समाजवादी समागम की मासिक वैचारिक गोष्ठी में भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियों पर विचार-विमर्श

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Discussion on the challenges of Indian economy in the monthly ideological seminar of Samajwadi Samagam.

— मनीषा कुमारी —

17 अक्टूबर 2026 को समाजवादी समागम की मासिक वैचारिक गोष्ठी की अध्यक्षता हिंद मजदूर सभा के महासचिव श्री हरभजन सिंह सिद्धू जी ने की। वक्ता के रूप में भारत के प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार जी शामिल हुए। इस गोष्ठी में समाजवादी समागम के वरिष्ठ साथियों के साथ-साथ दर्जनों सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने भी भाग लिया। इसके अलावा, हजारों लोगों ने फेसबुक लाइव और यूट्यूब के माध्यम से इस कार्यक्रम को देखा।

भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान चुनौतियाँ: भाग–1-

प्रो. अरुण कुमार के व्याख्यान पर आधारित रिपोर्ट
भारत की अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति, विकास दर, रोजगार, महँगाई, कृषि संकट और बढ़ती आर्थिक असमानता जैसे सवालों पर प्रख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार ने अपने व्याख्यान में विस्तार से विचार रखे। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए कहा कि आर्थिक विकास का आकलन केवल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर से नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना भी आवश्यक है कि विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक कितना पहुँच रहा है और आम नागरिकों के जीवन में कितना सुधार हो रहा है।
1. आर्थिक विकास के आकलन में आँकड़ों की विश्वसनीयता का सवाल-
प्रो. अरुण कुमार ने अपने व्याख्यान की शुरुआत भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित आँकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए की। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए सही और विश्वसनीय आँकड़े आवश्यक हैं। यदि आँकड़े वास्तविक परिस्थितियों को स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखते, तो आर्थिक समस्याओं का सही विश्लेषण करना और उनके समाधान के लिए प्रभावी नीतियाँ बनाना कठिन हो जाता है।
उन्होंने अपनी पुस्तकों Indian Economy: Independence and Persisting Colonial Disruption (2013) और Indian Economy: Greatest Crisis (2020) के साथ-साथ रोजगार एवं बेरोजगारी पर तैयार की गई रिपोर्ट का उल्लेख किया। उनके अनुसार, इन अध्ययनों में भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक समस्याओं और विकास की वास्तविक प्रकृति को समझने का प्रयास किया गया है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1947 और 2014 की तुलना में भारत ने निश्चित रूप से प्रगति की है, लेकिन अन्य देशों की तुलना में भारत की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रही है। इसलिए केवल अतीत की तुलना में सुधार को आधार बनाकर विकास की उपलब्धियों का आकलन करना पर्याप्त नहीं है; अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति और आम लोगों के जीवन में आए बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा।
2. ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की चुनौतियाँ-
प्रो. अरुण कुमार ने ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य पर चर्चा करते हुए प्रति व्यक्ति आय को एक महत्त्वपूर्ण संकेतक बताया। उनके व्याख्यान के अनुसार, यदि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था के स्तर तक पहुँचना है, तो उसे लंबे समय तक उच्च आर्थिक विकास दर बनाए रखनी होगी।
उन्होंने डॉलर में मापी जाने वाली प्रति व्यक्ति आय और रुपये के मूल्य में होने वाले बदलाव के बीच संबंध की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, यदि रुपये का मूल्य लगातार गिरता है, तो डॉलर के संदर्भ में निर्धारित आय के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आर्थिक विकास की दर और अधिक ऊँची रखनी पड़ेगी।
हालाँकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास का आकलन केवल औसत प्रति व्यक्ति आय से नहीं किया जा सकता। देश में आय और अवसरों का वितरण भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यदि आर्थिक विकास का लाभ सीमित वर्गों तक सिमटकर रह जाता है और बड़ी आबादी की जीवन-स्थितियों में सुधार नहीं होता, तो उस विकास को समावेशी नहीं कहा जा सकता।
