
— रणधीर गौतम —
भारतीय समाजशास्त्र के साधकों की एक लंबी परंपरा रही है, जिसने व्यक्ति, समाज और संस्कृति के बोध को विकसित करते हुए व्यक्ति-निर्माण, समाज-निर्माण और सांस्कृतिक चिंतन को समझने की दृष्टि और पद्धति का विकास किया है। प्रोफेसर T. K. Oommen के व्यक्तित्व में शिक्षक, सिद्धांतकार और बौद्धिक—तीनों गुण समान रूप से प्रभाव और प्रवाह के साथ उपस्थित थे।
भारतीय समाजशास्त्र में औपनिवेशिक प्रभाव के कारण एंथ्रोपोलॉजी की परंपरा अधिक प्रचलित थी। 1970 के दशक में प्रो. ओमन की अवधारणाओं ने भारतीय समाजशास्त्र को अमेरिकी समाजशास्त्र की पद्धति और थ्योरी-बिल्डिंग की दिशा से जोड़ा तथा उसे एक सुसंगत रूप प्रदान किया। इसके परिणामस्वरूप भारतीय समाजशास्त्र ने वैश्विक ज्ञान- प्रणाली में अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। यही साधना प्रोफेसर ओमन को अंतरराष्ट्रीय समाजशास्त्र संघ के अध्यक्ष पद तक ले गई।
समाजशास्त्र में संरचना को समझने की अपेक्षा प्रक्रिया को समझना अधिक कठिन कार्य है। सामाजिक आंदोलनों के विमर्श को जन्म देने में समाजशास्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, किंतु 1970 के दशक से पहले भारतीय समाजशास्त्री सामाजिक आंदोलनों की विधि-विज्ञान (मेथडोलॉजी) को व्यवस्थित रूप से विकसित नहीं कर पाए थे। ओमन ऐसे पहले समाजशास्त्री थे जिन्होंने न केवल सामाजिक आंदोलनों की पद्धति विकसित की, बल्कि समाजशास्त्र में इस विषय के अध्ययन की परंपरा को भी स्थापित किया। साथ ही, उन्होंने राजनीतिक समाजशास्त्र (political sociology ) , Modernity , indigenous knowledge system और सिविल सोसायटी के विमर्श को गति प्रदान की और इस क्षेत्र में स्थायी स्थान प्राप्त किया।
वे प्रायः कहा करते थे कि समाजशास्त्र का अध्ययन उन्हें मानो एक संयोगवश प्राप्त हुआ, परंतु इसी विषय ने उन्हें समाज को समग्रता में समझने की क्षमता प्रदान की। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे हर विचार को एक सुस्पष्ट सैद्धांतिक ढाँचे में रखकर प्रस्तुत करते थे। उनके लेखन में विचार, सिद्धांत और चिंतन का एक स्वाभाविक सामंजस्य दिखाई देता है।
मुझे स्मरण है कि एक बार जामिया मिलिया इस्लामिया में लगभग एक घंटे के संवाद का अवसर उन्होंने मुझे दिया। उस चर्चा में सर्वोदय विचार की समाजशास्त्रीय समझ के संदर्भ में मैंने उनसे कहा कि आपका भूदान आंदोलन का विश्लेषण इस दृष्टि से अधूरा है, क्योंकि आप विनोबा की वैचारिक परंपरा को मूल रूप में नहीं समझते। यह सुनकर वे मुस्कराए और बोले कि मेरा अध्ययन समाजशास्त्रीय है, दार्शनिक नहीं। और उन्होंने यह भी कहा था, “अपने पीएचडी के अध्ययन के बाद यदि मैंने सर्वोदय की परंपरा को अधिक बेहतर ढंग से समझा और प्रस्तुत किया है, तो आपका कथन इस संदर्भ में आंशिक रूप से सही हो सकता है।”
उनकी यह विनम्रता मुझे भीतर से आनंद और आश्चर्य से भर दिये । तब मैंने अनुभव किया कि उनके लिए शिक्षक होने का पहला दायित्व स्वयं विद्यार्थी बने रहना था। विचार की यह खुली दिशा उनके व्यक्तित्व की स्थायी पहचान थी।
पिछले तीन–चार वर्षों में सर की तबीयत अत्यंत खराब रही। वे ठीक से अपनी नित्य क्रियाएँ भी नहीं कर पा रहे थे। दो–तीन बार उनसे मिलने का मुझे अवसर मिला। उन्हें उस अवस्था में देखकर भीतर से गहरा दुःख होता था। फिर भी उनका जाना हमारी समाजशास्त्रीय बिरादरी के लिए अत्यंत पीड़ादायक क्षति है।
अपने अंतिम समय में भी भारतीय समाजशास्त्र परिषद को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए उन्होंने सराहनीय प्रयास किए। वे हमेशा चाहते थे कि भारतीय समाजशास्त्र परिषद(ISS) का नेतृत्व किसी सुयोग्य व्यक्ति के हाथों में हो और समाजशास्त्र को एक सशक्त अध्ययन-परंपरा के रूप में विकसित करने में उसकी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।
इस संदर्भ में वे तीन बातों पर विशेष बल देते थे—पहला, एक उत्कृष्ट शिक्षक का निर्माण; दूसरा, गंभीर शोधार्थियों की तैयारी; और तीसरा, एक उत्तरदायी पब्लिक इंटेलेक्चुअल का विकास।
वे समाजशास्त्र की अंतर्निहित क्षमता और समाजशास्त्री के कर्तव्य-बोध को राष्ट्र-निर्माण की संकल्पना से जोड़कर देखते थे। अपने जीवन की साधना के कारण उन्होंने एक प्रकार की अमरता अर्जित की है। वे भले ही हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित न हों, किंतु समाजशास्त्रीय विमर्श में सदैव जीवित रहेंगे।
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