भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भगत सिंह और महात्मा गांधी दो ऐसी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मार्ग में भिन्न होकर भी लक्ष्य में एक थीं। भगत सिंह के लिए क्रांति का अर्थ रक्तपात नहीं, बल्कि व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन था। उनके अनुसार, “मानव जीवन पवित्र है” और हिंसा का राजनीतिक महत्व केवल निर्णायक संघर्ष के लिए वातावरण तैयार करने तक ही सीमित था।
भगत सिंह की फांसी को लेकर अक्सर गांधीजी की आलोचना की जाती है। किंतु क्या भगत सिंह स्वयं बचना चाहते थे? जब उनके पिता ने ‘मर्सी पिटीशन’ (दया याचिका) लिखी, तो भगत सिंह उन पर अत्यंत क्रोधित हुए। वे जानते थे कि उनकी जीवित देह से कहीं अधिक प्रभावी उनकी शहादत होगी। उन्होंने विजय कुमार सिन्हा से कहा था, “अगर मैं बच गया तो सब कुछ खामोश हो जाएगा, लेकिन यदि मैं हंसते हुए मरा, तो भारत की माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की ख्वाहिश करेंगी।”
गांधी और भगत सिंह, दोनों की कार्यपद्धति में एक अद्भुत समानता थी—’साहस और पारदर्शिता’। वे जो कुछ भी ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध करते, उसकी पूर्व घोषणा करते थे। वे छिपकर वार करने वाले नहीं, माफीनामे शब्द दोनों के ही शब्दकोश में नहीं थे। दोनों ही अपने कृत्यों की पूरी जिम्मेदारी लेने वाले योद्धा थे। भगत सिंह ने बार-बार स्पष्ट किया कि उनके लिए मानव जीवन अत्यंत पावन है। उन्होंने कहा था, “हम मानवता की सेवा में अपना जीवन अर्पित कर देंगे—बजाय किसी को नुकसान पहुँचाने के।” उनके लिए ‘हत्या’ का राजनीतिक महत्व केवल उस हद तक था, जहाँ वह सोए हुए राष्ट्र की मानसिकता को झकझोर सके।
ठीक इसी प्रकार, गांधीजी का सत्याग्रह भी स्वयं पीड़ा झेलकर शत्रु का हृदय परिवर्तन करने का मार्ग था। गांधी का मानना था कि असली वीरता इसमें नहीं कि आप किसकी जान ले सकते हैं, बल्कि इसमें है कि आप अपने सिद्धांतों के लिए अपनी जान दे सकते हैं या नहीं। यही कारण है कि आज जो लोग गांधी पर कीचड़ उछालने के लिए भगत सिंह के नाम का सहारा लेते हैं, वे वास्तव में दोनों महापुरुषों के मूल दर्शन से अनभिज्ञ हैं।
जनतंत्र और क्रांति का स्वरूप
गांधीजी का तर्क था कि कोई भी हिंसात्मक संघर्ष स्वभाव से पूरी तरह जनतांत्रिक नहीं हो सकता। हिंसा का मार्ग चुनने पर आंदोलन संकुचित हो जाता है क्योंकि क्रांतिकारियों को भूमिगत होना पड़ता है, जिससे आम जनता—जो बंदूक नहीं चला सकती—जुड़ नहीं पाती। गांधी ने स्पष्ट कहा था, “मैं भगत सिंह के आंदोलन में शामिल नहीं हो सकता क्योंकि मैं बंदूक नहीं चला सकता, लेकिन भगत सिंह जब चाहें मेरे आंदोलन में शामिल हो सकते हैं।”
भगत सिंह भी इस बात को समझते थे। वे ‘डोमेनियन स्टेटस’ के नहीं, बल्कि ‘पूर्ण स्वराज’ के समर्थक थे, फिर भी उन्होंने गांधी के आह्वान पर साइमन कमीशन के बहिष्कार में भाग लिया। उनका मानना था कि जनता को सक्रिय करने वाला हर कदम, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, राष्ट्र को उसकी बेड़ियों के प्रति सचेत करता है। भगतसिंह को गांधीजी की एक सभा का दृश्य भी याद था जिसमें गांधीजी ने खचाखच भरे पंडाल में कहा था, ‘जब लाखों लोग एक जून का खाना तक जुटाने में समर्थ नहीं हैं, तब कैसे इन गरीब लोगों को आजादी के लिए हिंसक संघर्ष की बात सोची जा सकती है?
गांधीजी के प्रयास
उस कठिन समय में ब्रिटिश सरकार कांग्रेस के साथ गोलमेज कॉन्फ्रेंस की टेबल पर बैठकर किसी समझौते की मंशा में थी. लेकिन सरकार नहीं चाहती थी कि बातचीत के दौरान भारत और इंग्लैंड के बीच भगत सिंह की लाश रखी हो। इसी वजह से अंग्रेज़ फांसी देने में विलम्ब कर रहे थे, वे गांधीजी के साथ येन केन प्रकारेण समझौते की कोशिश कर रहे थे। वायसराय ने गांधी को प्रस्ताव दिया कि कराची कांग्रेस के संपन्न होने तक फांसी टाल दी जाए ताकि गांधी को जनता के आक्रोश का सामना न करना पड़े। गांधी की नैतिक दृढ़ता देखिए—उन्होंने इस ‘राहत’ को ठुकरा दिया। उन्होंने दो टूक कहा कि या तो फांसी पूरी तरह रद्द करें, मुझे कोई गुप्त राहत नहीं चाहिए। वे जानते थे कि फांसी का उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, लेकिन वे सिद्धांतों से समझौता करने को तैयार नहीं थे।
अंतिम प्रयास और कराची का आक्रोश
ऐतिहासिक दस्तावेज गवाह हैं कि गांधी ने अंतिम समय तक भगत सिंह की सजा कम कराने का प्रयास किया। 23 मार्च 1931 को वायसराय को लिखी अपनी अंतिम चिट्ठी में गांधी ने जनमत का हवाला देते हुए फांसी की सजा स्थगित की प्रार्थना की थी। उन्होंने लिखा, “दया कभी निष्फल नहीं जाती।” जब फांसी के अगले दिन गांधी कराची पहुंचे, तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। युवाओं ने ‘गांधीवाद का नाश हो’ के नारे लगाए और उन्हें काले फूलों की माला दी। गांधी विचलित नहीं हुए। उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा कि वे युवाओं के इस क्रोध को सही मानते हैं क्योंकि वे भगत सिंह को नहीं बचा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगाकर वायसराय को समझाने की कोशिश की थी।
एक सच्ची श्रद्धांजलि
आज जब हम इतिहास को देखते हैं, तो पाते हैं कि भगत सिंह और गांधी दोनों ही भारत माता के सच्चे सपूत थे। एक ने शहादत के ‘सौंदर्य’ से देश में देशभक्ति की लहर पैदा की, तो दूसरे ने सत्याग्रह की ‘वीरता’ से साम्राज्यवादी सत्ता की नींव हिला दी। भगत सिंह की क्रांति और गांधी की शांति, वास्तव में एक ही सिक्के के दो पहलू थे। आज इन दोनों महापुरुषों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बीच मतभेद खोजने के बजाय, इंकलाब और अहिंसा के उस साझा विचार और नैतिक साहस को समझें जिसके लिए उन्होंने अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया।
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