3. असंगठित क्षेत्र और श्रमिकों की बदहाल स्थिति-
व्याख्यान का एक प्रमुख विषय भारत के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की स्थिति रहा। प्रो. कुमार के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र पर निर्भर है, लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय, सामाजिक सुरक्षा और जीवन-स्तर की समस्याओं को आर्थिक नीतियों में पर्याप्त महत्त्व नहीं मिलता।
उन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान प्रवासी श्रमिकों के बड़े पैमाने पर पैदल अपने घर लौटने की घटना का उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस संकट ने देश में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की वास्तविक संख्या और उनकी परिस्थितियों से संबंधित जानकारी की कमी को उजागर किया। इसी संदर्भ में उन्होंने ई-श्रम पोर्टल का उल्लेख किया, जिस पर सरकार के अनुसार करोड़ों श्रमिकों का पंजीकरण हुआ था।
प्रो. कुमार ने तर्क दिया कि पंजीकरण की व्यवस्था तक पहुँच रखने वाले श्रमिकों की पुरी जानकारी मिलना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि सबसे वंचित तबकों के लोग इससे बाहर रह सकते हैं। उन्होंने कम मजदूरी, असुरक्षित रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, शिक्षा की कठिनाइयों और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की अनुपलब्धता को गंभीर समस्याएँ बताया।
उनका कहना था कि जब तक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय और जीवन-स्थितियों में ठोस सुधार नहीं होगा, तब तक आर्थिक विकास का लाभ समाज के व्यापक हिस्से तक नहीं पहुँच पाएगा।
4. महँगाई और वास्तविक क्रयशक्ति में गिरावट-
प्रो. अरुण कुमार ने महँगाई को आम लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली एक गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुद्रास्फीति का अर्थ केवल वस्तुओं की ऊँची कीमतें नहीं, बल्कि कीमतों में होने वाली वृद्धि की दर है।
उनके अनुसार, मुद्रास्फीति की दर कम होने का अर्थ यह नहीं है कि वस्तुओं के दाम घट गए हैं। यदि मुद्रास्फीति सकारात्मक बनी रहती है, तो कीमतें बढ़ती रह सकती हैं, भले ही उनके बढ़ने की गति पहले से धीमी हो जाए।
इसका सबसे अधिक प्रभाव उन श्रमिकों पर पड़ता है जिनकी मजदूरी समय पर नहीं बढ़ती। उन्होंने नोएडा और मानेसर में श्रमिकों की मजदूरी तथा वेतन-वृद्धि से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जब आय स्थिर रहती है और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो लोगों की वास्तविक क्रयशक्ति घट जाती है।
इससे परिवारों के बजट पर दबाव बढ़ता है और भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा तथा आवास जैसी आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन हो जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को भी महँगाई के प्रभाव से पूरी सुरक्षा नहीं मिलती। इसलिए नियमित वेतन-संशोधन और श्रमिकों की वास्तविक आय की रक्षा महत्त्वपूर्ण है।
5. बेरोजगारी और रोजगारविहीन विकास-
प्रो. कुमार ने बेरोजगारी को भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे गंभीर संरचनात्मक समस्याओं में से एक बताया। उनके विश्लेषण के अनुसार, उत्पादन बढ़ने के बावजूद रोजगार में उसी अनुपात में वृद्धि नहीं हो रही है। इसका एक प्रमुख कारण उत्पादन की ऐसी तकनीकों का बढ़ता इस्तेमाल है जिनमें पूँजी और मशीनों की भूमिका अधिक तथा श्रम की आवश्यकता कम होती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए टाटा स्टील के उत्पादन और कर्मचारियों की संख्या में आए बदलाव का उल्लेख किया। उनके अनुसार, 1990 में कंपनी लगभग 20 लाख टन इस्पात का उत्पादन करती थी और उसके कर्मचारियों की संख्या लगभग 88,000 थी। वर्ष 2015 तक उत्पादन बढ़कर लगभग डेढ़ करोड़ टन हो गया, जबकि कर्मचारियों की संख्या घटकर लगभग 28,000 रह गई।
इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने समझाया कि तकनीकी आधुनिकीकरण और उत्पादकता में वृद्धि अपने आप पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं करते। यदि निवेश का बड़ा हिस्सा स्वचालन और मशीनों पर केंद्रित हो, तो उत्पादन बढ़ सकता है, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित रह सकते हैं।
उन्होंने कृषि क्षेत्र में ट्रैक्टर, हार्वेस्टर, थ्रेशर और अन्य मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, कृषि में रोजगार के अवसर सीमित होने और उद्योगों में पर्याप्त नौकरियाँ नहीं बनने के कारण अनेक श्रमिक छोटे-मोटे स्वरोजगार की ओर जाने के लिए मजबूर होते हैं। इनमें रेहड़ी लगाना, चाय बेचना और रिक्शा चलाना जैसे काम शामिल हैं।
