— परिचय दास —
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 25 जून , 1975 की रात केवल एक तिथि नहीं है बल्कि वह एक ऐसा मोड़ है जहाँ सत्ता और स्वतंत्रता, संविधान और नागरिक अधिकार, राज्य और समाज के संबंधों की वास्तविक परीक्षा हुई। आधी रात को घोषित आपातकाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है बल्कि वह संस्थाओं, असहमतियों, नागरिक स्वतंत्रताओं और नैतिक राजनीतिक संस्कृति का भी नाम है। आज, पाँच दशकों के निकट पहुँचते हुए, आपातकाल को केवल इतिहास की एक घटना की तरह नहीं बल्कि एक निरंतर चेतावनी की तरह पढ़ा जाना चाहिए।
आपातकाल की पृष्ठभूमि में अनेक राजनीतिक और सामाजिक कारण थे। देश आर्थिक संकट, महँगाई, बेरोजगारी और राजनीतिक असंतोष से गुजर रहा था। गुजरात और बिहार के छात्र आंदोलनों ने सत्ता के विरुद्ध जनमत तैयार किया। बिहार में लोकनायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन केवल सरकार-विरोधी अभियान नहीं था, बल्कि राजनीतिक नैतिकता की पुनर्स्थापना का आह्वान भी था। दूसरी ओर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किए जाने के बाद राजनीतिक संकट और गहरा गया। इसी संदर्भ में आपातकाल लागू किया गया।
आपातकाल के दौरान संविधान के अनेक मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों को जेलों में बंद कर दिया गया। लोकतंत्र की आत्मा कही जाने वाली असहमति को राष्ट्र-विरोध की तरह देखा जाने लगा। सत्ता का केंद्रीकरण अपने चरम पर पहुँच गया। संसद, न्यायपालिका और मीडिया जैसी संस्थाएँ अभूतपूर्व दबाव में आ गईं।
समकालीन दृष्टि से देखें तो आपातकाल का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उस समय क्या हुआ था, बल्कि यह है कि वह क्यों संभव हुआ। किसी भी लोकतंत्र में संस्थाएँ तभी कमजोर होती हैं जब समाज सत्ता को प्रश्नों से मुक्त कर देता है। आपातकाल ने दिखाया कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान की धाराएँ नहीं करतीं; उसके लिए जागरूक नागरिकता, स्वतंत्र मीडिया और सशक्त संस्थागत संस्कृति भी आवश्यक होती है।
फिर भी आपातकाल का मूल्यांकन एकांगी नहीं होना चाहिए। उसके समर्थक आज भी यह तर्क देते हैं कि उस अवधि में प्रशासनिक अनुशासन बढ़ा, रेलगाड़ियाँ समय पर चलने लगीं, सरकारी कामकाज में तेजी आई और विकास कार्यक्रमों को गति मिली। लेकिन प्रश्न यह है कि यदि व्यवस्था और अनुशासन नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर प्राप्त किए जाएँ, तो क्या उन्हें लोकतांत्रिक उपलब्धि कहा जा सकता है? जेल की व्यवस्था भी अत्यंत अनुशासित होती है, किंतु वह स्वतंत्र समाज का आदर्श नहीं बन सकती।
समकालीन भारत में आपातकाल की चर्चा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाती है। एक पक्ष इसे लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला बताता है, तो दूसरा पक्ष वर्तमान समय की विभिन्न घटनाओं की तुलना उससे करने लगता है। किंतु इतिहास का गंभीर अध्ययन राजनीतिक नारों से आगे बढ़कर किया जाना चाहिए। आपातकाल को केवल किसी एक दल या व्यक्ति की भूल के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का परिणाम भी था जिसमें सत्ता को चुनौती देने वाली आवाजों को असुविधा की तरह देखा जाने लगा था।
साहित्य और पत्रकारिता ने भी आपातकाल की स्मृति को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अनेक लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस समय की दमनकारी परिस्थितियों को अभिव्यक्ति दी। सेंसरशिप के वातावरण में संकेत, प्रतीक और रूपक प्रतिरोध की भाषा बन गए। साहित्य ने उस दौर में यह सिद्ध किया कि शब्दों को पूरी तरह कैद नहीं किया जा सकता। सत्ता अखबारों की सुर्खियाँ नियंत्रित कर सकती है, लेकिन स्मृति और संवेदना पर उसका स्थायी अधिकार नहीं होता।
आज जब डिजिटल माध्यमों ने सूचना के प्रवाह को अत्यंत तीव्र बना दिया है, तब आपातकाल की स्मृति और भी प्रासंगिक हो जाती है। अब अभिव्यक्ति के नए मंच हैं, किंतु नियंत्रण और निगरानी की नई तकनीकें भी हैं। इसलिए लोकतंत्र की रक्षा का प्रश्न केवल अतीत का प्रश्न नहीं है। हर पीढ़ी को अपने समय में यह सुनिश्चित करना होता है कि असहमति का अधिकार सुरक्षित रहे, संस्थाएँ स्वतंत्र रहें और सत्ता जनता के प्रति उत्तरदायी बनी रहे।
आपातकाल का सबसे बड़ा पाठ यह है कि लोकतंत्र कोई स्थायी उपलब्धि नहीं है। उसे निरंतर अर्जित करना पड़ता है। संविधान केवल एक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि 25 जूननागरिक चेतना का जीवित अनुबंध है। जब समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है, जब संस्थाएँ अपनी स्वायत्तता खो देती हैं और जब सत्ता स्वयं को राष्ट्र का पर्याय मानने लगती है, तब लोकतंत्र का संकट आरंभ होता है।
1975 का आपातकाल इसलिए याद रखा जाना चाहिए कि भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न हो। यह स्मृति प्रतिशोध की नहीं, सतर्कता की स्मृति है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता के विस्तार में नहीं, बल्कि सत्ता पर लगाए गए संवैधानिक और नैतिक नियंत्रणों में निहित होती है। भारतीय लोकतंत्र ने आपातकाल का अनुभव किया, उससे बाहर निकला और स्वयं को पुनर्स्थापित किया। यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, और यही उस इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी।
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