इतिहास भी संदेश भी और कला की मिसाल भी

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— हिमांशु जोशी —

फिल्म की बात की जाए तो यह एक फिल्म ही नहीं, ओटीटी पर उतरा हमारा इतिहास भी है, बड़े पर्दे पर इसे देखना और भी ज्यादा सुखद होता पर फिर भी यह अब तक कि सर्वश्रेष्ठ फिल्म है।

फिल्म आने का वक्त भी बिल्कुल सही है, मोहम्मद शमी को ‘मोहम्मद’ होने की वजह से ताने दिये जा रहे हैं, शाहरुख खान को उनके बेटे की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है उधम सिंह के ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ बनने की वजह को भुला दिया गया है।

सरदार उधम सिंह बने विक्की कौशल और निर्देशक शूजित सरकार को अब अपनी किसी पुरानी फिल्म की जगह सरदार उधम की वजह से जाना जाएगा। विक्की कौशल का बोलता चेहरा उनके अभिनय की खासियत है तो फिल्म का छायांकन अद्भुत। अविक मुखोपाध्याय ने अपनी छायांकन कला से फिल्म में जान डाल दी है और हमें सीधे अंग्रेजी शासन की छवि का अनुभव दिया है। फिल्म के संवाद लिखते रितेश शाह ने सोचा भी नहीं होगा कि वह हिंदी सिनेमा के कुछ सबसे बेहतरीन संवाद लिख रहे हैं।

वीरा कपूर ईई ने भविष्य के कॉस्ट्यूम डिजाइनरों के लिए एक चुनौती रख दी है कि कैसे कोई उनकी तरह ब्रिटिश शासनकाल के कॉस्ट्यूम फिर से डिजाइन करके दिखाए। विंटेज कार, पुरानी आलीशान इमारतें और अंग्रेजों का सेना कैम्प सब कुछ वैसा ही है जैसा तब होता होगा।

फिल्म का पहला हाफ आपको बिना आउट करे किसी बैटिंग पिच पर जमने का मौका देता है, फिल्म किसी एक कालक्रम में नहीं बनी है। यह आपको कभी भारत के दृश्य दिखाती है तो कभी इंग्लैंड, जो हो रहा है उसकी वजह आपके सामने आती रहेंगी।

सरदार उधम की अपनी बहन से थोड़ी सी मुलाकात फिर रूस की बर्फीली जगह से गुजरना अच्छे दृश्य हैं। अब आपको एक ब्रिटिश अभिनेत्री किर्स्टी एवर्टन भी दिखती है जो आयरिश स्वतंत्रता युद्ध में शामिल होती है, वो उधम का साथ देती है।

भगत सिंह का भाषण फिल्म के कुछ बेहतरीन दृश्यों की शुरुआत भर है, उधम सिंह का ‘भगत सिंह के बारे में मत बोल’ वाला दृश्य देख अभी तक चुप्पी साधे विक्की कौशल का इंजन स्टार्टर है।

उधम सिंह जेल की चारदीवारी में टॉर्चर होने के बाद जिस तेजी से साँस लेते हैं वहाँ फिल्म के साउंड का भी लोहा मानना पड़ता है। साथियों और उधम सिंह को टॉर्चर करने के अलग-अलग तरीके दिल को दहलाना शुरू ही करते हैं। ओ ड्वायर के घर में काम करते उधम सिंह वाले दृश्य में विक्की कौशल और शॉन स्कॉट का अभिनय देखने योग्य है।

‘भगत सिंह के बाद इंग्लैंड में बड़ा करना है जिससे अंग्रेज डर जाएं’ वजह स्पष्ट कर देता है कि उधम सिंह ने इंग्लैंड में ओ ड्वायर को क्यों मारा। फ्री स्पीच देने के लिए बनाई गई एक जगह पर खड़े होकर विक्की ने जंग और स्वतंत्रता पर जो संवाद बोले हैं उसके लिए फिल्म देखनी जरूरी है। विक्की के डिटेक्टिव बने स्टीफन होगन को बोले शब्द ‘प्रोटेस्ट को मर्डर या मर्डर को प्रोटेस्ट मानेगा आपका ब्रिटिश लॉ’ याद रखने लायक हैं।

उधम सिंह की मूक प्रेमिका बनी बनिता संधू के पास करने के लिए जितना भी है वह उसमें सफल हुई हैं, फिल्म में जिसने भी अभिनय किया है सबने अपने-अपने किरदार के साथ न्याय किया है।

कोर्ट रूम के दृश्य की शरुआत होते ही फिल्म उस स्तर पर पहुँच गयी है जिस वजह से मैंने इसे शुरुआत में सर्वश्रेष्ठ फिल्म कहा था, ठीक से पढ़िए सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म ही नहीं, सर्वश्रेष्ठ फिल्म।

