
वंदे मातरम् गीत विस्तार को लेकर यदि देश में सर्वानुमति नहीं बन पा रही है तो इसे समझा जाना चाहिए। इस गीत पर सर्वानुमति हो चुकी थी। विवाद इसके विस्तारित रूप को लेकर है, जिससे अनेक लोगों को एतराज है। स्मरणीय है कि जन गण मन और वंदे मातरम् का केवल एक अंश ही गान और गीत रूप में स्वीकार किया गया था।
वंदे मातरम् के पक्ष में दलील यही है कि यह राष्ट्रीय आन्दोलन का मुख्य स्वर था। बेशक। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन हमें विवेचना इस बात की भी करनी चाहिए कि क्या पूरा गीत राष्ट्रीय आन्दोलन में स्वीकार किया गया था। राष्ट्रीय आन्दोलन में बहुत कुछ था। हमने सब को राष्ट्र निर्माण में शामिल नहीं किया है। रघुपति राघव राजा राम वाली गाँधी प्रार्थना भी राष्ट्रीय आन्दोलन का हिस्सा नहीं था? और फिर अनुपूरक यह भी कि क्या हर चीज को पूरे तौर पर ही ग्रहण करना जरूरी होता है? आम के साथ उसकी गुठली भी खा ही जाना चाहिए!
प्रसंगवश हमें इस गीत और उसके महत्व को देखना चाहिए। यह गीत 1875 या 76 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया। इसमें तब केवल छह पंक्तियां ही थीं। इन छह पंक्तियों को ही संविधान में राष्ट्र गीत के रूप में स्वीकार किया गया। लेकिन इस गीत का एक परिवर्धित रूप 1882 में बंकिम बाबू के उपन्यास आनन्द मठ में आया, जो उपन्यास की जरूरत के हिसाब से था। आनन्द मठ उपन्यास एक जटिल रचना है, जिसे समझना बहुत आसान नहीं है। मोटे तौर पर इस में संन्यासी विद्रोह है, जो मुस्लिम राज के विरुद्ध है। 1757 के पलासी युद्ध में ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथों सिराजुद्दौला की पराजय से बंगाल के हिन्दू अभिजन में उत्साह और स्वागत का भाव था। इसी भाव को बंकिम बाबू ने रचनात्मक बनाने का प्रयास किया है। बंकिम का यह उपन्यास खुले तौर पर अंग्रेज़ी राज का स्वागत भी करता है। आनन्द मठ का मूल-स्वर ‘अंग्रेज मित्र राजा हैं ‘ है। यह स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। कुछ ऐसा ही भाव पेशवा राज के पतन के प्रति जोतिबा फुले और भीमराव आंबेडकर का था। फुले और आंबेडकर पेशवा राज के पतन और कम्पनी राज के जीत से प्रसन्न हैं। उनमें स्वागत का भाव है। इसे समझना होगा।
पलासी घटना के बाद बंगाल में अंग्रेजी राज के आगमन को बंकिम मुस्लिम राज के पतन और पद-दलित हिन्दू जाति के उत्थान के रूप में देख रहे हैं, वहीं फुले-आंबेडकर भीमा-कोरेगांव में पेशवा राज के पतन को ब्राह्मण राज के अन्त और शूद्र-किसानों के उत्थान के रूप में देखते हैं। भिन्न और अन्तरविरोधी इतिहास दृष्टि का यह एक ऐसा पहलू है जिसे अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।
पुनः बंगाल पर आवें। अंग्रेज़ी राज का मुख्यालय कोलकाता था। स्वाभाविक था भारतीय राष्ट्रवाद की पहली अंगड़ाई बंगाल में ही दिखती है। यह अंगड़ाई राजनीति से पहले समाज में दिखती है। इसे ही हम इंडियन रेनेसांस कह्ते हैं। इसी के माध्यम से हमने आजादी के मूल्य को भी समझा। 1857 में अंग्रेज़ी राज का विरोध भारतीय सामंतवाद की आखिरी लड़ाई थी, राज विद्रोह का एक रजवाड़ी पाठ जिसे पिट जाना था, पिट गया था। अंग्रेजों ने इसमें मुख्य रूप से मुस्लिम और पेशवा शासकों को ही लक्ष्य किया। अपवाद स्वरूप सैयद अहमद खान जैसे लोग अंग्रेजी राज से सहयोग भाव बनाये हुए थे। लेकिन सुधारवादी हिन्दुओं का बड़ा हिस्सा अंग्रेजी राज के खिलाफ नहीं था। इसे आप चाहे जिस रूप में देखें सच्चाई यही है।
1857 के राज विद्रोह का एक प्रभाव हुआ कि कम्पनी राज की जगह सीधे ब्रिटिश ताज का राज भारत पर हो गया। भारत संसदीय राज प्रणाली के जनक इंग्लैण्ड का उपनिवेश था!
