— Tribhuvan —
अकेला “वंदे मातरम्” ही पूरा क्यों, “जनगणमन” भी पूरा का पूरा गाइए! और “जनगणमन” और “वंदे मातरम्” ही क्यों, सब कुछ ही पूरा-पूरा पढ़िए!
1.
यदि किसी रचना, श्लोक या मंत्र के एक स्वीकृत अंश को बोलना इसलिए अधूरा माना जाएगा कि उसका पूरा मूल पाठ नहीं पढ़ा गया तो यह सिद्धांत चुनीदा रूप से केवल “वंदे मातरम्” पर क्यों लागू हो? फिर उसे भारत के हर प्रसिद्ध सूत्र पर लागू कीजिए।
अकेला “वंदे मातरम्” ही क्यों, “जनगणमन” भी पूरा गाइए!
2.
राष्ट्र का ध्येय-वाक्य “सत्यमेव जयते” क्यों अकेला पढ़ा जाए? यह तो मुण्डक उपनिषद् 3.1.6 के पूरे मंत्र का केवल आरंभिक अंश है। पूरा मंत्र है, “सत्यमेवजयतेनानृतं, सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥”अर्थात् जब सरकारी प्रतीक पर सत्यमेव जयते लिखा दिखाई दे तो फिर अकेले तीन शब्दों पर क्यों रुकें? पहले पूरा मंत्र पढ़िए; और अगर “अंश नहीं, पूरा” ही सिद्धांत है तो फिर पूरा मुण्डक उपनिषद् पढ़िए। सत्यमेव जयते वास्तव में इसी मंत्र से लिया गया है और भारतीय राजचिह्न का अभिन्न हिस्सा है।
3.
सर्वोच्च न्यायालय का सूत्र है “यतो धर्मस्ततो जयः”, यानी जहाँ धर्म है, वहीं विजय है। और “धर्मो रक्षति रक्षितः” उद्धृत करना है? केवल सूत्र क्यों? जिस धर्मशास्त्रीय प्रसंग से वह आता है, उसका पूरा पाठ पढ़िए और सिद्धांत में तनिक भी समझौता मत कीजिए।
और धर्म की बात करेंगे तो धर्म की दस विशिष्टताएँ भी मत भूलिए। मत भूलिए कि कि धर्म वह है, जिसमें धृति (धैर्य) है। हर परिस्थिति में धीरज रखना। क्षमा: ग़लती करने वाले को माफ़ करना।दम (संयम): मन पर काबू रखना।अस्तेय: चोरी न करना। शौच: शरीर और मन की पवित्रता। इन्द्रिय-निग्रह: इन्द्रियों को वश में रखना। धी (बुद्धि): विवेकपूर्ण निर्णय लेना। विद्या: ज्ञान प्राप्त करना। सत्य: हमेशा सच बोलना। अक्रोध: गुस्सा न करना और बदले की भावना नहीं रखना।
मगर “यतो धर्मस्ततो जयः” भी स्वतंत्र रूप से आकाश से नहीं उतरा; यह महाभारत में आता है। तो न्यायालय में यह सूत्र देखते ही क्यों न कहा जाए, केवल चार शब्दों से कैसे काम चलेगा? पूरा महाभारत पढ़िए।
4.
“कर्मण्येवाधिकारस्ते” अकेला क्यों? पूरा श्लोक पढ़िए। श्लोक पर क्यों रुकें? पूरी भगवद्गीता पढ़िए। और गीता भी आखिर महाभारत का ही हिस्सा है तो फिर तर्क को उसकी अंतिम मंजिल तक पहुँचाइए और पूरा महाभारत पढ़िए।
5.
“अहिंसा परमो धर्मः” कहते हैं? अकेले इतना क्यों? महाभारत में अहिंसा को परम धर्म कहने वाले विस्तृत श्लोक और प्रसंग हैं; उदाहरणतः अनुशासन पर्व में “अहिंसा परमो धर्मः…” आता है। इसलिए उसी सिद्धांत से फिर पूरा अनुशासन पर्व और उसके बाद पूरा महाभारत पढ़ना पड़ेगा।
6.
और रोज़ गायत्री मंत्र में “ओ3म् भूर्भुवः स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं…” कहते हैं तो केवल इतना ही क्यों? मूल सावित्री ऋचा ऋग्वेद 3.62.10 की है; “ओउम् भूर्भुवः स्वः” उसके साथ प्रयुक्त महाव्याहृति है। यदि अंश में आस्था अधूरी है तो पहले पूरा सूक्त और फिर पूरा ऋग्वेद पढ़िए। और ऋग्वेद के संज्ञान को आत्मसात कीजिए कि यह दुनिया एक है और आप अगर किसी से भी नफ़रत करते हैं और उसके साथ एकता नहीं करते हैं तो आप देवताओं का अपमान करते हैं। समता की वैदिक अवधारण ही याद कर लें।
और यदि पूर्णता ही धार्मिक शुद्धता की कसौटी है तो ऋग्वेद पर क्यों रुकें, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी पढ़ डालिए।
7.
“वसुधैव कुटुम्बकम्” बोलना है? केवल तीन शब्द क्यों? जिस श्लोक से इसे लिया गया है, उसे पूरा पढ़िए; फिर पूरी महाउपनिषद् पढ़िए।
8.
“असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय” अच्छा लगता है? केवल यह प्रार्थना क्यों? फिर पूरा बृहदारण्यक उपनिषद् पढ़िए। और पढ़िए जानश्रुति पौतरायण और मुनि रैक्व की कहानी और जानिए कि राजसत्ताएँ मनुष्यता के समक्ष कितनी तुच्छ चीज़ है।
9.
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” चारों दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ कहना है? अकेली ऋचा क्यों? पहले उसका पूरा सूक्त, फिर पूरा ऋग्वेद।
10.
और यही कसौटी “वंदे मातरम्” पर लगाइए।
यदि उसके प्रचलित अंश के बजाय पूरी कविता पढ़ना ही राष्ट्रभक्ति की परीक्षा है तो कविता पर भी क्यों रुकना? “वंदे मातरम्” जिस उपन्यास आनंदमठ में आया है, पूरा “आनंदमठ ” पढ़वाइए। और वह सब कीजिए जो बंकिम बाबू ने लिखा है।
आज़ादी का पूरा इतिहास परे धरिए और लाल किले की प्राचीर से कहिए कि बंकिम बाबू का “आनंदमठ” पढ़कर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अंगरेज़ हमें सभ्य बनाने आए थे, गुलाम बनाने नहीं। वे मुक्ति दिलाने आए थे, वे ही आज़ादी लेकर आए थे और उन्होंने ही हमें सभ्य बनाया। अंगरेजों ने हमारे महान् धर्म की रक्षा की। बंकिम बाबू ने लिखा ही हुआ है “आनंद मठ” में कि अंगरेज़ हमें सभ्य और सुसंस्कृत बनाएगा तो हम उसी से सभ्य और सुसंस्कृत हुए हैं। उससे पहले तो हम असभ्य और सुसंस्कृत भी नहीं थे। आधुनिकता और हमारा क्या लेना-देना! हाँ, हाँ, पढ़ लीजिए “आनंदमठ” के आख़िरी पन्ने बीस पन्रे और जान लीजिए सच !
कहा ही है : हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फ़ारसी को क्या!!!
11.
और फिर बंकिमचंद्र को अधूरा क्यों पढ़ना! उनका पूरा साहित्य पढ़िए।
यही इस तर्क की समस्या है: किसी महान रचना का कोई अंश इसलिए अर्थहीन या अपवित्र नहीं हो जाता कि हमने उस क्षण पूरी किताब नहीं पढ़ी। सभ्यताएँ इसी तरह अपने विशाल ग्रंथों से सूत्र, प्रतीक, प्रार्थनाएँ और ध्येय-वाक्य चुनती हैं।
भारत ने “सत्यमेव जयते चुना”, सर्वोच्च न्यायालय ने “यतो धर्मस्ततो जयः” अपनाया, करोड़ों लोग गायत्री की एक ऋचा का पाठ करते हैं, किसी से यह प्रमाणपत्र नहीं माँगा जाता कि उसने पहले पूरा मूल ग्रंथ समाप्त किया है।
12.
राष्ट्र प्रतीकों का अर्थ चुनता है, ग्रंथों की जिल्दें नहीं; ‘पूरा पढ़ो’ का आग्रह विवेक नहीं, अंतहीन कर्मकांड है। राष्ट्रीय प्रतीक का मूल्य उसके चुने हुए अर्थ में है, पूरे ग्रंथ के बोझ में नहीं; वरना हर सूत्र अंततः पूरी सभ्यता का पाठ माँगने लगेगा। अंश का अर्थ पूछिए, पूरा ग्रंथ नहीं; वरना ‘सत्यमेव जयते’ से शुरू हुआ तर्क वेद, उपनिषद और महाभारत ख़त्म होने तक नागरिकता स्थगित रखेगा।
हम जाने कब से संकीर्णता की राह पर चल रहे हैं और इतना संकीर्ण हो चुके हैं कि महर्षि पतंजलि ने कहा था कि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि मिलकर योग कहलाते हैं। लेकिन जिस मनुष्य ने पतंजलि के नाम से हजारों करोड़ का साम्राज्य स्थापित कर रखा है, वही वर्षों से इन आठ में से बाकी सात को दरकिनार कर महज आसन को योग कहता है! इस अज्ञान का आप क्या करेंगे?
13.
अज्ञान अगर पीठ बन जाए, सिक्के की तरह टकसाल से ढलकर एक मुद्रा बन जाए और लालकिले की प्राचीर से पुकारने लगे और अंधेरे को रोशनी का झरना बताने लगे और पूरी की पूरी भीड़ ही अपनी तरफ ले जाए तो हम उस राह से नहीं बच सकते, जिस पर गैलीलियो गैलीली के साथ जो कुछ हुआ, जो निकोलस कॉपरनिकस के साथ हुआ, जो जिओर्डानो ब्रूनो, एंटोनी लेवोज़िए, हिपाशिया के साथ हुआ।
भारत ज्ञान परंपरा, विज्ञान परंपरा और संज्ञान परंपरा का देश है। यहाँ किसी संकीर्णता की स्वीकार्यता नहीं।
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