
पिछले दिनों स्वयं सेवी संगठनों के कुछ मित्रों के आमंत्रण पर जयपुर में था। वह गोष्ठी सामाजिक नागरिक संस्थाओं के आत्मावलोकन की एक कोशिश थी।लेकिन इस आत्मावलोकन में आत्मविश्वास और अभय नदारद था। वहां सभी संस्थाओं के प्रतिनिधियों के भीतर एक किस्म का भय था और नियम कानून का पूरी तरह से पालन करने के बावजूद उन्हें निरंतर यह भय सता रहा था कि कब समाज उनके काम को नष्ट कर देगा या कब सरकार के कोप का भाजन बनना पड़ेगा। दूसरी ओर दुनिया के सबसे बड़े स्वयं सेवी संगठन(प्रधानमंत्री की लाल किले से की गई घोषणा के अनुसार) राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अतिरिक्त आत्मविश्वास या दर्प के साथ देश की संवैधानिक, नैतिक और कानून व्यवस्था को चुनौती देता रहता है और उसे कोई खौफ होने के बजाय उल्टे समाज और दूसरे नागरिक संगठनों को उससे खौफ है।
यह खौफ स्वयं भारतीय जनता पार्टी के बीजापुर से चुने गए दलित सांसद रमेश जिगजिनागी ने कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खड़गे को एक सीख देते हुए व्यक्त किया है। प्रियंक खड़गे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर पूछा था कि क्या आप के संगठन का पंजीकरण है क्योंकि आप का संगठन सौ साल पूरा कर चुका है, वह प्रदेश में बहुत सारी गतिविधियां करता रहता है और आप ने दावा भी किया है जब जरूरत पड़ी तो आप का संगठन तीन घंटे में सीमा पर देश की रक्षा के लिए तैनाती कर सकता है। उनके सवालों में यह भाव छुपा है कि आखिर आप के संगठन का पंजीयन क्यों नहीं है और क्या वह कोई मिलिशिया या सैन्य संगठन है जो देश की सुरक्षा का दावा कर रहा है। प्रियंक खड़गे के पत्र पर संघ के पदाधिकारी और वकील आक्रामक ढंग से टूट पड़े हैं और कह रहे हैं कि क्या हिंदू समाज का पंजीयन है। अगर हिंदू समाज का पंजीयन नहीं है तो संघ को पंजीयन करने की क्या आवश्यकता है। जाहिर सी बात है इस तर्क का विस्तार किया जाए तो बहुत सारे संगठनों को पंजीयन की आवश्यकता नहीं है। इससे देश में एक किस्म की अराजकता पैदा होगी।
लेकिन वैसी ही अराजकता भरी चेतावनी जिगजिनागी महोदय ने दी है। उनकी चेतावनी में जातिगत पूर्वाग्रह तो है ही साथ में एक फासीवादी धमकी भी है। उनका कहना है कि एक दलित को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर सवाल उठाने की आवश्यकता क्या है। फिर एक गृहमंत्री के पास दूसरे काम नहीं हैं जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर सवाल खड़े कर रहा है। लेकिन उनकी आखिरी बात और भी भयानक है। उनका कहना है कि जिसने भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर सवाल उठाए वह बच नहीं पाया। उनका यह कथन एक हद तक राष्ट्रीय स्तर पर सही हो सकता है तो कर्नाटक के स्तर पर अधिक सही है। कर्नाटक में पत्रकार गौरी लंकेश, साहित्यकार एम.एम कलिबुर्गी और महाराष्ट्र में अंधविश्वास के विरुद्ध अलख जगाने वाले नरेंद्र दाभोलकर की हत्याएं इस बात का प्रमाण हैं।
इस बीच अयोध्या के श्रीरामजन्मभूमि के मंदिर में चंदा चोरी का मसला भी संघ परिवार की नैतिकता को चुनौती दे रहा है। संघ परिवार जो अपने को समस्त हिंदू धर्म का रहनुमा और संरक्षक बताता है वह काफी संघर्षों के बाद बने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के मंदिर की दानराशि की न तो रखवाली कर पाया न ही उसमें पारदर्शिता कायम करने की जरूरत मानता है। एक तरफ एसआईटी बनाकर अपने दायित्वों की इतिश्री मान लेने वाले और महीने में चार बार अयोध्या का दौरा करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दावा कर रहे हैं कि अगले 15 दिनों में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा और जो विपक्षी नेता अयोध्या को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं वे मारीच हैं, खर दूषण हैं और रावण हैं। जबकि ट्रस्ट के अहम पदाधिकारी नृपेंद्र मिश्र का कहना है कि यह तो डकैती है और किसी भी तरह से यह मामला पंद्रह दिन में उजागर नहीं होने वाला है।