हीर-रांझा की किताब पर हाथ रख सच बोलने की कसम खाने के बाद अपना नाम पूछे जाने पर ‘शूट मी’ चिल्लाना और खुद को राम मोहम्मद सिंह आजाद कहना, विक्की ने अपने अभिनय से ऐतिहासिक फिल्म में भी इतिहास लिखा है।

कोर्ट रूम के दृश्य देख आपकी साँसे तेज होने लगेगी, हर संवाद यहाँ नहीं लिखा जा सकता, पूरे अभिनय पर यहाँ चर्चा सम्भव नहीं। फाँसी की सज़ा और इंकलाब जिंदाबाद नारों के बाद खाने के बर्तन वाला दृश्य कमाल करता है, बस बर्तन खिसका कर ही फिल्म की टीम आपको रोमांचित करती रहती है। जबरदस्ती मुँह में पाइप डाल उधम सिंह की भूख हड़ताल तुड़वाने वाले दृश्य में विक्की आपको बिस्तर पर लेटे-लेटे ही सुन्न कर देंगे, बैकग्राउंड संगीत पर शांतनु मोइत्रा प्रभावित करते रहते हैं।

अब आपकी सांसें थोड़ी सामान्य होंगी और फिल्म अब आपको लौटाकर फिर भारत पहुँचाएगी। रौलेट एक्ट को खत्म करने के लिए अंग्रेजों की जो रणनीति बन रही है उसे देख आप सोचेंगे कि अब भी क्या कुछ बदला है! जलियांवाला बाग कांड जहाँ से बाहर निकलने की सिर्फ एक पतली गली है वहाँ खड़े हो जनरल डायर ने फायर  का आदेश दिया।

गोली से आधा लटकता पैर या गेट पकड़ते हुए हाथ का गोली लगने के बाद कटा पंजा, निर्देशक ने उस कांड का हर सेकेंड आपको फिर से दिखाया है। जान बचाने के लिए कुएँ में कूदते लोग, भगदड़ में दबते बच्चे, घायल तड़पते लोग, हर दृश्य आपकी आँखें झपकने नहीं देगा। इस बीच मुँह सूखा हो, होंठ सूखे हों.. वाली पंक्ति कहते विक्की कौशल ने उधम सिंह का दर्द हमारे सामने रखा है।

कांड के बाद देर से उठे उधम जब जलियांवाला बाग दीवार फाँद पहुँचते हैं तो उसके बाद का हर दृश्य पचासों बार देखने वाला है। लाशों पर मक्खियाँ भिनभिनाने की आवाज फिर आपको फिल्म के हर मजबूत तकनीकी पक्ष की याद दिलाता है।

घायलों की मदद करते उधम के किरदार को विक्की ने अमर बना दिया है,

अस्पताल के खून से सने फर्श वाले दृश्य हों या लाशों के ऊपर मँडराते चील कव्वों और ठेलों से घायलों को ले जानेवाले दृश्य शूजित हिंदी सिनेमा के सबसे काबिल निर्देशक बन कर सामने आए हैं। जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की लाशों के ढेर वाला दृश्य जिस कोण से दिखाया गया वह आपको जलियाँवाला बाग कांड की क्रूरता को फिल्म खत्म होते-होते कभी न भूलनेवाली याद दे जाएगा।

फिल्म पर इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगाए जा रहे हैं पर फिल्म इतिहास पढ़ाने के लिए नहीं बनायी जाती, उसका उद्देश्य होता है सकारात्मक संदेश देना और वह यह उद्देश्य देने में सफल भी हुई है।

फिल्म याद दिलाती है कि हमें आजादी यूँ ही नहीं मिल गयी उसके पीछे इन क्रांतिकारियों की सालों की मेहनत और कुर्बानी थी। वो आजादी न किसी एक राम की थी न मोहम्मद और न ही किसी एक सिंह की, वो आजादी एक ही के लिए थी जो था ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’।

निर्देशन- शुजित सरकार

पटकथा- शुबेंदु भट्टाचार्य

निर्माता- रॉनी लाहिड़ी, शील कुमार

छायांकन- अविक मुखोपाध्याय

संवाद- रितेश शाह

कॉस्ट्यूम डिजाइन- वीरा कपूर ईई

अभिनय- विक्की कौशल, बनिता संधू, स्टीफन होगन, शॉन स्कॉट

संगीत- शांतनु मोइत्रा

ओटीटी प्लेटफॉर्म- अमेजन प्राइम वीडियो

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