6. शिक्षित युवाओं और महिलाओं के सामने रोजगार का संकट-
व्याख्यान में शिक्षित युवाओं तथा महिलाओं के बीच रोजगार की समस्या पर विशेष चिंता व्यक्त की गई। प्रो. कुमार ने कहा कि शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद बड़ी संख्या में युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिल पा रहा है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश में चपरासी के कुछ पदों के लिए लाखों आवेदन आने तथा रेलवे की भर्तियों में भारी प्रतिस्पर्धा के उदाहरण दिए। उनके अनुसार, इन घटनाओं से पता चलता है कि नियमित और सम्मानजनक रोजगार के अवसरों की तुलना में नौकरी पाने वालों की संख्या बहुत अधिक है।
उन्होंने इस स्थिति को युवाओं की निराशा और सामाजिक असंतोष से भी जोड़ा। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में कई वर्ष लगाने के बाद भी रोजगार नहीं मिलने से युवाओं पर आर्थिक और मानसिक दबाव बढ़ता है।
महिलाओं के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अनेक महिलाएँ घरेलू कामों या छोटे आर्थिक उपक्रमों में बिना पर्याप्त पारिश्रमिक के काम करती हैं। इस प्रकार, केवल बेरोजगारी के पारंपरिक आँकड़ों को देखकर रोजगार की वास्तविक स्थिति नहीं समझी जा सकती। यह भी देखना आवश्यक है कि कितने लोगों को नियमित, सुरक्षित और पर्याप्त आय देने वाला काम मिल रहा है।
7. कृषि संकट और किसानों की आय-
प्रो. कुमार ने किसानों की आय में अपर्याप्त वृद्धि को भारतीय अर्थव्यवस्था की एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने किसान आय से संबंधित सर्वेक्षण का उल्लेख करते हुए कहा कि खेती से होने वाली औसत आय बहुत कम है और अनेक किसान आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।
उनके अनुसार, किसानों की समस्या केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है। उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिलने, लागत की भरपाई करने और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कृषि बाजारों पर बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव की आशंका और कृषि कानूनों के विरुद्ध हुए किसान आंदोलनों का उल्लेख किया। उनके विचार में, किसानों की आय और आजीविका को सुरक्षित किए बिना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया जा सकता।
उन्होंने बेरोजगारी, कम मजदूरी और कृषि संकट के बीच संबंध स्थापित करते हुए कहा कि जब किसानों की आमदनी कम रहती है और श्रमिकों को पर्याप्त रोजगार नहीं मिलता, तो गरीबी की समस्या भी बनी रहती है।
8. गरीबी और बढ़ती आर्थिक असमानता-
प्रो. अरुण कुमार ने गरीबी में कमी के सरकारी दावों का आकलन करते समय इस्तेमाल किए गए संकेतकों और सर्वेक्षणों की तुलनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने विशेष रूप से बहुआयामी गरीबी का उल्लेख किया, जिसमें आय के साथ-साथ स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर से जुड़े पहलुओं को भी शामिल किया जाता है।
उनका तर्क था कि गरीबी का आकलन करते समय अलग-अलग समय के सर्वेक्षणों और सामाजिक परिस्थितियों की तुलना सावधानीपूर्वक करनी चाहिए। कोविड-19 महामारी के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका पर पड़े प्रतिकूल प्रभावों को ध्यान में रखे बिना गरीबी में सुधार के दावों का मूल्यांकन अधूरा हो सकता है।
उन्होंने बढ़ती आर्थिक असमानता की ओर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, भारत में अरबपतियों की बड़ी संख्या और वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति के बीच का अंतर आर्थिक संसाधनों के असमान वितरण को उजागर करता है।
उन्होंने कहा कि यदि आर्थिक समृद्धि का बड़ा हिस्सा समाज के एक छोटे वर्ग के पास केंद्रित हो जाए, जबकि बहुसंख्यक आबादी कम आय और असुरक्षित रोजगार से जूझती रहे, तो विकास की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठते हैं।
9. वैश्विक परिस्थितियाँ और भारतीय अर्थव्यवस्था-
व्याख्यान में प्रो. कुमार ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद बाहरी चुनौतियों का भी विश्लेषण किया। उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता का उल्लेख किया।
