
भारतीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद को लेकर आई एक रिपोर्ट के बाद देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, फार्म-6 में बदलाव और मतदाता डेटा के प्रबंधन जैसे मामलों पर सवाल उठाए हैं। दोनों आयुक्तों ने मतदाता डेटा और चुनावी सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई थी। सीमा खन्ना चुनाव आयोग में आईटी और डिजिटल सिस्टम की प्रमुख अधिकारी हैं। 22 जनवरी 2026 को चुनाव आयोग ने ईसीआईनेट लॉन्च किया गया था। चुनाव आयोग में विवाद ईसीआईनेट और ईआरओनेट के जरिए मतदाता सूची के प्रबंधन को लेकर है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने सवाल उठाया है कि सीमा खन्ना के नेतृत्व वाले आईटी विभाग ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले इलेक्ट्रॉल रजिस्ट्रेशन आफिसर्स (ईआरओएस) की पहुंच और उनके वैधानिक अधिकारों को सीमित कर दिया है। जिस तरह गोवा में ईआरओ वोटर लिस्ट सिस्टम में बदलाव नहीं कर सके।
जबकि उनके पास इसकी वैधानिक ताकत थी। लेकिन केंद्र में बैठी सीमा खन्ना का विभाग इस काम को आसानी से कर रहा था। जबकि उनके पास वोटर लिस्ट सिस्टम में बदलाव या छेड़छाड़ का कोई वैधानिक अधिकार नहीं था। इस विवाद का सबसे अहम उदाहरण गोवा का सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा में 97 मतदाताओं के मामलों की स्थानीय ईआरओ स्तर पर जांच हुई और उन्हें मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया गया। लेकिन संबंधित नामों को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने में सॉफ्टवेयर और डेटाबेस एक्सेस से जुड़ी समस्या सामने आई। ईआरओ इसे मतदाता सूची सिस्टम में डाल ही नहीं पा रहे थे। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर ने इस समस्या के समाधान और रोलबैक फैसलिटी उपलब्ध कराने के लिए 11 से 17 फरवरी 2026 के बीच चुनाव आयोग को आठ बार ईमेल भेजा था। इस कम्युनिकेशन में वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश भारती को संबोधित किया गया था और सीमा खन्ना को भी उसकी कॉपी भेजी गई थी। परन्तु केन्द्रीय चुनाव आयोग की तरफ से कोई कार्यवाही नहीं किया गया। इस मामले में दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सेक्रेटरी को भी पत्र लिखा था। दूसरी ओर 18 वर्ष के नए युवाओं के नाम मतदाता सूची में जोड़ने की हर साल होने वाली स्पेशल समरी रिवीजन(एसएसआर) प्रक्रिया 2024 के बाद से लंबित है। हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग को लेकर दो स्तरों पर बहस तेज हुई है।
पहला सवाल आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर और दूसरा मतदाता सूचियों का एसआईआर को लेकर है। इसके साथ ही आयोग के भीतर निर्णयों पर मतभेद की खबरों ने भी संस्था की आंतरिक कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर चर्चा को बढ़ाया है।भारत का निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जो संविधान के अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत अपने दायित्वों का निर्वहन करता है। जो एक बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय के रूप में कार्य करता है।चुनाव कराने वाली संस्था पर उठते सवाल के कारण उसकी विश्वसनीयता कमजोर हुई है। लोकतंत्र में चुनाव केवल मतपत्र या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के माध्यम से सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है। चुनाव की पूरी व्यवस्था पर नागरिकों का भरोसा लोकतंत्र की वास्तविक ताकत है। दो चुनाव आयुक्तों द्वारा उनकी जानकारी के बिना लिए गए विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर सबंधी निर्णयों पर कई आपत्तियां दर्ज कराई थी।विगत कई वर्षों तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद द्वारा कोई अलग कानून नहीं बनाया था।
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में कहा था कि जब तक संसद इस विषय में कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर होनी चाहिए। न्यायालय ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए महत्वपूर्ण माना था। इसके बाद संसद ने 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित कानून बनाया।
