वंदे मातरम् के सवाल पर भारतीय जनता पार्टी आज जिस तरह गदर मचा रही है, उसके पीछे असली कहानी कुछ और है। इसे मुस्लिम तुष्टीकरण का सवाल बताकर भाजपा अपने उस पुराने राजनीतिक फार्मूले को फिर दोहराना चाहती है, जिसमें मुसलमानों के नाम पर हिंदुओं के मन में डर और नफरत पैदा करके राजनीतिक लाभ हासिल किया जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि वंदे मातरम् को लेकर आज इतना हंगामा करने वाले लोगों को अपने इतिहास को भी याद करना चाहिये.
आजादी की लड़ाई कांग्रेस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आज़ाद और असंख्य नेताओं के नेतृत्व में चल रही थी। सबसे बड़ी चुनौती थी कि इस संघर्ष में देश के हर तबके को हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, ब्राह्मण, दलित, किसान, मजदूर हर वर्ग की महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन के साथ कैसे जोड़ा जाए. इसी व्यापक एकता को हासिल करने को लेकर राष्ट्र कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह से वंदे मातरम् को लेकर भी एक समझदारी का रास्ता निकाला गया। 1937 में यह तय किया गया कि सार्वजनिक राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो पद गाए जाएँ। इसका उद्देश्य किसी की आस्था को चोट पहुँचाना नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक एकता को बनाए रखना था। क्योंकि बाद के पदों में धार्मिक देवी का स्तुति गान था उपासना के बोल थे जिन्हें लेकर मुस्लिम समुदाय ने आपत्ति जताई थी। इसलिए पहले दो पदों को सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए स्वीकार किया गया।
अब भाजपा इसे मुस्लिम तुष्टीकरण कह रही है। सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय आंदोलन के समय देश को एकजुट रखने के लिए किसी समझौते या सहमति का रास्ता निकालना भी तुष्टीकरण कहलाएगा?
और अगर भाजपा आज इतिहास की बात कर रही है, तो उसे अपने इतिहास का भी जवाब देना चाहिए। जिस वैचारिक धारा से आज की भाजपा निकली है, उस धारा और उसके संगठनों की स्वतंत्रता आंदोलन में क्या भूमिका थी? 1942 में जब पूरा देश भारत छोड़ो आंदोलन के साथ अंग्रेजी शासन के दमन का सामना कर रहा था, उस समय आपकी भूमिका क्या थी? आपने अंग्रेजी शासन के खिलाफ उस निर्णायक संघर्ष में क्या किया?
आज भाजपा के नेता—चाहे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हों या अमित शाह जैसे नेता—वंदे मातरम् के इतिहास पर सवाल उठा रहे हैं। उनसे मेरा सीधा सवाल है: पहले अपने संगठन के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का हिसाब दीजिए।
क्योंकि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस और गांधीजी की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि उन्होंने देश को जोड़ने की कोशिश की। हिंदू और मुसलमान को, ऊँच-नीच में बँटे समाज को, अलग-अलग वर्गों और समुदायों को एक राष्ट्रीय संघर्ष के भीतर लाने की कोशिश की। इसके विपरीत आज राजनीति का एक हिस्सा लगातार समाज को धार्मिक आधार पर बाँटने की कोशिश करता दिखाई देता है।
भाजपा के पास आज हर सवाल का एक ही जवाब दिखाई देता है—मुस्लिम तुष्टीकरण। महँगाई हो, बेरोजगारी हो, अर्थव्यवस्था हो, शिक्षा हो या कोई दूसरा सवाल—बहस को घुमाकर मुसलमानों के सवाल पर ले आइए और हिंदू समाज के मन में भय पैदा कीजिए।
लेकिन मैं उनसे पूछना चाहता हूँ—अगर इस देश में मुसलमान नहीं होते, तो आपकी राजनीति का यह सबसे बड़ा मुद्दा क्या होता? अगर मुसलमानों के नाम पर डर और नफरत पैदा करने का सवाल ही न हो, तो भाजपा और आरएसएस की राजनीति के पास समाज को जोड़ने और देश की वास्तविक समस्याओं का समाधान देने के लिए क्या एजेंडा बचता है?
वंदे मातरम् भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण विरासत है। उसे आज राजनीतिक हथियार बनाना उसके इतिहास को समझना नहीं, बल्कि इतिहास का इस्तेमाल करना है।
इसलिए बहस केवल यह नहीं होनी चाहिए कि आज कौन वंदे मातरम् गा रहा है और कौन नहीं गा रहा है। असली सवाल यह होना चाहिए कि जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब कौन देश की आजादी के लिए मैदान में था और कौन उससे दूर खड़ा था?
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