उन्होंने अमेरिकी व्यापार नीति और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ संबंधी नीतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि संरक्षणवादी नीतियाँ अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय संबंधों को प्रभावित कर सकती हैं। उनके अनुसार, अमेरिका द्वारा भारतीय कृषि बाजार, रूस से तेल व्यापार और भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा व्यवस्था से जुड़े मामलों में दबाव बनाने की कोशिशें भारत के लिए अतिरिक्त चुनौतियाँ पैदा कर सकती हैं।
प्रो. कुमार ने मौजूदा परिस्थितियों को पूँजीवाद के अधिक कठोर और लेन-देन केंद्रित स्वरूप के रूप में देखा। उनके अनुसार, जब शक्तिशाली देश अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हुए दूसरे देशों पर दबाव डालते हैं, तो कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए स्वतंत्र नीतिगत निर्णय लेना कठिन हो जाता है।
उन्होंने इस संदर्भ में वैश्वीकरण, डॉलर पर निर्भरता कम करने और ब्रिक्स जैसे समूहों की भूमिका पर विचार करने की आवश्यकता की ओर भी संकेत किया।
10. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोजगार का भविष्य-
प्रो. अरुण कुमार ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग और automation में तेजी से हो रहे विकास को भविष्य की बड़ी चुनौती बताया। उनके अनुसार, पहले तकनीकी बदलावों का प्रभाव मुख्यतः शारीरिक श्रम पर पड़ता था, लेकिन अब नई तकनीकें बौद्धिक और पेशेवर कामों को भी प्रभावित कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते इस्तेमाल से डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों, चार्टर्ड अकाउंटेंट और अन्य पेशेवरों के काम करने के तरीकों में बड़े बदलाव आ सकते हैं। रोबोटिक्स और automation के कारण उद्योगों में श्रमिकों की आवश्यकता कम हो सकती है, जबकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनेक ऐसे कार्य करने में सक्षम हो रही है जिनके लिए पहले प्रशिक्षित मानव श्रम की जरूरत होती थी।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नई तकनीकों के विकास में अमेरिका और चीन जैसे देश आगे हैं। भारत की तकनीकी और शैक्षणिक क्षमताओं में कमियों के कारण बाहरी तकनीक पर निर्भरता बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में तकनीकी प्रणालियों और उनके नियंत्रण पर दूसरे देशों का प्रभाव भारत की आर्थिक स्वायत्तता के लिए चुनौती बन सकता है।
उनके विचार में, तकनीकी विकास की गति इतनी तेज हो रही है कि समाज, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार बाजार को उसके अनुरूप ढालने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पा रहा है। इसलिए भारत को तकनीकी क्षमता विकसित करने, शिक्षा को मजबूत बनाने और भविष्य के रोजगार पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
11. काली अर्थव्यवस्था(Black economy)की चुनौती-
प्रो. कुमार ने काली अर्थव्यवस्था और अवैध आर्थिक गतिविधियों के प्रभाव पर चर्चा की। उन्होंने अर्थशास्त्री निकोलस कैल्डोर के पुराने अनुमानों तथा अपने पूर्ववर्ती अध्ययन का उल्लेख करते हुए दावा किया कि भारत में काली अर्थव्यवस्था का आकार काफी बड़ा हो चुका है।
उनके अनुसार, काली अर्थव्यवस्था का विस्तार सरकारी नीतियों की प्रभावशीलता को कमजोर करता है। जब आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा औपचारिक व्यवस्था, पारदर्शिता और कर-प्रणाली से बाहर रहता है, तो वास्तविक आर्थिक गतिविधियों का आकलन करना कठिन हो जाता है।
यहाँ उन्होंने असंगठित क्षेत्र और काली अर्थव्यवस्था के बीच अंतर की ओर भी संकेत किया। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले सभी लोग अवैध आर्थिक गतिविधियों में शामिल नहीं होते। इसलिए दोनों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है।
उनका तर्क था कि black economy की वास्तविक प्रकृति और उसके आकार को समझे बिना आर्थिक नीतियों, कर-व्यवस्था और संसाधनों के वितरण से जुड़ी समस्याओं का समुचित समाधान नहीं किया जा सकता।

भाग–2

प्रो. अरुण कुमार ने अपने व्याख्यान के दूसरे हिस्से में भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने Black economy, बेरोजगारी, गरीबी, असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा, श्रमिकों की कमजोर स्थिति और पूँजीवाद के मौजूदा संकट को एक-दूसरे से जुड़ी हुई समस्याओं के रूप में प्रस्तुत किया।
उनके अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों को समझने के लिए केवल GDP वृद्धि दर और संगठित क्षेत्र के प्रदर्शन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय यह देखना होगा कि रोजगार के अवसर कितने पैदा हो रहे हैं, श्रमिकों को कितना काम मिल रहा है और अर्थव्यवस्था के विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक किस हद तक पहुँच रहा है।
