डॉ शंभुनाथ सिंह की कविता

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पेंटिंग : प्रयाग शुक्ल
डॉ शंभुनाथ सिंह (17 जून 1916 – 3 सितंबर 1991)

देश हैं हम

देश हैं हम
महज राजधानी नहीं।

हम नगर थे कभी
खण्डहर हो गए,
जनपदों में बिखर
गाँव, घर हो गए,
हम ज़मीं पर लिखे
आसमाँ के तले

एक इतिहास जीवित,
कहानी नहीं।

हम बदलते हुए भी
न बदले कभी
लड़खड़ाए कभी
और सँभले कभी
हम हज़ारों बरस से
जिसे जी रहे

ज़िन्दगी वह नई
या पुरानी नहीं।

हम न जड़-बन्धनों को
सहन कर सके,
दास बनकर नहीं
अनुकरण कर सके,
बह रहा जो हमारी
रगों में अभी

वह ग़रम ख़ून है
लाल पानी नहीं।

मोड़ सकती मगर
तोड़ सकती नहीं
हो सदी बीसवीं
या कि इक्कीसवीं
राह हमको दिखाती
परा वाक् है

दूरदर्शन कि
आकाशवाणी नहीं।

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