
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था बल्कि वह भारतीय भाषाओं की आत्मा की परीक्षा का समय भी था। जून , 1975 की वह रात जब देश पर आपातकाल लागू हुआ, तब केवल राजनीतिक दलों की स्वतंत्रता ही सीमित नहीं हुई; शब्दों की स्वतंत्रता भी संदेह के घेरे में आ गई। अख़बारों की स्याही पर निगरानी बैठ गई, संपादकों की मेज़ों पर सरकारी निर्देश आने लगे, कवियों की पंक्तियाँ संदेहास्पद समझी जाने लगीं और लेखकों की बैठकों पर भी शासन की दृष्टि पड़ने लगी। उस समय भारत की विविध भाषाओं का साहित्य एक अदृश्य मोर्चे पर खड़ा था।
दिल्ली से लेकर गुवाहाटी तक, अहमदाबाद से लेकर तिरुवनंतपुरम तक और पटना से लेकर बेंगलुरु तक, साहित्यकारों ने अपने-अपने ढंग से इस दौर का सामना किया। कुछ जेल गए, कुछ ने पुरस्कार लौटाए, कुछ ने प्रतिरोधी कविताएँ लिखीं, कुछ ने सांकेतिक भाषा में विरोध दर्ज किया और कुछ ने अपने मौन को भी एक प्रकार की असहमति बना दिया।
हिंदी साहित्य में इस प्रतिरोध का सबसे चमकदार नाम नागार्जुन का है। वे कवि कम, लोकचेतना के प्रहरी अधिक प्रतीत होते हैं। उनकी कविताएँ किसी बंद कमरे में नहीं लिखी गई थीं; वे जनता के बीच से निकलती थीं और सत्ता के दरवाज़े पर दस्तक देती थीं। उन्होंने इंदिरा गांधी की नीतियों पर खुला प्रहार किया। उनकी कविता में व्यंग्य भी था, क्रोध भी और लोकतंत्र के प्रति गहरी निष्ठा भी। जेल की सलाखें उनके शब्दों को रोक नहीं सकीं। वे उन दुर्लभ कवियों में थे जिनकी कविता और नागरिक साहस एक-दूसरे का विस्तार बन गए।
अज्ञेय का नाम आपातकाल-विरोधी साहित्यिक चेतना के महत्वपूर्ण प्रतिनिधियों में लिया जाता है। यद्यपि वे नागार्जुन की तरह जेल नहीं गए और न ही भवानी प्रसाद मिश्र की तरह प्रतिदिन प्रतिरोध-कविताएँ लिखीं, फिर भी उनका वैचारिक और नैतिक रुख लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के पक्ष में था।
आपातकाल के समय अज्ञेय भारतीय बौद्धिक जगत के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों में थे। उनकी प्रतिष्ठा केवल हिंदी तक सीमित नहीं थी। वे कवि, कथाकार, संपादक, चिंतक और आधुनिक भारतीय साहित्य के प्रमुख निर्माताओं में से थे। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और असहमति को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा, तब अज्ञेय उन बुद्धिजीवियों में थे जिन्होंने इस प्रवृत्ति को लोकतंत्र के लिए घातक माना।
अज्ञेय का पूरा साहित्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और आंतरिक स्वायत्तता के विचार पर आधारित है। उनकी रचनाओं में “व्यक्ति” केवल समाज का एक पुर्जा नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र चेतना है। इसलिए आपातकाल जैसी व्यवस्था, जिसमें राज्य व्यक्ति के ऊपर असाधारण नियंत्रण स्थापित कर रहा था, उनकी मूल साहित्यिक दृष्टि के प्रतिकूल थी।
उनकी भूमिका प्रत्यक्ष राजनीतिक आंदोलनकारी की नहीं थी। वे न तो मंचीय नेता थे और न ही जेल-यात्रा को अपनी राजनीतिक पहचान बनाना चाहते थे। उनका प्रतिरोध मुख्यतः बौद्धिक और वैचारिक था। वे मानते थे कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा आधार स्वतंत्र विचार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति है। यदि लेखक भय में जीने लगे, तो साहित्य का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।