12. Black economy और आर्थिक असमानता
प्रो. कुमार ने कहा कि Black economy भारतीय अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता और सार्वजनिक संसाधनों को प्रभावित करने वाली गंभीर समस्या है। उनके अनुसार, काली कमाई का बड़ा हिस्सा समाज के अपेक्षाकृत संपन्न वर्गों में केंद्रित है, जिससे आर्थिक असमानता बढ़ती है।
उन्होंने तर्क दिया कि प्रत्येक आर्थिक गतिविधि को वास्तविक उत्पादकता और सामाजिक उपयोगिता के आधार पर भी समझना चाहिए। ऐसी गतिविधियाँ जिनमें आर्थिक लेन-देन तो होता है, लेकिन समाज के लिए वास्तविक उत्पादन या उपयोगी सेवाओं में वृद्धि नहीं होती, अर्थव्यवस्था की वास्तविक क्षमता को बढ़ाने में सीमित योगदान देती हैं।
उन्होंने इसे “Activity without Productivity” अर्थात् उत्पादकता के बिना आर्थिक गतिविधि की संज्ञा दी। उनके अनुसार, Black economy के विस्तार से संसाधनों का गलत आवंटन होता है और आर्थिक विकास की संभावनाएँ प्रभावित होती हैं।
प्रो. कुमार ने यह भी कहा कि Black economy का सही आकलन न होने से आर्थिक नियोजन और सरकारी नीतियों के निर्माण में कठिनाई पैदा होती है। जब अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तो उसके अनुरूप नीतियाँ बनाना और उनके परिणामों का मूल्यांकन करना भी कठिन हो जाता है।
13. Black economy का सार्वजनिक सेवाओं पर प्रभाव
व्याख्यान में प्रो. कुमार ने Black economy और सरकार की वित्तीय क्षमता के बीच संबंध पर विशेष जोर दिया। उनके अनुसार, यदि बड़ी मात्रा में आर्थिक गतिविधियाँ कर-व्यवस्था से बाहर रहती हैं, तो सरकार को आवश्यक राजस्व नहीं मिल पाता।
इसका सीधा प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पेयजल जैसी सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ता है। सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होने से वह इन क्षेत्रों में आवश्यक निवेश नहीं कर पाती। राज्यों की वित्तीय स्थिति भी प्रभावित होती है, जिससे उनकी सामाजिक कल्याण संबंधी योजनाओं को लागू करने की क्षमता सीमित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि यदि अर्थव्यवस्था में कर-संग्रह की क्षमता बढ़े और अवैध आर्थिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण हो, तो सार्वजनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार सृजन पर अधिक खर्च किया जा सकता है।
इस प्रकार, उनके विश्लेषण में Black economy केवल कर चोरी की समस्या नहीं है, बल्कि यह आर्थिक असमानता, कमजोर सार्वजनिक सेवाओं और वित्तीय संकट से भी जुड़ी हुई है।
14. गरीबी की परिभाषा और उसके आकलन की समस्या-
प्रो. कुमार ने गरीबी की परिभाषा पर चर्चा करते हुए कहा कि गरीबी को समझने के लिए समय और स्थान, दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है। अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में भोजन, आवास, कपड़े, ऊर्जा और अन्य बुनियादी जरूरतों की प्रकृति अलग हो सकती है।
उन्होंने उदाहरण देकर समझाया कि किसी ठंडे क्षेत्र में सुरक्षित और गर्म आवास जीवन के लिए अनिवार्य हो सकता है, जबकि किसी अन्य क्षेत्र में आवश्यकताओं का स्वरूप अलग होगा। इसलिए गरीबी का आकलन करते समय स्थानीय परिस्थितियों और जीवन की वास्तविक लागत को ध्यान में रखना चाहिए।
उन्होंने गरीबी रेखा निर्धारित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानकों और क्रयशक्ति समता (Purchasing Power Parity—PPP) पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, औसत कीमतों के आधार पर क्रयशक्ति का आकलन करने से कम आय वाले लोगों की कठिनाइयाँ पूरी तरह सामने नहीं आ पातीं।
उन्होंने यह तर्क रखा कि कम मजदूरी वाले समाज में सस्ते श्रम का लाभ अक्सर संपन्न वर्गों को मिलता है, जबकि गरीब परिवार अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते रहते हैं।
उनके विचार में, गरीबी का सही आकलन करने के लिए केवल सांख्यिकीय मानकों पर निर्भर रहने के बजाय लोगों की वास्तविक आय, आवश्यक खर्चों और जीवन-स्तर को भी समझना आवश्यक है।
15. बेरोजगारी से अधिक गंभीर समस्या है अल्परोजगार-
प्रो. अरुण कुमार ने बेरोजगारी की पारंपरिक परिभाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत में बड़ी संख्या में लोग ऐसे हैं जिन्हें पर्याप्त काम नहीं मिलता, लेकिन वे किसी न किसी गतिविधि में लगे रहते हैं। इसलिए उन्हें रोजगार प्राप्त व्यक्ति के रूप में गिन लिया जाता है, जबकि उनकी वास्तविक स्थिति अल्परोजगार की होती है।