इस कानून में चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। इस व्यवस्था में मुख्य न्यायाधीश को समिति से बाहर कर दिया गया। यही प्रावधान अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती का विषय है। 23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ में इस मामले पर अलग-अलग मत सामने आए हैं। इसके बाद मामला संविधान पीठ के समक्ष रखे जाने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि नियुक्ति कानून असंवैधानिक घोषित हो गया है, बल्कि अब इसकी संवैधानिक वैधता पर बड़े पीठ के स्तर पर विचार का रास्ता खुला है। यहीं लोकतंत्र का मूल प्रश्न सामने आता है कि चुनाव कराने वाली संस्था जितनी स्वतंत्र दिखाई देगी, चुनाव परिणामों और चुनाव प्रक्रिया पर नागरिकों का विश्वास उतना ही मजबूत होगा।मतदाता सूची लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है।
यदि किसी पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में नहीं है, तो मतदान केंद्र पर उसकी राजनीतिक भागीदारी संभव नहीं होगी। इसी कारण मतदाता सूची का शुद्धीकरण एक आवश्यक प्रक्रिया है। निर्वाचन आयोग का तर्क रहा है कि मृत, स्थानांतरित, दोहरे या अपात्र नामों को हटाना जरूरी है। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान देश भर में ड्राफ्ट रोल से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने से पारदर्शिता पर सवाल खड़ा हो गया है।पात्र नागरिकों के नाम सूची से कट जाने का डर और पूरी सत्यापन प्रक्रिया की जटिलता से आम मतदाता चिंतित है। एसआईआर प्रक्रिया को लेकर नागरिक संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से यह चिंता सामने आई कि सत्यापन की कठिन प्रक्रिया के कारण वास्तविक मतदाता कहीं सूची से बाहर न हो जाएं।सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार एसआईआर की वैधानिकता को बरकरार रखा, लेकिन मतदाता सूची से जुड़े विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि सूची सुधार और मताधिकार संरक्षण के बीच संतुलन कितना महत्वपूर्ण है।
इसलिए किसी भी मतदाता सूची पुनरीक्षण की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने अपात्र नाम हटाए गए। यह भी देखना होगा कि कितने पात्र नागरिकों के नाम सुरक्षित रहे, कितने नाम हटाए गए लोगों को समय पर सूचना मिली और उन्हें अपना पक्ष रखने तथा अपील करने का वास्तविक अवसर मिला। दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले दस महीनों में आयोग के कुछ निर्णयों, विशेष रूप से एसआईआर से जुड़े मामलों पर कई बार आपत्तियां दर्ज की थी। लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति विचार-विमर्श और निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। महत्वपूर्ण यह है कि अंतिम निर्णय किस कानूनी आधार पर लिया गया और संबंधित सदस्यों को पर्याप्त जानकारी उपलब्ध थी या नहीं?
वर्तमान विवाद के बाद चुनाव आयोग ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि सभी आधिकारिक आदेश, निर्णय और प्रशासनिक निर्देश पूर्ण कानूनी स्वीकृति के साथ तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए जारी किया गया है।लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि किसी संस्था की विश्वसनीयता केवल राजनीतिक बयानबाजी के आधार पर तय न हो।बल्कि निर्वाचन आयोग की वास्तविक मजबूती इस बात में होगी कि वह अपने निर्णयों का स्पष्ट कानूनी आधार बताए, राजनीतिक दलों और नागरिकों की आपत्तियों को सुने तथा जहां संभव हो, निर्णय प्रक्रिया से संबंधित पर्याप्त जानकारी सार्वजनिक करे। लोकतंत्र में चुनाव कराने वाली संस्था की निष्पक्षता का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की राजनीतिक वैधता दांव पर होती है।
यदि किसी चुनाव प्रक्रिया पर समाज के एक बड़े हिस्से का भरोसा कमजोर पड़ता है, तो चुनाव परिणाम संवैधानिक रूप से वैध होने के बावजूद उनकी सार्वजनिक स्वीकार्यता पर बहस शुरू हो सकती है। इसलिए निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता किसी एक दल की सुविधा या किसी दूसरे दल की शिकायत का विषय नहीं होना चाहिए। यह प्रत्येक मतदाता का प्रश्न है।क्योंकि लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल इस बात से तय नहीं होती कि चुनाव समय पर हुआ या परिणाम घोषित हो गया। उसकी बुनियाद इस विश्वास पर टिकी होती है कि हर पात्र नागरिक का वोट दर्ज हो, हर वोट का समान मूल्य हो और चुनाव कराने वाली संस्था किसी राजनीतिक सत्ता से ऊपर संविधान के प्रति जवाबदेह हो। यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है।
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