मेरे संस्मरण – आचार्य नरेन्द्रदेव : छठी व अंतिम किस्त

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आचार्य नरेन्द्रदेव (30 अक्टूबर 1889 - 19 फरवरी 1956)

हात्माजी के आश्रम में चार महीने रहने का मौका मुझे सन् 1942 में मिला। मैंने देखा कि वे कैसे अपने प्रत्येक क्षण का उपयोग करते हैं। वह रोज आश्रम के प्रत्येक रोगी की पूछताछ करते थे। प्रत्येक छोटे-बड़े कार्यकर्ता का ख्याल रखते थे। आश्रमवासी अपनी छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर उनके पास जाते थे और वह सबका समाधान करते थे। आश्रम में रोग-शय्या पर पड़े-पड़े मैं विचार करता था कि वह पुरुष जो आज के हिंदू धर्म के किसी नियम को नहीं मानता, वह क्यों असंख्य सनातनी हिंदुओं का आराध्य देवता बना हुआ है। पण्डित समाज चाहे उनका भले ही विरोध करे, किंतु अपढ़ जनता उनकी पूजा करती है। इस रहस्य को हम तभी समझ सकते हैं, जब हम जानें कि भारतीय जनता पर श्रमण-संस्कृति का कहीं अधिक प्रभाव पड़ा है। जो व्यक्ति घर-बार छोड़कर निःस्वार्थ सेवा करता है, उसके आचार की ओर हिंदू जनता ध्यान नहीं देती। पण्डित-जन भले ही उसकी निन्दा करें, किंतु सामान्य जनता उनका सदा सम्मान करती है। अक्टूबर,1941 में जब मैं जेल से छूटा तब महात्माजी ने मेरे स्वास्थ्य के संबंध में मुझसे पूछा और प्राकृतिक चिकित्सा के लिए आश्रम में बुलाया। मैं महात्माजी पर बोझ नहीं डालना चाहता था। इसलिए कुछ बहाना कर दिया। पर जब मैं ए.आई.सी.सी. की बैठक में शरीक होने वर्धा गया और वहाँ बीमार पड़ गया, तब उन्होंने रहने के लिए आग्रह किया। मेरी चिकित्सा होने लगी। 

महात्माजी मेरी बड़ी फिक्र में रहते थे। एक रात मेरी तबीयत बहुत खराब हो गई। जो चिकित्सक नियुक्त थे वह घबरा गए। यद्यपि इसके लिए कोई कारण न था। रात को 1 बजे बिना मुझे बताए महात्माजी को जगाने गए और वह मुझे देखने आए। वह उनका मौन का दिन था। उन्होंने मेरे लिए मौन तोड़ा। उसी समय मोटर भेजकर वर्धा से डाक्टर बुलाए गए। सुबह तक तबीयत सँभल गई थी। दिल्ली में स्टैफर्ड क्रिप्स वार्तालाप के लिए आए थे। महात्माजी दिल्ली जाना नहीं चाहते थे, किन्तु आग्रह होने पर गए। जाने के पहले मुझसे कहा कि वह हिन्दुस्तान के बँटवारे का सवाल किसी-न-किसी रूप में लावेंगे। इसीलिए उनकी दिल्ली जाने की इच्छा न थी। दिल्ली से बराबर फोन से मेरी तबीयत का हाल पूछा करते थे। बा भी उस समय बीमार थीं। इस कारण वह जल्दी लौट आए। जिनके विचार उनसे नहीं मिलते थे, यदि वह ईमानदार होते थे तो वह उनको अपने निकट लाने की चेष्टा करते थे। 

उस समय महात्माजी सोच रहे थे कि जेल में वह इस बार भोजन नहीं करेंगे। उऩके इस विचार को जानकर महादेव भाई बड़े चिन्तित हुए। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम भी इस संबंध में महात्माजी से बातें करो। डाक्टर लोहिया भी सेवाग्राम उसी दिन आ गए थे। उनसे भी यही प्रार्थना की गई। हम दोनों ने बहुत देर तक बातें कीं। 