उन्होंने रोजगार की समस्या के चार प्रमुख रूप बताए:
16. श्रमबल से बाहर रह जाना: ऐसे लोग, जिन्होंने रोजगार की तलाश करना ही छोड़ दिया है। इनमें बड़ी संख्या में युवा और महिलाएँ शामिल हो सकते हैं।
17. अल्परोजगार: ऐसे लोग जिन्हें अपनी क्षमता और जरूरत के अनुरूप पर्याप्त घंटे काम नहीं मिलता।
18. छिपी हुई बेरोजगारी: ऐसी स्थिति जिसमें किसी काम में कई लोग लगे दिखाई देते हैं, जबकि उत्पादन के लिए उनमें से कुछ लोगों का श्रम ही पर्याप्त होता है।
19. खुली बेरोजगारी: ऐसे लोग जो काम करना चाहते हैं और रोजगार खोज रहे हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं मिलता।
उनके अनुसार, बेरोजगारी की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए इन सभी स्थितियों का एक साथ विश्लेषण करना चाहिए।
उन्होंने रोजगार और अल्परोजगार पर अपनी 2022 की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए दावा किया कि बड़ी संख्या में लोगों के पास पर्याप्त और सम्मानजनक रोजगार नहीं है। उनके विश्लेषण में रोजगार की समस्या केवल काम न मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्याप्त आय, नियमित काम और सामाजिक सुरक्षा की कमी भी इसमें शामिल है।
20. रोजगार सृजन के लिए व्यापक रणनीति की जरूरत
प्रो. कुमार ने कहा कि भारत में हर साल बड़ी संख्या में युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। ऐसे में केवल कुछ लाख या कुछ मिलियन नौकरियाँ पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा।
उन्होंने अपने आकलन का हवाला देते हुए कहा कि रोजगार की वर्तमान कमी और हर वर्ष श्रमबल में शामिल होने वाले युवाओं की जरूरतों को एक साथ ध्यान में रखना होगा। यदि पहले से पर्याप्त रोजगार न पाने वाले लोगों की समस्या का समाधान नहीं किया जाता, तो बेरोजगारी और अल्परोजगार का बोझ लगातार बढ़ता रहेगा।
उनके अनुसार, रोजगार नीति का उद्देश्य केवल नई नौकरियों की घोषणा करना नहीं होना चाहिए। इसके लिए ऐसी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है जो अधिक लोगों को काम दे सकें, नियमित आय उपलब्ध करा सकें और श्रमिकों के जीवन-स्तर में सुधार ला सकें।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यदि रोजगार की समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो गरीबी और आर्थिक असमानता को कम करना कठिन होगा।
21. असंगठित क्षेत्र को आर्थिक नीतियों में पर्याप्त जगह नहीं-
व्याख्यान का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा से संबंधित था। प्रो. कुमार के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था में छोटे व्यापारियों, सूक्ष्म उद्यमों, छोटे किसानों और अनौपचारिक श्रमिकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन आर्थिक नीतियों और आँकड़ों में उनकी वास्तविक स्थिति पर्याप्त रूप से सामने नहीं आती।
उन्होंने गैर-कृषि क्षेत्र की सूक्ष्म इकाइयों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं, लेकिन अधिकांश इकाइयों का आकार छोटा है और उनकी आमदनी सीमित है।
उनके अनुसार, कर-संग्रह और आर्थिक विकास से जुड़े सकारात्मक आँकड़े अक्सर संगठित क्षेत्र के प्रदर्शन को अधिक प्रतिबिंबित करते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अर्थव्यवस्था के सभी हिस्सों में समान रूप से सुधार हुआ है।
उन्होंने इस स्थिति को असंगठित क्षेत्र का “Invisible” हो जाना बताया। उनके विचार में, जब किसी बड़े आर्थिक क्षेत्र की समस्याएँ आँकड़ों में स्पष्ट नहीं दिखतीं, तो वह नीतिगत प्राथमिकताओं में भी पीछे छूट सकता है।
22. नोटबंदी, GST, वित्तीय संकट और महामारी का प्रभाव-
प्रो. कुमार ने वर्ष 2016 के बाद असंगठित क्षेत्र के सामने आई चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने चार प्रमुख घटनाओं को छोटे व्यापारियों और सूक्ष्म उद्यमों के लिए गंभीर झटकों के रूप में प्रस्तुत किया:
• नोटबंदी: नकदी पर निर्भर कारोबारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
• GST का क्रियान्वयन: छोटे व्यवसायों पर अनुपालन संबंधी दबाव बढ़ा और अनेक इकाइयों के लिए नई व्यवस्था के अनुरूप ढलना चुनौतीपूर्ण रहा।
• गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों का संकट: छोटे उद्यमों के लिए ऋण और वित्तीय सहायता की उपलब्धता प्रभावित हुई।
