरिस्टर होकर लौट आए। मैंने सन् 1908 के बाद से कांग्रेस के अधिवेशनों में जाना छोड़ दिया, क्योंकि हम लोग गरम दल के साथ थे। यहाँ तक कि जब कांग्रेस का अधिवेशन प्रयाग में हुआ, तब भी हम उसमें नहीं गये। सन् 1916 में जब कांग्रेस में दोनों दलों में मेल हुआ तब हम फिर कांग्रेस में आ गये।

बी.ए. पास करने के बाद मेरे सामने यह प्रश्न आया कि मैं क्या करूँ। मैं कानून पढ़ना नहीं चाहता था। मैं प्राचीन इतिहास में गवेषणा करना चाहता था। म्योर कालेज में भी अच्छे-अच्छे अध्यापकों के संपर्क में आया। डाक्टर गंगानाथ झा की मुझ पर बड़ी कृपा थी। बी.ए. में प्रोफेसर ब्राउन से इतिहास पढ़ा। भारत के मध्ययुग का इतिहास वह बहुत अच्छा जानते थे। पढ़ाते भी अच्छा थे। उन्हीं के कारण मैंने इतिहास का विषय लिया। बी.ए. पास कर मैं पुरातत्त्व पढ़ने काशी चला गया। वहाँ डाक्टर वेनिस और नारमन ऐसे सुयोग्य अध्यापक मिले। क्वींस कालेज में जो अंग्रेज अध्यापक आते थे, वह संस्कृत सीखने का प्रयत्न करते थे। डाक्टर वेनिस ऐसा पढ़ाने वाला कम होगा। नारमन साहब के प्रति भी मेरी बड़ी श्रद्धा थी। जब मैं क्वींस कालेज में पढ़ा था, तब वहाँ श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल से परिचय हुआ। विदेश से आने वाला साहित्य वह मुझसे ले जाया करते थे। उनके द्वारा मुझे क्रांतिकारियों के समाचार मिलते रहते थे। मेरी इन लोगों के साथ बड़ी सहानुभूति थी। किन्तु मैं डकैती आदि के सदा विरुद्ध था; मैं किसी भी क्रांतिकारी दल का सदस्य न था। किन्तु उनके कई नेताओं से परिचय था। वे मुझपर विश्वास करते थे और समय-समय पर मेरी सहायता भी लेते रहते थे। 

सन् 1913 में जब मैंने एम.ए. पास किया, तब मेरे घर वालों ने वकालत पढ़ने का आग्रह किया। मैं इस पेशे को पसंद नहीं करता था। किंतु जब पुरातत्त्व विभाग में स्थान न मिला, तब इस विचार से कि वकालत करते हुए मैं राजनीति में भाग ले सकूँगा, मैंने कानून पढ़ा।

सन् 1915 में मैं एल.एल.बी. पास कर वकालत करने फ़ैजाबाद आया। मेरे विचार प्रयाग में परिपक्व हुए और वहीं मुझको एक नया जीवन मिला। इस नाते मेरा प्रयाग से एक प्रकार का आध्यात्मिक संबंध है। मेरे जीवन में सदा दो प्रवृत्तियाँ रही हैं – एक पढ़ने लिखने की ओर; दूसरी राजनीति की ओर। इन दोनों में संघर्ष रहता है। यदि दोनों की सुविधा एक साथ मिल जाए तो मुझे बड़ा परितोष रहता है और यह सुविधा मुझे विद्यापीठ में मिली। इसी कारण वह मेरे जीवन का सबसे अच्छा हिस्सा है, जो विद्यापीठ की सेवा में व्यतीत हुआ, और आज भी उसे मैं अपना कुटुंब समझता हूँ।

सन् 1914 में लोकमान्य मांडले जेल से रिहा होकर आए और अपने सहयोगियों को फिर से एकत्र करने लगे। श्रीमती बेसेण्ट का उनको सहयोग प्राप्त हुआ, और होमरूल लीग की स्थापना हुई। सन् 1915 में हमारे प्रांत में श्रीमती बेसेण्ट की लीग की स्थापना हुई। मैंने इस संबंध में लोकमान्य से बात की और उनकी लीग की एक शाखा फ़ैजाबाद में खोलनी चाही, किंतु उऩ्होंने यह कह कर मना किया कि दोनों के उद्देश्य एक हैं, दो होने का कारण केवल इतना है कि कुछ लोग मेरे द्वारा कायम की गयी किसी संस्था में शरीक नहीं होना चाहते और कुछ लोग श्रीमती बेसेण्ट द्वारा स्थापित किसी संस्था में नहीं रहता चाहते। मैंने लीग की शाखा फ़ैजाबाद में खोली और उसका मंत्री चुना गया। इसकी ओर से प्रचार का कार्य होता था और समय-समय पर सभाओं का आयोजन होता था। मेरा सबसे पहला भाषण अलीबंधुओं की नजरबंदी का विरोध करने के लिए आमंत्रित सभा में हुआ था। मैं बोलते हुए बहुत डरता था। किंतु किसी प्रकार बोल गया और कुछ सज्जनों ने मेरे भाषण की प्रशंसा की। इससे मेरा उत्साह बढ़ा और फिर धीरे-धीरे संकोच दूर हो गया। मैं जब सोचता हूँ कि यदि मेरा पहला भाषण बिगड़ गया होता तो शायद मैं भाषण देने का फिर साहस न करता।

मैं लीग के साथ-साथ कांग्रेस में भी था और बहुत जल्दी उसकी सब कमेटियों में बिना प्रयत्न के पहुँच गया। महात्माजी के राजनीतिक क्षेत्र में आने से धीरे-धीरे कांग्रेस का रूप बदलने लगा। आरंभ में वह कोई ऐसा हिस्सा नहीं लेते थे, किंतु सन् 1919 से वह प्रमुख भाग लेने लगे। खिलाफत के प्रश्न को लेकर जब महात्माजी ने असहयोग आंदोलन चलाना चाहा तो असहयोग के कार्यक्रम के संबंध में लोकमान्य से उनका मतभेद था। जून, 1920 में काशी में ए.आई.सी.सी. की बैठक के समय मैंने इस संबंध में लोकमान्य से बातें कीं। उन्होने कहा कि मैंने अपने जीवन में कभी गवर्नमेण्ट के साथ सहयोग नहीं किया; प्रश्न असहयोग के कार्यक्रम का है। जेल से लौटने के बाद जनता पर उनका वह पुराना विश्वास नहीं रह गया था औ उनका ख्याल था कि प्रोग्राम ऐसा हो जिस पर जनता चल सके। वह कौंसिलों के बहिष्कार के खिलाफ थे। उनका कहना था कि यदि आधी भी जगहें खाली रहें तो यह ठीक है। किंतु यदि वहाँ जगहें भर जायेंगी तो अपने को प्रतिनिधि कहकर सरकार परस्त लोग देश का अहित करेंगे।

उनका एक सिद्धांत यह भी था कि कांग्रेस में अपनी बात रखो और अंत में जो उसका निर्णय हो उसे स्वीकार करो। मैं तिलक का अनुयायी था। इसलिए मैंने कांग्रेस में कौंसिल-बहिष्कार के विरुद्ध वोट दिया। किंतु जब एक बार निर्णय हो गया तो उसे शिरोधार्य किया।

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