महात्माजी ने हमारी बात शान्तिपूर्वक सुनी। किन्तु उस दिन अन्तिम निर्णय न कर सके। बम्बई में जब हम लोग 9 अगस्त को गिरफ्तार हो गए तो स्पेशल ट्रेन में अहमदनगर ले जाए गए। उसमें महात्माजी, उनकी पार्टी और बम्बई के कई प्रमुख लोग थे। नेताओं ने उस समय भी महात्माजी से अन्तिम बार प्रार्थना की कि वह ऐसा काम न करें। किले में भी हम लोगों को सदा इसका भय लगा रहता था।

सन्, 45 में हम लोग छूटे। मैं जवाहरलाल जी के साथ अलमोड़ा जेल से 14 जून को रिहा हुआ। कुछ दिनों के बाद मैं पूना में महात्माजी से मिला। उन्होंने पूछा कि सत्य और अहिंसा के बारे में अब तुम्हारे क्या विचार हैं? मैंने उत्तर दिया कि मैं सत्य की तो सदा से आराधना किया करता हूँ, किन्तु इसमें मुझको संदेह है कि बिना कुछ हिंसा के राज्य की शक्ति हम अंग्रेजों से छीन सकेंगे। महात्माजी के संबंध में अनेक संस्मरण हैं, किन्तु समयाभाव से हम इससे अधिक कुछ नहीं कहते।

इधर कई वर्ष से कांग्रेस में यह चर्चा चल रही थी कि कांग्रेस में कोई पार्टी नहीं रहनी चाहिए। महात्माजी इसके विरुद्ध थे। देश के स्वतंत्र होने के बाद भी मेरी यह राय थी कि अभी कांग्रेस से अलग होने का समय नहीं आया है, क्योंकि देश संकट से गुजर रहा है। सोशलिस्ट पार्टी में इस संबंध मे मतभेद था। किंतु मेरे मित्रों ने मेरी सलाह मानकर निर्णय को टाल दिया। मैंने यह भी साफ कर दिया था कि यदि कांग्रेस ने कोई ऐसा नियम बना दिया जिससे हम लोगों का कांग्रेस में रहना असंभव हो गया तो मैं सबसे पहले कांग्रेस छोड़ दूँगा। कोई भी व्यक्ति, जिसको आत्मसम्मान का ख्याल है, ऐसा नियम बनने पर नहीं रह सकता। यदि ऐसा नियम न बनता और पार्टी कांग्रेस छोड़ने का निर्णय करती तो यह तो ठीक है कि मैं आदेश का पालन करता, किन्तु मैं यह नहीं कह सकता कि मैं कहाँ तक उसके पक्ष में होता। कांग्रेस के निर्णय के बाद मेरे सब संदेह मिट गए और अपना निर्णय करने में मुझे एक क्षण भी न लगा। मेरे जीवन के कठिन अवसर, जिनका मेरे भविष्य पर गहरा असर पड़ा है, ऐसे ही हुए हैं। इन मौकों पर घटनाएँ ऐसी हुईं कि मुझे अपना फैसला करने में कुछ देर न लगी। इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूँ।

मेरे जीवन के कुछ ही वर्ष रह गए हैं। शरीर-सम्पत्ति अच्छी नहीं है। किन्तु मन में अब भी उत्साह है। सदा अन्याय से लड़ते ही बीता। यह कोई छोटा काम नहीं है। स्वतंत्र भारत में इसकी और भी आवश्यकता है। अपनी जिन्दगी पर एक निगाह डालने से मालूम होता है कि जब मेरी आँखें मुँदेंगी, मुझे एक परितोष होगा कि जो काम मैंने विद्यापीठ में किया है, वह स्थायी है। मैं कहा करता हूँ कि यही मेरी पूँजी है, और इसी के आधार पर मेरा राजनीतिक कारोबार चलता है। यह सर्वथा सत्य है।

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