• कोविड-19 महामारी: कारोबार बंद होने, मांग घटने और श्रमिकों के पलायन जैसी समस्याएँ सामने आईं।
उनके अनुसार, इन घटनाओं का संयुक्त प्रभाव असंगठित क्षेत्र की आर्थिक स्थिति पर पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अर्थव्यवस्था के इस हिस्से की स्वतंत्र और नियमित निगरानी नहीं की जाती, तो इसकी गिरावट का पूरा आकलन करना कठिन हो जाता है।
23. ई-कॉमर्स और छोटे कारोबारों के सामने प्रतिस्पर्धा-
प्रो. कुमार ने व्यापार क्षेत्र में हो रहे बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि ई-कॉमर्स और बड़े मॉल के विस्तार से स्थानीय दुकानदारों के सामने नई चुनौतियाँ पैदा हुई हैं।
उन्होंने बताया कि उपभोक्ताओं की खरीदारी की आदतों में बदलाव और ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते चलन से छोटे कारोबारों की मांग प्रभावित हो सकती है। उनके अनुसार, चमड़े के सामान, लगेज, रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं और प्रेशर कुकर जैसे क्षेत्रों में भी छोटे उत्पादकों और व्यापारियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने तर्क दिया कि संगठित क्षेत्र के विस्तार को केवल आर्थिक प्रगति के संकेतक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भी समझना जरूरी है कि इस विस्तार का छोटे कारोबारों, स्थानीय दुकानों और उनके साथ जुड़े रोजगार पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
प्रो. कुमार ने कहा कि असंगठित क्षेत्र को केवल औपचारिक व्यवस्था में शामिल करने की बात करने से उसकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। छोटे किसानों और सूक्ष्म उद्यमों की संरचनात्मक सीमाओं को ध्यान में रखकर नीतियाँ बनानी होंगी।
24. बेरोजगारी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था और श्रमिकों की कमजोर स्थिति-
प्रो. कुमार ने बेरोजगारी को केवल आर्थिक प्रबंधन की समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक अर्थव्यवस्था से जुड़ा सवाल भी बताया।
उनके अनुसार, उद्योगों और संपन्न वर्गों के लिए कम मजदूरी पर श्रम उपलब्ध होना आर्थिक रूप से लाभकारी हो सकता है। जब बड़ी संख्या में लोग रोजगार के लिए संघर्ष करते हैं, तो श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
उन्होंने कार्ल मार्क्स की “Reserve Army of Labour” अर्थात् श्रम की आरक्षित सेना की अवधारणा का उल्लेख किया। इस अवधारणा के अनुसार, बेरोजगार और अल्परोजगार लोगों की बड़ी आबादी कार्यरत श्रमिकों पर भी दबाव डाल सकती है, क्योंकि नौकरी खोने की स्थिति में उनकी जगह लेने के लिए अन्य लोग उपलब्ध रहते हैं।
उन्होंने संगठित और असंगठित क्षेत्र के बीच मजदूरी के अंतर का उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही प्रकार के काम के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में मिलने वाली आय में बड़ा अंतर हो सकता है। इससे श्रमिकों की सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति प्रभावित होती है।
उन्होंने श्रमिकों के बीच ब्लू-कॉलर और व्हाइट-कॉलर कामगारों के विभाजन पर भी चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार, यदि विभिन्न प्रकार के कर्मचारी स्वयं को व्यापक श्रमिक समुदाय का हिस्सा नहीं मानते, तो ट्रेड यूनियनों और सामूहिक श्रमिक आंदोलनों की शक्ति कमजोर हो सकती है।
प्रो. कुमार ने इस संदर्भ में श्रमिकों और किसानों की आर्थिक नीतियों के निर्माण में अधिक प्रभावी भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया।
25. पूँजीवाद का संकट और रोजगार की केंद्रीयता
व्याख्यान के अंतिम हिस्से में प्रो. कुमार ने पूँजीवाद के मौजूदा संकट पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि तकनीकी बदलाव, स्वचालन और उत्पादन की बढ़ती क्षमता के बावजूद पर्याप्त रोजगार पैदा करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
उन्होंने अतिउत्पादन के संकट का उल्लेख करते हुए कहा कि जब उत्पादन की क्षमता बढ़ती है, लेकिन लोगों की आय और क्रयशक्ति उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, तो उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की मांग का सवाल सामने आता है।