अज्ञेय की विशेषता यह थी कि वे किसी राजनीतिक दल के लेखक नहीं थे। उन्होंने जीवन भर वैचारिक स्वतंत्रता को महत्त्व दिया। इसी कारण वे वाम और दक्षिण, दोनों प्रकार के कट्टर आग्रहों से दूरी बनाए रखते थे। आपातकाल के दौरान उनका विरोध भी किसी दलगत राजनीति से प्रेरित नहीं था बल्कि नागरिक स्वतंत्रता की चिंता से प्रेरित था।
दिलचस्प बात यह है कि उस समय हिंदी साहित्य का एक हिस्सा सत्ता के प्रति नरम था, जबकि दूसरा हिस्सा प्रतिरोध में खड़ा था। अज्ञेय प्रतिरोधी पक्ष की बौद्धिक गरिमा का प्रतिनिधित्व करते थे। यदि नागार्जुन सड़क की आवाज़ थे, तो अज्ञेय विवेक की आवाज़ थे। यदि नागार्जुन का प्रतिरोध जनकवि का प्रतिरोध था तो अज्ञेय का प्रतिरोध स्वतंत्र बुद्धिजीवी का प्रतिरोध था।
उनकी संपादकीय परंपरा भी महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाओं और बौद्धिक विमर्श के माध्यम से स्वतंत्र चिंतन की संस्कृति विकसित की थी। इसलिए आपातकाल के दौरान उनकी उपस्थिति मात्र एक लेखक की उपस्थिति नहीं थी; वह स्वतंत्र बौद्धिक परंपरा की उपस्थिति थी।
आपातकाल पर विचार करते समय अज्ञेय का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने यह दिखाया कि लेखक का प्रतिरोध केवल जेल जाने या नारे लगाने से ही व्यक्त नहीं होता। कभी-कभी स्वतंत्र विचार की रक्षा करना, सत्ता से आलोचनात्मक दूरी बनाए रखना और व्यक्ति की गरिमा पर आग्रह करना भी प्रतिरोध का ही रूप होता है।
इस दृष्टि से अज्ञेय भारतीय साहित्य में उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं जो मानती है कि साहित्य का पहला दायित्व मनुष्य की स्वतंत्र चेतना की रक्षा करना है। सत्ता चाहे किसी भी विचारधारा की हो, यदि वह स्वतंत्रता को सीमित करती है तो लेखक का विवेक उसके सामने प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा होना चाहिए। अज्ञेय का साहित्य और उनका सार्वजनिक बौद्धिक व्यक्तित्व इसी विश्वास का प्रमाण है।
फणीश्वरनाथ रेणु का प्रतिरोध अधिक नैतिक और शांत दिखाई देता है। उन्होंने सरकारी सम्मान लौटाकर यह संकेत दिया कि लेखक की गरिमा किसी पदक या प्रशस्ति से बड़ी होती है। रेणु का विरोध किसी मंचीय घोषणा की तरह नहीं था; वह उनके व्यक्तित्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति था। उन्होंने दिखाया कि साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार लेखक का स्वतंत्र विवेक है।
भवानी प्रसाद मिश्र ने प्रतिदिन कविताएँ लिखकर लोकतंत्र की पीड़ा को शब्द दिए। उनकी रचनाएँ उस समय के भय और घुटन की साक्षी हैं। वे जेल नहीं गए, लेकिन उनकी कविता स्वयं एक प्रतिरोधी दस्तावेज़ बन गई। ऐसा लगता है मानो वे हर दिन लोकतंत्र की नाड़ी टटोल रहे हों और उसकी धड़कनों को शब्दों में बदल रहे हों।
