नरेंद्र मोदी सरकार के राज में 13 साल से अघोषित आपातकाल चल रहा है, यह कब खत्म होगा इसकी कोई गारंटी नहीं। कांग्रेसी शासन ने आपातकाल लागू किया था परंतु उनका संगठन ना तो इतना मजबूत था और नाही उनकी पार्टी के अधिकतर कार्यकर्ता इससे खुश थे। परंतु आज के हालात इससे बिल्कुल उलट है। आपातकाल लागू करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी की पृष्ठभूमि आजादी की जंग के गर्भ से जुड़ी थी, एक सीमा के बाद उनको अपनी गलती का एहसास हो गया और उन्होंने आपातकाल के खात्मे की मुनादी कर दी। परंतु आज के हुक्मरान की सियासी पैदाइश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में हुई है। हिंदू – मुस्लिमकी नफरत को बहुत सोची समझी, सिलसिलेवार, योजनाबद्ध तरीके से आज की सियासत का मुख्य मुद्दा बना दिया है। संघ के लाखों कार्यकर्ताओं की फौज दौलत और लाठी लेकर सरकारी सरपरस्ती में अपने मिशन को अमली जामा पहरा रही है। अफसोस इस बात का है कि अभी भी कई लोग 75 के आपातकाल की ज्यादतियों के प्रचार प्रसार को जाने अनजाने कर रहे हैं। आज के अघोषित आपातकाल में केवल बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां शुरू नहीं हुई,
शायद उनको अभी इसकी जरूरत भी नहीं, 75 में जयप्रकाश नारायण जैसी शख्सियत की रहनुमाई में विपक्ष के अधिकतर दलों, नेताओं कार्यकर्ताओं ने मुखालफत का बिगुल बजा कर सरकार को उसकी गलती का एहसास करवा दिया था। आज अभी तक अगर सोशल मीडिया को छोड़ दें जमीनी स्तर पर आंदोलन की कोई सुगबुगाहट दिखाई नहीं दे रही। तजुर्बे की बिना पर एक बात और कहूंगा कि अबकी जेल कांग्रेसी सरकार वाली नहीं होगी, जुल्म भी होगा और सरकारी प्रचार तंत्र पूरी मुस्तैदी के साथ बंदियों का चरित्र हरण, साथ-साथ करें तो कोई अचरज नहीं होगा। सवाल है क्या इससे डर के चुप बैठ जाएं ? बिल्ली के आने पर कबूतर की तरह आंख मीच कर बैठ जाने से भी जान नहीं बचेगी। तवारीख इस बात की गवाह है, की हर जालिम शासन का अंत हुआ है, इसका भी हर हालत में होगा। वक्त की जरूरत है कि आज के अघोषित आपातकाल के खिलाफ जत्थेबंदी के साथ सिविल नाफरमानी के जरिये हमें तैयार रहना चाहिए।
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