क्रांति, उपनिवेश और चेतना के बीच: ज्योतिबा फुले का द्वंद्वात्मक व्यक्तित्व

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ज्योतिबा फुले

Parichay Das

— परिचय दास —

न्नीसवीं शताब्दी का भारत केवल राजनीतिक अधीनता का भूगोल नहीं था, बल्कि वह सामाजिक जड़ताओं, जातिगत पदानुक्रम और वैचारिक असमानताओं का एक जटिल जाल भी था। ऐसे समय में ज्योतिबा फुले का उदय एक महत्वपूर्ण सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है। उन्हें केवल एक समाज-सुधारक कह देना उतना ही अधूरा है, जितना उन्हें औपनिवेशिक परियोजना का साधारण उपकरण घोषित कर देना। उनका व्यक्तित्व इन दोनों ध्रुवों के बीच जटिल रूप से फैला हुआ है।

फुले का कार्यक्षेत्र मूलतः जाति-आधारित उत्पीड़न, स्त्री-अशिक्षा और सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध था। उन्होंने 1848 में स्त्रियों के लिए पहला विद्यालय खोला, जो उस समय के सामाजिक परिवेश में एक असाधारण घटना थी। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि उनका यह कदम केवल शिक्षा का विस्तार नहीं था, बल्कि ज्ञान के एकाधिकार को तोड़ने का प्रयास था। यह प्रयास उस ब्राह्मणवादी संरचना के विरुद्ध था, जिसने सदियों तक शिक्षा को सीमित वर्ग के भीतर बंद रखा।

किन्तु फुले की इस क्रांतिकारी चेतना का निर्माण एक निर्वात में नहीं हुआ। उन्होंने जिस शिक्षा-प्रणाली से स्वयं को गढ़ा, वह औपनिवेशिक शिक्षा-व्यवस्था का हिस्सा थी। पुणे के स्कॉटिश मिशन हाई स्कूल में उनकी शिक्षा ने उन्हें एक वैकल्पिक दृष्टि प्रदान की, जिसमें ईसाई नैतिकता, यूरोपीय प्रगतिवाद और तर्कवाद का प्रभाव था। यह वही बिंदु है जहाँ से उनके विचारों में औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रवेश दिखाई देता है।

इसी संदर्भ में एंटोनियो ग्राम्शी की “सांस्कृतिक वर्चस्व” की अवधारणा उपयोगी हो जाती है। फुले ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती दी परंतु इस चुनौती के लिए उन्होंने जिन वैचारिक औजारों का उपयोग किया, वे स्वयं औपनिवेशिक विमर्श से निर्मित थे। इस अर्थ में उनका संघर्ष एक वर्चस्व को तोड़ते हुए दूसरे वर्चस्व की छाया में खड़ा दिखाई देता है।

“गुलामगिरी” पुस्तक में ज्योतिबा फुले द्वारा ब्रिटिश शासन को “ईश्वर का वरदान” कहना इसी तरह का कथन है, जिसका तार्किक परीक्षण आवश्यक है।

पहला प्रश्न यह है कि क्या कोई औपनिवेशिक सत्ता, जिसका मूल उद्देश्य आर्थिक शोषण और राजनीतिक वर्चस्व हो, वास्तव में किसी समाज के लिए “दैवीय वरदान” हो सकती है? ब्रिटिश शासन का प्राथमिक लक्ष्य भारत के संसाधनों का दोहन था, न कि सामाजिक न्याय की स्थापना। दादाभाई नौरोजी ने “ड्रेन ऑफ वेल्थ” सिद्धांत के माध्यम से स्पष्ट किया कि भारत की संपत्ति व्यवस्थित रूप से इंग्लैंड भेजी जा रही थी। ऐसी सत्ता को मुक्ति का माध्यम कहना वस्तुतः उसके शोषणकारी चरित्र की उपेक्षा करना है।

दूसरा, यदि ब्रिटिश शासन वास्तव में शूद्रों का मुक्तिदाता होता तो वह सामाजिक समानता को संस्थागत रूप देता किंतु औपनिवेशिक प्रशासन ने जाति-व्यवस्था को समाप्त करने के बजाय उसे प्रशासनिक सुविधा के लिए और अधिक संगठित किया।