मराठी साहित्य में दुर्गा भागवत का व्यक्तित्व किसी किंवदंती की तरह उभरता है। उम्र के उस पड़ाव पर जब अधिकांश लोग संघर्ष से दूरी बना लेते हैं, उन्होंने सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। उन्हें जेल जाना पड़ा, पर उनका आत्मविश्वास नहीं टूटा। महाराष्ट्र के साहित्यिक समाज में वे केवल लेखिका नहीं, नैतिक साहस की प्रतिमा बन गईं। उनके साथ अनेक पत्रकार, संपादक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा में सक्रिय रहे।
पु. ल. देशपांडे का स्वर व्यंग्य और मानवीय संवेदना का स्वर था। उन्होंने बाद के वर्षों में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के पक्ष में स्पष्ट हस्तक्षेप किया। महाराष्ट्र की छोटी पत्रिकाएँ और वैचारिक मंच उस समय लोकतांत्रिक चेतना के आश्रय-स्थल बन गए थे। सेंसरशिप के बावजूद शब्द अपनी राह खोज लेते थे।
गुजरात का परिदृश्य विशेष रूप से उग्र था। नव निर्माण आंदोलन की स्मृतियाँ अभी ताज़ा थीं। छात्र, पत्रकार, लेखक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता पहले से राजनीतिक चेतना से भरे हुए थे। उमाशंकर जोशी जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों ने लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में नैतिक हस्तक्षेप किया। रघुवीर चौधरी और अन्य लेखकों ने स्वतंत्रता के प्रश्न को साहित्यिक विमर्श का केंद्र बनाया। गुजरात की अनेक साहित्यिक गोष्ठियाँ उस समय लोकतंत्र की अनौपचारिक संसद बन गई थीं।
कन्नड़ साहित्य में लोकतंत्र के पक्ष में एक गहरी वैचारिक बेचैनी दिखाई देती है। यू. आर. अनंतमूर्ति ने बाद में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र की गंभीर भूलों में गिना। कर्नाटक के साहित्यिक जगत में स्वतंत्रता, असहमति और नागरिक अधिकारों पर व्यापक चर्चा हुई। वहाँ के लेखकों ने यह प्रश्न उठाया कि यदि लेखक भी डरने लगे तो समाज की अंतरात्मा कौन बचाएगा।
बांग्ला साहित्य का वातावरण कुछ अलग था। कोलकाता के कॉफी हाउसों, लघु पत्रिकाओं और साहित्यिक मंचों पर बहसें चल रही थीं। कुछ लेखक सत्ता की आलोचना कर रहे थे, कुछ संशय में थे और कुछ वैचारिक दुविधा में। लेकिन यह निर्विवाद है कि बांग्ला साहित्यिक संस्कृति ने सेंसरशिप को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया। छोटे-छोटे प्रकाशन केंद्र असहमति के गुप्त द्वीप बन गए थे।
असमिया साहित्य में प्रतिरोध अधिक सांकेतिक दिखाई देता है। असम की सांस्कृतिक चेतना पहले से ही अपनी पहचान और अधिकारों के प्रश्नों से जूझ रही थी। अनेक युवा लेखक और पत्रकार सरकारी निगरानी में रहे। उनकी रचनाओं में प्रत्यक्ष राजनीतिक नारों की अपेक्षा रूपक, प्रतीक और संकेत अधिक दिखाई देते हैं। परंतु उस संकेत भाषा के भीतर स्वतंत्रता की बेचैनी स्पष्ट सुनाई देती है।
ओड़िया साहित्य में भी नागरिक स्वतंत्रता के प्रश्न ने लेखकों को विचलित किया। साहित्यिक सभाएँ, पत्र-पत्रिकाएँ और सांस्कृतिक मंच एक अनकहे भय के बीच काम कर रहे थे। कविताएँ केवल कविताएँ नहीं रह गई थीं; वे कभी-कभी प्रशासन की दृष्टि में राजनीतिक वक्तव्य बन जाती थीं। ओड़िशा के अनेक पत्रकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने दबाव झेला, किंतु अभिव्यक्ति की लौ बुझने नहीं दी।
