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मेरे संस्मरण – आचार्य नरेन्द्रदेव : छठी व अंतिम किस्त

महात्माजी के आश्रम में चार महीने रहने का मौका मुझे सन् 1942 में मिला। मैंने देखा कि वे कैसे अपने प्रत्येक क्षण का उपयोग...

मेरे संस्मरण – आचार्य नरेन्द्रदेव : पाँचवीं किस्त

वकालत के पेशे में मेरा मन न था। नागपुर के अधिवेशन में जब असहयोग का प्रस्ताव पास हो गया तो उसके अनुसार मैंने तुरंत...

मेरे संस्मरण – आचार्य नरेन्द्रदेव : चौथी किस्त

धीरे-धीरे हममें से कुछ का क्रांतिकारियों से संबंध होने लगा। उस समय कुछ क्रांतिकारियों का विचार था कि आई.सी.एस. में शामिल होना चाहिए ताकि...

मेरे संस्मरण – आचार्य नरेन्द्रदेव : तीसरी किस्त

जापान की विजय से एशिया में नव-जागृति का आरम्भ हुआ। एशिया-वासियों ने अपने खोये हुए आत्मविश्वास को फिर से पाया और अंग्रेजों की ईमानदारी...

मेरे संस्मरण – आचार्य नरेंद्रदेव : दूसरी किस्त

हमारे स्कूल में एक बड़े योग्य शिक्षक थे। उनका नाम था– श्री दत्तात्रेय भीखा जी रानाडे। उनका मुझ पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उनके पढ़ाने...

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