जनगणनाओं, कानूनों और नौकरशाही वर्गीकरणों के माध्यम से जातिगत पहचान को स्थिर और कठोर बनाया गया। इस प्रकार, जिस व्यवस्था को फुले अत्याचार का स्रोत मानते थे, उसे ब्रिटिश शासन ने चुनौती देने के बजाय कई स्तरों पर संरक्षित किया।

तीसरा, “ईश्वर का वरदान” जैसी भाषा स्वयं आलोचनात्मक विवेक को बाधित करती है। यह तर्क नहीं, आस्था का रूप है। फ्रांत्ज़ फैनन के अनुसार, उपनिवेशित समाज अक्सर उपनिवेशक को “मुक्तिदाता” के रूप में देखने लगता है क्योंकि वह अपने तत्काल शत्रु से मुक्ति की आकांक्षा में एक बाहरी शक्ति पर निर्भर हो जाता है। फुले का यह कथन इसी मानसिक स्थिति का उदाहरण माना जा सकता है, जहाँ ब्राह्मणवादी उत्पीड़न के विरोध में ब्रिटिश सत्ता को नैतिक वैधता प्रदान कर दी जाती है।

चौथा, किसी भी सामाजिक परिवर्तन का स्थायित्व बाहरी सत्ता पर नहीं, आंतरिक चेतना और संघर्ष पर निर्भर करता है। यदि शूद्रों की मुक्ति का आधार ब्रिटिश शासन होता तो स्वतंत्रता के बाद वह मुक्ति स्वतः समाप्त हो जानी चाहिए थी परंतु वास्तविकता यह है कि सामाजिक न्याय की दिशा में जो भी प्रगति हुई, वह भारतीय समाज के भीतर से उठे आंदोलनों, सुधारकों और संवैधानिक प्रयासों का परिणाम है।

फुले का यह कथन उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझा जा सकता है—जहाँ वे एक अन्यायी सामाजिक संरचना के विरुद्ध किसी भी संभावित सहयोगी की ओर देख रहे थे किंतु इसे सार्वभौमिक सत्य मान लेना उचित नहीं है। औपनिवेशिक सत्ता कभी भी निष्काम मुक्तिदाता नहीं होती; वह अपने हितों के अनुरूप सीमित परिवर्तन कर सकती है पर “वास्तविक मुक्ति का स्रोत नहीं बन सकती”।

ब्रिटिश शासन को “ईश्वर का वरदान” कहना न तो ऐतिहासिक रूप से सटीक है, न ही तार्किक रूप से टिकाऊ। यह एक पीड़ित चेतना की प्रतिक्रिया है, न कि एक ठोस राजनीतिक-सामाजिक सत्य।

फुले की रचनाओं, विशेषकर “गुलामगिरी” में ब्रिटिश शासन को शूद्रों के लिए संभावित मुक्ति-शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसे केवल राजनीतिक रणनीति मानकर टाल देना पर्याप्त नहीं होगा। जैसा कि इस निबंध में पहले ही कहा गया है , फ्रांत्ज़ फैनन की उस धारणा की याद करना होगा , जिसमें उपनिवेशित व्यक्ति उपनिवेशक को मुक्तिदाता के रूप में देखने लगता है। फुले के भीतर यह प्रवृत्ति कहीं-कहीं स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

“शेतकऱ्याचा आसूड” में उनका ब्रिटिश प्रशासन से किसानों की रक्षा की अपील करना भी इसी प्रवृत्ति का विस्तार है। होमी के. भाभा के “colonial dependence” के सिद्धांत के अनुसार, यह वह स्थिति है जिसमें उपनिवेशित समाज अपनी मुक्ति की आशा भी उपनिवेशक से ही करता है। फुले का यह दृष्टिकोण इसी जटिलता को उजागर करता है।

फुले के वैचारिक ढाँचे में एकेश्वरवाद की जो अवधारणा उभरती है, वह पारंपरिक हिंदू बहुदेववाद से भिन्न है। उनके “निर्मिक” की संकल्पना में ईसाई और इस्लामी एकेश्वरवाद की झलक मिलती है। यह प्रभाव उनके मिशनरी संपर्कों और शिक्षा का परिणाम माना जा सकता है। अल्बेयर मेम्मी के अनुसार, जब उपनिवेशित बुद्धिजीवी उपनिवेशक की नैतिक संरचनाओं का उपयोग कर अपने समाज की आलोचना करता है तो वह अनजाने में उपनिवेशवाद की वैचारिक स्वीकृति भी देता है।

