
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर संसार भर में योग की चर्चा होती है। विशाल मैदानों में हजारों लोग एक साथ आसन करते दिखाई देते हैं। समाचार माध्यम योग के लाभों का वर्णन करते हैं। सरकारें आँकड़े प्रस्तुत करती हैं। संस्थाएँ अपने कार्यक्रमों का विवरण प्रकाशित करती हैं। योग की यह सार्वजनिक उपस्थिति निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह मनुष्य को उसके शरीर, मन और चेतना के प्रति जागरूक बनाती है। किन्तु इसी अवसर पर एक प्रश्न भी उठता है कि क्या योग केवल वही है जो किसी निर्धारित समय में चटाई पर बैठकर किया जाता है, अथवा जीवन के भीतर भी कोई ऐसा योग निरंतर घटित होता रहता है जो किसी उत्सव, किसी प्रमाणपत्र या किसी घोषणा का मोहताज नहीं होता?
यदि योग के मूल अर्थ पर विचार किया जाए तो उसका अर्थ है जोड़ना, समेकित करना, बिखरी हुई शक्तियों को एक केंद्र में लाना। इसी दृष्टि से देखें तो खेतों में किया जाने वाला श्रम भी एक प्रकार का योग है। किसान जब भोर के धुँधलके में खेत की ओर बढ़ता है, तब वह केवल खेती नहीं कर रहा होता। वह पृथ्वी, जल, वायु, ऋतु, श्रम और आशा को एक सूत्र में जोड़ रहा होता है। उसके लिए खेत कोई निर्जीव भूखंड नहीं है; वह एक जीवित संवाद का क्षेत्र है। बीज बोते समय वह भविष्य में विश्वास बोता है। सिंचाई करते समय वह समय और धैर्य का निवेश करता है। फसल काटते समय वह प्रकृति के साथ अपने संबंध का प्रतिफल प्राप्त करता है। यह पूरा क्रम योग की उस अवधारणा के बहुत निकट है जिसमें मनुष्य स्वयं को व्यापक अस्तित्व से जोड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर किया जाने वाला योग प्रायः शरीर और मन के संतुलन पर केंद्रित होता है। उसका लक्ष्य तनाव को कम करना, स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना और चेतना को अधिक सजग बनाना है। इसके विपरीत खेत का श्रमयोग शरीर को सक्रिय रखता है, मन को धैर्य सिखाता है और चेतना को प्रकृति से जोड़ता है। एक योग में मनुष्य अपने भीतर उतरता है, दूसरे योग में वह अपने बाहर फैले हुए जीवन से जुड़ता है। दोनों की दिशाएँ भिन्न प्रतीत होती हैं, परंतु उनका लक्ष्य अंततः एक ही है: विखंडन से मुक्ति और समग्रता की प्राप्ति।
तुलना का एक और आधार घोषित योग और अव्यक्त योग का है। योग दिवस पर किए गए अभ्यास की तस्वीरें खिंचती हैं, कार्यक्रमों की रिपोर्ट बनती है, सहभागियों की संख्या गिनी जाती है। यह योग का घोषित पक्ष है। इसमें दृश्यता है, सार्वजनिकता है और सामूहिक प्रदर्शन का तत्व भी है। दूसरी ओर किसान, मजदूर, कारीगर, शिक्षक, लेखक और गृहिणी का योग है, जो किसी मंच पर दिखाई नहीं देता। उसका कोई सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं होता। उसका प्रमाण उसके कार्य के परिणाम में निहित होता है। खेत की फसल, बच्चों का संस्कार, पुस्तक की रचना, घर की व्यवस्था और समाज की संरचना उसके मौन योग के साक्ष्य हैं।