तेलुगु क्षेत्र में साहित्य और जनसंस्कृति का संबंध बहुत गहरा था। अनेक कवि, लोकगायक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता निगरानी में रहे। बाद में प्रसिद्ध हुए वरवर राव और प्रतिरोधी सांस्कृतिक धाराओं की पृष्ठभूमि इसी वातावरण में विकसित हुई। यहाँ कविता केवल पुस्तक का विषय नहीं थी; वह जनसभा, गीत और संघर्ष की भाषा भी थी।
पंजाबी साहित्य में अवतार सिंह पाश का नाम विशेष महत्व रखता है। यद्यपि उनकी ख्याति बाद के वर्षों में अधिक फैली, किंतु उनकी पूरी काव्य-दृष्टि सत्ता के प्रति संशय और स्वतंत्रता के प्रति निष्ठा से निर्मित थी। उनकी कविता में मनुष्य की गरिमा सर्वोच्च मूल्य के रूप में उपस्थित रहती है।
मलयालम साहित्य में ओ. वी. विजयन जैसे लेखकों ने सत्ता और व्यक्ति के संबंधों को गहराई से समझा। उनकी रचनाओं में स्वतंत्रता का प्रश्न केवल राजनीतिक नहीं, अस्तित्वगत प्रश्न बन जाता है। केरल की पत्रकारिता और साहित्यिक संस्कृति ने भी सेंसरशिप के विरुद्ध अपने तरीके से प्रतिरोध दर्ज किया।
तमिल साहित्य में अनेक लेखकों और पत्रकारों ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर बहस की। क्षेत्रीय राजनीति और केंद्र के संबंधों ने वहाँ की स्थिति को और जटिल बना दिया था। फिर भी साहित्यिक संसार में स्वतंत्रता का प्रश्न लगातार उपस्थित रहा।
यदि उस समय के भारत का एक विशाल रिपोर्ताज लिखा जाए तो दृश्य अत्यंत मार्मिक दिखाई देता है। दिल्ली की तिहाड़ जेल में एक कवि बैठा है। पुणे में एक वृद्ध लेखिका गिरफ्तारी देने जा रही है। अहमदाबाद में कोई युवा लेखक भूमिगत पत्रिका छाप रहा है। कोलकाता में कोई संपादक सेंसर की कैंची से बचाकर एक पंक्ति छापने की जुगत कर रहा है। हैदराबाद में एक कवि बंद कमरे में कविता पढ़ रहा है। पटना की जेल में राजनीतिक बंदियों के बीच साहित्य पर बहस चल रही है। तिरुवनंतपुरम में एक पत्रकार खाली छोड़े गए स्तंभ को ही प्रतिरोध का वक्तव्य बना देता है।
देश की भाषाएँ अलग हैं, लेकिन उस समय उनकी धड़कन एक थी। भय साझा था। आशा साझा थी। और स्वतंत्रता की आकांक्षा भी साझा थी।
यही कारण है कि आपातकाल का इतिहास केवल सत्ता और विपक्ष का इतिहास नहीं है। यह भारतीय भाषाओं की सामूहिक अंतरात्मा का इतिहास भी है। यह उन कवियों, कथाकारों, निबंधकारों, पत्रकारों और सांस्कृतिक कर्मियों की कथा है जिन्होंने यह माना कि लेखक का पहला दायित्व किसी शासन, दल या विचारधारा के प्रति नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्रता के प्रति होता है।
आज जब उस काल को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो जेल की सलाखें दिखाई देती हैं, लेकिन उनसे भी अधिक उजली दिखाई देती हैं वे आवाज़ें जिन्होंने सलाखों के बावजूद बोलना नहीं छोड़ा। इतिहास में अनेक सत्ता-पुरुष आते हैं और चले जाते हैं, परंतु स्वतंत्रता के पक्ष में खड़े शब्द अधिक लंबे समय तक जीवित रहते हैं। भारतीय भाषाओं के उन साहित्यकारों ने यही सिद्ध किया कि कलम की सबसे बड़ी शक्ति उसके सौंदर्य में नहीं, उसके साहस में होती है। यही साहस लोकतंत्र की सबसे विश्वसनीय स्मृति है।
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