— परिचय दास —
आपातकाल के समर्थक साहित्यकारों पर पुनर्विचार करते समय सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि साहित्य और सत्ता का संबंध सदैव जटिल रहा है। लेखक स्वयं को चाहे कितना भी स्वतंत्र घोषित करे, उसके सामने सत्ता, प्रतिष्ठा, पुरस्कार, संस्थागत पद, अकादमिक प्रभाव और सार्वजनिक पहचान जैसे अनेक आकर्षण उपस्थित रहते हैं। आपातकाल के समय यह आकर्षण और भी तीव्र था क्योंकि उस दौर में राज्य केवल शासन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक संसाधनों का भी सबसे बड़ा नियंत्रक था। ऐसे में कुछ साहित्यकारों ने प्रतिरोध का मार्ग चुना, जबकि कुछ ने समर्थन का।
पुनर्विचार का एक महत्वपूर्ण पक्ष सत्ता-निष्ठा का है। साहित्यकार से अपेक्षा की जाती है कि वह व्यक्ति या दल का नहीं, मूल्यों का पक्षधर होगा। लेकिन आपातकाल के समय कुछ लेखकों की निष्ठा लोकतांत्रिक मूल्यों से अधिक सत्तारूढ़ नेतृत्व के प्रति दिखाई दी। यह स्थिति तब और विडंबनापूर्ण हो जाती है जब वही लेखक अपनी रचनाओं में स्वतंत्रता, न्याय, मनुष्यता और प्रतिरोध की बातें करते हों। ऐसे मामलों में साहित्य और जीवन के बीच एक गहरी खाई दिखाई देती है। लेखक की वाणी और उसका सार्वजनिक आचरण एक-दूसरे के विरुद्ध खड़े नजर आते हैं।
अवसरवाद का प्रश्न भी यहाँ महत्वपूर्ण है। इतिहास यह बताता है कि हर दौर में कुछ बुद्धिजीवी सत्ता के निकट जाकर अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करते हैं। पुरस्कार, समितियाँ, अकादमिक पद, सांस्कृतिक संस्थानों का नियंत्रण और सरकारी संरक्षण अनेक लोगों को आकर्षित करता है। यह कहना उचित नहीं होगा कि हर समर्थक लेखक अवसरवादी था, लेकिन यह मानने में भी संकोच नहीं होना चाहिए कि कुछ लोगों ने आपातकाल को अपने सार्वजनिक प्रभाव और व्यक्तिगत उन्नति के अवसर के रूप में देखा। लोकतंत्र के संकट में भी यदि किसी लेखक की प्राथमिक चिंता अपनी स्थिति सुरक्षित रखना हो, तो यह साहित्यिक नैतिकता की दृष्टि से गंभीर प्रश्न है।
सत्ता के निकट रहने का एक दुष्परिणाम आलोचनात्मक विवेक का क्षरण भी है। लेखक का सबसे बड़ा गुण संदेह और प्रश्न करने की क्षमता होती है। वह स्थापित सत्य को भी चुनौती देता है। किंतु जब वही लेखक सत्ता के प्रति अत्यधिक अनुरक्त हो जाता है, तब उसका आलोचनात्मक स्वभाव कमजोर पड़ने लगता है। वह असहमति को राष्ट्रविरोध, अनुशासनहीनता या अराजकता के रूप में देखने लगता है। आपातकाल के दौरान कुछ साहित्यिक वक्तव्यों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है। लोकतांत्रिक असहमति को संदेह की दृष्टि से देखना वस्तुतः साहित्य की मूल आत्मा के विरुद्ध था।
एक अन्य नकारात्मक पक्ष नैतिक द्वैध का है। अनेक लेखकों ने अपने साहित्य में उत्पीड़ितों, वंचितों और शोषितों की आवाज़ उठाई, लेकिन जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा, तब वे अपेक्षित दृढ़ता से नहीं बोले। यह द्वैध साहित्यिक इतिहास में दर्ज है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या लेखक की संवेदना केवल रचना तक सीमित थी, या वह सार्वजनिक जीवन में भी उतनी ही सक्रिय थी। किसी लेखक की महानता केवल उसके शब्दों में नहीं, बल्कि उन मूल्यों में भी होती है जिनके लिए वह जोखिम उठाने को तैयार हो।
कुछ मामलों में वैचारिक अहंकार भी दिखाई देता है। कुछ बुद्धिजीवियों को यह विश्वास था कि वे जनता से अधिक जानते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ विकास में बाधा हैं। इसलिए उन्हें कठोर शासन में संभावनाएँ दिखाई दीं। यह दृष्टिकोण अंततः अभिजनवादी था। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी अव्यवस्थित और बहुवचन प्रकृति में होती है। जो लेखक इस जटिलता को स्वीकार नहीं कर पाता, वह अक्सर केंद्रीकृत शक्ति के प्रति आकर्षित हो जाता है।
पुनर्विचार का अर्थ यह भी है कि हम साहित्यिक प्रतिष्ठा के आवरण को हटाकर लेखक को एक ऐतिहासिक मनुष्य की तरह देखें। भारतीय साहित्य में कुछ नाम इतने बड़े हैं कि उनके राजनीतिक निर्णयों पर चर्चा करते समय लोग असहज हो जाते हैं। किंतु साहित्यिक सम्मान आलोचनात्मक समीक्षा से छूट का प्रमाणपत्र नहीं है। जिस प्रकार हम किसी राजनेता या प्रशासक के निर्णयों की समीक्षा करते हैं, उसी प्रकार साहित्यकारों की भी करनी चाहिए। अन्यथा साहित्य स्वयं एक प्रकार की पवित्र मूर्ति-पूजा में बदल जाएगा।
फिर भी सावधानी आवश्यक है। किसी लेखक को केवल आपातकाल संबंधी उसके रुख के आधार पर पूरी तरह खारिज कर देना भी इतिहास के साथ अन्याय होगा। मनुष्य विरोधाभासों से बना होता है। कोई लेखक अपने साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है और साथ ही किसी ऐतिहासिक क्षण में गंभीर राजनीतिक भूल भी कर सकता है। पुनर्विचार का उद्देश्य संतुलित मूल्यांकन होना चाहिए, न कि प्रतिशोध।
आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो पाते हैं कि आपातकाल का सबसे बड़ा सबक यही है कि साहित्यकार की वास्तविक परीक्षा उसके लेखन कौशल की नहीं, उसकी स्वतंत्र चेतना की होती है। सत्ता के निकट रहकर प्रशंसा लिखना सरल है; सत्ता के विरुद्ध सच कहना कठिन। इतिहास अंततः लेखकों को उनकी अलंकारिक भाषा से कम और उनके नैतिक साहस से अधिक याद रखता है।
इस दृष्टि से आपातकाल समर्थक साहित्यकारों पर पुनर्विचार केवल अतीत की चर्चा नहीं है। यह वर्तमान और भविष्य के लिए भी एक चेतावनी है कि जब भी सत्ता और स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी हों, तब साहित्यकार का स्थान कहाँ होना चाहिए। यदि साहित्य सत्य, स्वतंत्रता और मनुष्य की गरिमा का पक्ष नहीं लेता, तो वह चाहे कितना ही कलात्मक क्यों न हो, उसकी नैतिक चमक धीरे-धीरे मद्धिम पड़ने लगती है। सत्ता से प्राप्त सम्मान क्षणिक होते हैं, लेकिन स्वतंत्र चेतना का मूल्य इतिहास बहुत लंबे समय तक याद रखता है।
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