गाँव की एक स्त्री का जीवन इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह सुबह सबसे पहले जागती है और रात में सबसे बाद में विश्राम करती है। घर की व्यवस्था, भोजन की तैयारी, पशुओं की देखभाल, खेत में सहयोग, बच्चों की परवरिश और परिवार के भावनात्मक संतुलन का दायित्व उसके कंधों पर होता है। यदि योग का अर्थ अनेक शक्तियों को एक बिंदु पर संयोजित करना है, तो वह प्रतिदिन योग की एक अदृश्य साधना करती है। किंतु उसका यह योग किसी अंतरराष्ट्रीय दिवस का हिस्सा नहीं बनता। वह आँकड़ों में नहीं आता, जबकि जीवन की निरंतरता उसी पर टिकी रहती है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का योग समयबद्ध होता है। वह प्रायः एक घंटे, दो घंटे या कुछ निर्धारित अवधि का अभ्यास है। इसके विपरीत श्रमयोग चौबीसों घंटे जीवन में व्याप्त रहता है। किसान खेत में है तो योग कर रहा है। कारीगर अपने औजार के साथ है तो योग कर रहा है। शिक्षक अपने अध्ययन में है तो योग कर रहा है। लेखक अपने चिंतन में है तो योग कर रहा है। यहाँ योग किसी विशेष मुद्रा का नाम नहीं, बल्कि एक विशेष चेतना का नाम बन जाता है।
दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर यह भी है कि योग दिवस का योग व्यक्ति को स्वयं के भीतर केंद्रित करता है, जबकि श्रमयोग व्यक्ति को स्वयं से बाहर निकालकर समाज और प्रकृति से जोड़ता है। योगासन में व्यक्ति अपने श्वास पर ध्यान देता है; खेत में किसान वर्षा की श्वास सुनता है। ध्यान में व्यक्ति अपने मन की गति को देखता है; श्रमयोग में वह ऋतुओं की गति को समझता है। एक में आत्मसंयम की साधना है, दूसरे में आत्मविस्तार की।
किन्तु इन अंतरों के बावजूद दोनों में एक गहरी समानता भी है। दोनों ही मनुष्य को वर्तमान क्षण में उपस्थित रहने की शिक्षा देते हैं। योगाभ्यास करते समय यदि मन भटक जाए तो अभ्यास अधूरा रह जाता है। खेत में कार्य करते समय यदि ध्यान भटक जाए तो फसल प्रभावित हो सकती है। योग में एकाग्रता आवश्यक है, श्रम में भी। योग में अनुशासन आवश्यक है, श्रम में भी। योग में धैर्य चाहिए, श्रम में भी। इस प्रकार दोनों की आधारभूत संरचना आश्चर्यजनक रूप से एक-दूसरे से मिलती है।
आज का समय प्रदर्शन का समय है। जो दिखाई देता है वही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस कारण योग दिवस का दृश्य पक्ष अधिक चर्चा में रहता है। लेकिन यदि योग की आत्मा को समझना हो तो उसे खेतों, कार्यशालाओं, रसोईघरों, विद्यालयों और पुस्तकालयों में भी खोजना होगा। वहाँ मनुष्य बिना किसी घोषणा के योग कर रहा है। उसका शरीर श्रम में लगा है, उसका मन कार्य में एकाग्र है और उसकी चेतना किसी व्यापक उद्देश्य से जुड़ी हुई है।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का वास्तविक विस्तार तभी संभव है जब हम योग को केवल आसनों की सीमाओं में न बाँधें। योग को जीवन की एक व्यापक प्रक्रिया के रूप में समझें। तब किसान का खेत, कारीगर की कार्यशाला, शिक्षक का अध्ययन कक्ष, लेखक का एकांत और माँ का गृहकार्य भी योग के क्षेत्र बन जाते हैं। तब योग दिवस केवल एक दिन का आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि जीवन की एक निरंतर अनुभूति बन जाता है।
वास्तव में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का योग और श्रम का योग दो अलग-अलग धाराएँ नहीं हैं। वे एक ही नदी की दो दिशाएँ हैं। एक मनुष्य को भीतर से सुदृढ़ करता है, दूसरा बाहर की दुनिया से उसका संबंध सुदृढ़ करता है। एक आत्मा को केंद्र देता है, दूसरा जीवन को अर्थ देता है। एक स्वास्थ्य की रक्षा करता है, दूसरा सभ्यता का निर्माण करता है। जब ये दोनों एक-दूसरे से मिलते हैं, तब योग केवल व्यायाम नहीं रह जाता और श्रम केवल आजीविका नहीं रह जाता। दोनों मिलकर मनुष्य को उसकी संपूर्णता का बोध कराते हैं।
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