फुले का ब्राह्मणवाद-विरोध कई बार अत्यंत तीखी भाषा में व्यक्त हुआ है। यह भाषा दार्शनिक विवेचना की अपेक्षा अधिक आक्रामक और प्रतिरोधात्मक है। इसे उनकी सीमाओं के रूप में देखा जा सकता है, परंतु इसे उनके ऐतिहासिक संदर्भ से काटकर नहीं समझा जा सकता। जिस सामाजिक अपमान और बहिष्कार का अनुभव शूद्र और अतिशूद्र वर्गों ने किया, उसके भीतर से निकलने वाली भाषा का तीखा होना स्वाभाविक था।

यह भी उल्लेखनीय है कि फुले ने भारतीय परंपरा के भीतर मौजूद वैकल्पिक विचारधाराओं, जैसे बौद्ध या लोकायत परंपरा, का अपेक्षाकृत कम उपयोग किया। इसके स्थान पर उन्होंने “आर्य आक्रमण सिद्धांत” को अपनाया, जो औपनिवेशिक ज्ञान-उत्पादन की उपज था। एडवर्ड सईद के “ओरिएंटलिज्म” के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि फुले का विश्लेषण उस ज्ञान-ढाँचे से प्रभावित था, जिसे यूरोप ने पूर्व के लिए निर्मित किया था।

फिर भी, इस आलोचना के बीच यह नहीं भूलना चाहिए कि फुले का मूल लक्ष्य सामाजिक न्याय था। “सत्यशोधक समाज” की स्थापना के माध्यम से उन्होंने जाति-आधारित भेदभाव को चुनौती दी और एक वैकल्पिक सामाजिक संरचना की कल्पना की। यह संगठन यूरोपीय सुधार-समाजों से प्रेरित अवश्य था, परंतु उसका लक्ष्य भारतीय समाज की विशिष्ट समस्याओं का समाधान करना था।

फुले का 1857 के विद्रोह के प्रति दृष्टिकोण भी विवादास्पद रहा है। उन्होंने इसे उच्च जातियों के हितों की रक्षा का प्रयास माना। यह दृष्टिकोण उनकी जाति-केन्द्रित समझ को दर्शाता है परंतु इसमें औपनिवेशिक सत्ता के प्रति एक प्रकार का विश्वास भी अंतर्निहित है। यही वह बिंदु है जहाँ उनका व्यक्तित्व सबसे अधिक द्वंद्वात्मक प्रतीत होता है।

उन्हें ब्रिटिश प्रशासन द्वारा सम्मानित किया जाना और उनका स्वयं सरकार से सहायता माँगना, इस संबंध को और जटिल बनाता है। इसे केवल “सांठगांठ” कहना सरलीकरण होगा और इसे पूरी तरह नकारना भी बौद्धिक ईमानदारी के विरुद्ध होगा। यह संबंध उस ऐतिहासिक परिस्थिति का परिणाम था, जहाँ एक शोषित वर्ग का नेता अपने तत्काल शत्रु के विरुद्ध उपलब्ध किसी भी शक्ति का उपयोग करने को बाध्य था।

फुले का मूल्यांकन एकरेखीय नहीं हो सकता। वे न तो केवल औपनिवेशिक परियोजना के उत्पाद थे, न ही पूर्णतः स्वदेशी क्रांतिकारी। वे उस संक्रमणकालीन चेतना के प्रतिनिधि थे, जिसमें परंपरा, आधुनिकता, प्रतिरोध और निर्भरता एक साथ उपस्थित थे।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने भारतीय समाज के भीतर छिपी हुई असमानताओं को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाया। उनकी सबसे बड़ी सीमा यह थी कि इस विमर्श के लिए उन्होंने जिन वैचारिक उपकरणों का उपयोग किया, वे स्वयं एक अन्य वर्चस्व की छाया से मुक्त नहीं थे।


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