संघ परिवार के तर्क वितर्क और कुतर्क और गतिविधियों ने न सिर्फ संवैधानिक नैतिकता को सवालिया घेरे में ला दिया है बल्कि हिंदू नैतिकता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। डॉ भीमराव आंबेडकर ने अपने गुरु और अमेरिकी दार्शनिक जान डेवी से प्रेरणा लेते हुए संवैधानिक नैतिकता का आग्रह किया था। उनका कहना था कि कोई भी संविधान लागू होने के लिए समाज में उसके लिए नैतिक वातावरण निर्मित किया जाना चाहिए। चूंकि हिंदू धर्म में जातिगत भेदभाव और स्त्रियों के प्रति असमानता का भाव इतना गहरा है कि वहां समतामूलक नैतिकता है नहीं इसलिए इस समाज में संविधान का लागू हो पाना चुनौती है। इसीलिए उन्होंने हिंदू समाज की नैतिकता को चुनौती देते हुए ‘रिडल्स इन हिंदुइज्म’ जैसी पुस्तक भी लिखी। यही वजह थी कि उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया क्योंकि उनको लगता है कि बौद्ध धर्म में समानता, मैत्री और करुणा की जो भावना है वह संविधान के लिए एक नैतिक समाज निर्माण की भावभूमि तैयार करती है।
इसके विपरीत महात्मा गांधी, विवेकानंद और अरविंद जैसे मनीषियों का मानना था कि हिंदू समाज में प्रवेश कर चुकी तमाम बुराइयों के बावजूद उसमें इतनी नैतिकता है कि वह समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित संविधान का पालन करेगा। वह बहुसंख्यक में होने के बावजूद अल्पसंख्यकों का ख्याल रखते हुए उनसे पूछकर फैसले करेगा। वह अपने समाज के विभिन्न तबकों के प्रति अपने व्यवहार को निरंतर उदार बनाता जाएगा। संघ परिवार निरंतर जिस सनातन धर्म और उसके मूल्यों की बात करता है उसके वैदिक साहित्य में मनुष्य को चार ऋणों का उत्तरदायी बताया है और उसका कर्तव्य है उन ऋणों से मुक्त होने का निरंतर प्रयास करना। इसे ‘मैन डूइंग हिज ड्यूटी’ भी कहा गया है और अज्ञेय ने इसका रोचक अनुवाद ‘ऋणशोध करता हुआ मध्यवर्ती मानव’ के रूप में किया है। यह ऋण हैं –पितृ ऋण, ऋषि ऋण, देव ऋण और भूत या मनुष्य ऋण। इसमें पहले ऋण का शोधन तो मनुष्य को परिवार के प्रति दायित्व के पालन की सीख देता है, जबकि आखिर के चार ऋणों का शोधन उसे व्यापक समाज और प्रकृति के प्रति दायित्वों से जोड़ देता है। ऋषि ऋण अपने ऋषियों से प्राप्त ज्ञान के संरक्षण और विकास की सीख देता है तो देव ऋण पूजा पाठ के बाह्य अनुष्ठान का नाम नहीं है बल्कि उसका उद्देश्य भीतर के सोए हुए देवता का आह्वान है। भूत ऋण और नृऋण मनुष्य को मानव समाज की सेवा और प्रकृति सेवा की प्रेरणा देता है।
नृऋण से उऋण तभी हुआ जा सकता है जब सार्वभौमिक दया भावना के साथ पूरे मानव जाति की सेवा की जाए और भूत ऋण से तब उऋण हुआ जा सकता है जब यह माना जाए कि किसी व्यक्ति का जीवन सिर्फ मानव समाज पर निर्भर नहीं करता। उसके लिए जल, वायु, वातावरण, पशु-पक्षी, वृक्ष, वन, पहाड़ों, नदियों और समुद्रों का योगदान है। क्या संघ परिवार या संघ से जुड़े लोग इस कसौटी पर खरे उतरते हैं? संवैधानिक नैतिकता को तो छोड़ ही दीजिए क्या संघ परिवार ने हिंदू समाज के भीतर इस सनातन नैतिकता को भी जगाने का प्रयास किया है? दरअसल पिछले 12 सालों में संघ परिवार ने तमाम किस्म के अपराध, तमाम किस्म के भ्रष्टाचार और तमाम किस्म की अनैतिकता का सिर्फ उसी समय विरोध किया है जब वह उनके किसी विरोधी द्वारा किया गया हो। अगर यह दुष्कृत्य उनके अपने संगठन या अपनी पार्टी या अपनी सरकार से जुड़े लोगों द्वारा किए जाते हैं तो वे उस पर या तो खामोश रहते हैं या फिर उसका बचाव करते हैं या फिर उससे ध्यान बंटाने के लिए दूसरी बातें करने लगते हैं। वे राम का नाम तो लेते हैं लेकिन राम की मर्यादा को न तो समझते हैं और न ही उसका पालन करते हैं। उन्हें सिर्फ भौतिक संपदा चाहिए और राजनीतिक सत्ता। लेकिन जवाबदेही धेले भर की नहीं। राम ने तो पिता के वचन को रखने के लिए 12 वर्ष का वनवास स्वीकार कर लिया था। सामान्य प्रजाजन के संदेह पर अपनी भार्या सीता को निष्कासित कर दिया था। आज्ञा उल्लंघन पर लक्ष्मण को मृत्युदंड का आदेश दिया था।
आज भारत संघ परिवार के सत्तासीन होने के कारण भयानक किस्म के नैतिक संकट मे फंस गया है। जहां सत्ताधारियों के भीतर आत्मावलोकन, आत्मालोचन और सुधार का कोई भाव नहीं है। वहीं आमजन के भीतर के देवता सो गए हैं। वे न तो हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है तो उसे तो सर्वाधिक दरकिनार करने की योजना पर काम किया जा रहा है। ऐसे समाज का भविष्य ‘सर्वेभवंतु सुखिनः सर्वेसंतु निरामयः’ के मूल मंत्र पर तो नहीं निर्धारित होना है। यह समाज अपने भीतर धन और सत्ता के लोभियों का एक गिरोह बनाता है और उसके माध्यम से अपने जैसे किसी अंतरराष्ट्रीय गिरोह से समझौता करता है और उसी के अनुरूप देश और दुनिया को चलाना चाहता है। भारत आज इसी मार्ग पर अग्रसर है।
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