अब नयी स्थितियों में राष्ट्रवाद का एक नया उभार हुआ। एक ब्रिटिश नागरिक ह्यूम के ही प्रयास से कांग्रेस का जन्म 1885 में हुआ। बंगाल में अब 1830 के दशक वाला भाव नहीं था। यहाँ का हिन्दू अभिजन अब अंग्रेजी राज के विरुद्ध तो नहीं किन्तु आलोचनात्मक अवश्य हो गया था। मुस्लिम अभिजन पस्त-हाल थे। इस बीच अंग्रेजों ने मुसलमानो के अभिजन समूह से समझौता करने की कोशिश की। शासक केलिए समाज को बाँट कर रखना जरूरी होता है। विदेशी शासक केलिए तो और भी अधिक। 1890 के बाद के बंगाल में सामाजिक-राजनीतिक बेचैनी दिखने लगती है। 1894 में बंकिम बाबू की मृत्यु हो जाती है। 1896 के कांग्रेस के सालाना जलसे में रवीन्द्रनाथ ठाकुर वंदे मातरम् को गाते हैं। वंदे मातरम् भारतीय राष्ट्रवाद का नारा बन जाता है, जैसे भारत माता की जय। इसी नाम से अरविन्द घोष द्वारा एक अखबार निकाला जाता है। इन तथ्यों से इंकार नहीं किया जाना चाहिए।
राष्ट्रवाद का प्रथम व्यवस्थित उच्छ्वास तब दिखा जब कर्जन ने साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बाँट दिया। दरअसल यह हिन्दू और मुस्लिम बंगाल था। बंगाल में तो इसका विरोध हुआ ही पूरे देश में इसे लेकर विरोध का स्वर दिखा। तिलक बंगाल आये और स्वदेशी आन्दोलन में हिस्सा लिया। अंततः अंग्रेजों को यह विभाजन वापस लेना पड़ा। यही नहीं कोलकाता से उठा कर अपना मुख्यालय दिल्ली ले आए।
हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन का दुःखद पहलू है कि बंगाल के साम्प्रदायिक विभाजन में जो लड़ाई हम जीत गए थे, वह 1947 में हार गए। हमने साम्प्रदायिक आधार बंगाल विभाजन को तो रोक दिया किन्तु भारत विभाजन को नहीं रोक सके। इस बार बंगाल के साथ-साथ पंजाब भी बंट गया। 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भारत मुक्त हुआ इस रूप में यह राष्ट्र के उत्थान का दिन था, किन्तु उसी रोज यह खण्डित भी हो गया, अतएव हमारे राष्ट्र के पतन का दिन भी था।
कह्ते हैं स्थितियां ऐसी हो गई थीं कि बंटवारा नहीं रोका जा सका। भारतीय नेताओं ने नए राष्ट्र को संवारने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी। सबसे चुनौती पूर्ण काम था 565 देशी रियासतों को भारत में शामिल करना जो पूरे भारत का एक तिहाई था। ( यही अंग्रेजी राज से मुक्त भारत था जिसकी वकालत आज भी अनेक लोग करते हैं। ) सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में यह काम शानदार ढंग से हुआ। इसके साथ संविधान निर्माण का कार्य संपन्न हुआ। नेहरू के नेतृत्व में आर्थिक विकास की नींव रखी गई।
इसके बीच ही देश में साम्प्रदायिक शक्तियों का फिर उन्मादी उभार दिखा। आजादी हासिल करने के तुरन्त बाद हिन्दू उन्मादी तत्वों द्वारा गाँधी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। मुस्लिम उन्मादी दम साध कर दो कदम आगे बढ़ने केलिए एक कदम पीछे किए हुए थे। भारतीयता पर बात करने वालों का एक समूह गंगा-जमुनी संस्कृति वाला था, जो हिन्दुओं और मुसलमानो के कुख्यात अभिजनों के सामाजिक स्वार्थों को संरक्षित कर रहा था। दूसरा समूह सेकुलर था जो धार्मिक विश्वास को व्यक्ति स्तर पर देखना चाहता था। राज्य को इससे कोई वास्ता नहीं हो, इसकी हिमायत कर रहा था। राष्ट्र निर्माण का रास्ता यही हो सकता था।
आज भारत को एक मजहबी या धार्मिक राष्ट्र बनाने की कोशिश हो रही है। इससे किसका भला होने वाला है! हमने राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान अपनी भूलों की सजा राष्ट्र विभाजन में पा ली है। उन गलतियों को हमें दोहराना नहीं चाहिए। वंदे मातरम् की छह स्वीकृत पंक्तियाँ पर्याप्त हैं। इसके आनंद मठ वाले रूप के इस्तेमाल से हमें बचना चाहिए। इसमें हिन्दू देवी दुर्गा का जो अभिनंदन है वह केवल गैर हिन्दुओं केलिए ही नहीं, आदिवासी और दलित हिन्दू समूहों केलिए भी आपत्तिजनक हो सकता है। राष्ट्रवाद के आरंभिक दौर में गणेश पूजा और दुर्गा पूजा का इस्तेमाल हुआ था। मुसलमानो ने तुर्की खलीफ़ा के पक्ष में खड़ा हो कर भी अंग्रेजी राज का विरोध किया था। अल्लामा इक़बाल के प्रसिद्ध कौमी तराने में भी ओ आबे रौदे गंगा वो दिन है याद तुझ को उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा जैसी आपत्तिजनक पंक्ति है। इन सबकी बार-बार समीक्षा होनी ही चाहिए। लेकिन संसद में वोट के बल पर ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों को पूरे राष्ट्र पर लादना नहीं चाहिए। 1975 में आपातकाल भी राष्ट्रपति और संसद की स्वीकृति से ही लाद दी गई थी। संविधान केवल बहुमतवाद नहीं है। यह एक सर्व स्वीकृत विचार भी है, अपने लोकतन्त्र का स्वीकृत ग्रंथ भी है। इसकी भावना को समझा जाना चाहिए।
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