उन्होंने विश्व बैंक की सामाजिक सुरक्षा संबंधी नीतियों और सार्वभौमिक बुनियादी आय (Universal Basic Income—UBI) की अवधारणा पर भी विचार रखा। उनके अनुसार, आर्थिक सुधारों से प्रभावित लोगों को सुरक्षा प्रदान करना आवश्यक है, लेकिन केवल नकद सहायता देना बेरोजगारी की मूल समस्या का समाधान नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि काम केवल आय प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि व्यक्ति की गरिमा, सामाजिक भागीदारी और आत्मसम्मान से भी जुड़ा है। इसलिए यदि सरकार के पास लोगों को आर्थिक सहायता देने के लिए संसाधन उपलब्ध हैं, तो उन संसाधनों का इस्तेमाल रोजगार पैदा करने, शिक्षा का विस्तार करने और ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों को मजबूत बनाने में भी किया जाना चाहिए।
उनके विचार में, स्थायी समाधान ऐसी अर्थव्यवस्था के निर्माण में है जो व्यापक स्तर पर सम्मानजनक रोजगार पैदा कर सके।

रिपोर्ट – भाग 3
वैश्विक पूँजीवाद, एआई, श्रमिकों का संकट और भारत की आर्थिक संप्रभुता-
प्रोफेसर अरुण कुमार ने अपने व्याख्यान के इस भाग में वैश्विक पूँजीवाद के बढ़ते संकट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव, असंगठित क्षेत्र की बदहाली, श्रमिक अधिकारों में गिरावट तथा भारत की आर्थिक नीतियों से जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत के सामने विकसित अर्थव्यवस्था बनने की चुनौती केवल जीडीपी वृद्धि तक सीमित नहीं है। इसके लिए रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक समानता और सार्वजनिक संसाधनों को मजबूत करना भी आवश्यक है।
1. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोजगार का भविष्य-
प्रो. अरुण कुमार ने आगाह किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार से शारीरिक श्रम के साथ-साथ मानसिक श्रम से जुड़े रोजगार भी प्रभावित हो सकते हैं। उनके अनुसार, तकनीकी बदलावों के कारण उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उसके अनुरूप रोजगार और बाजार में मांग पैदा नहीं हो रही। इससे पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का अतिउत्पादन संकट (Crisis of Overproduction) और गहरा सकता है।
उन्होंने कहा कि रोजगार का संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका सहित अनेक देशों में नए स्नातकों को नौकरी मिलने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। भारत जैसे देशों के लिए चुनौती और गंभीर हो सकती है, क्योंकि उन्नत तकनीक पर नियंत्रण रखने वाली अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक व्यापार की शर्तों को अपने पक्ष में प्रभावित कर सकती हैं।
प्रो. कुमार के अनुसार, यदि तकनीकी विकास का लाभ समाज के व्यापक हिस्से तक नहीं पहुँचता, तो उत्पादकता बढ़ने के बावजूद बेरोजगारी, असमानता और आर्थिक असुरक्षा बढ़ सकती है।
2. ब्रिक्स की सीमाएँ और वैश्विक असमानता-
व्याख्यान में प्रो. अरुण कुमार ने ब्रिक्स (BRICS) की भूमिका और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बदलाव की संभावनाओं पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स के सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हितों में पर्याप्त विविधता है। चीन और रूस की भूमिका तथा अन्य देशों के अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कारण साझा आर्थिक रणनीति बनाना कठिन हो जाता है।
उनके अनुसार, ब्रिक्स के घोषणापत्र में वैश्विक आर्थिक संकट, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और असमानता जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए ठोस कदमों की कमी दिखाई देती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स को केवल मौजूदा वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार करना चाहिए जो विकासशील देशों की आर्थिक स्वायत्तता को मजबूत करे।
उन्होंने कहा कि वैश्विक असमानता कम करने, श्रमिकों के हितों की रक्षा करने और तकनीकी बदलावों के सामाजिक प्रभावों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक है।
3. ‘रेस टू द बॉटम’ और सार्वजनिक संसाधनों में कमी-
प्रो. कुमार ने वैश्विक पूँजी को आकर्षित करने के लिए देशों और राज्यों के बीच करों तथा अन्य रियायतों में प्रतिस्पर्धा को ‘रेस टू द बॉटम’ कहा। उनके अनुसार, जब सरकारें निवेश आकर्षित करने के लिए कंपनियों को लगातार कर-रियायतें देती हैं, तो सार्वजनिक राजस्व पर दबाव पड़ता है।
इसका प्रभाव शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कम कर वाले देशों में अपने मुख्यालय या व्यावसायिक गतिविधियाँ स्थापित करके कर देनदारी कम करने का प्रयास करती हैं। इससे सरकारों के लिए पर्याप्त राजस्व जुटाना कठिन हो सकता है।
उन्होंने बेस इरोजन एंड प्रॉफिट शिफ्टिंग (BEPS) का उल्लेख करते हुए कहा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मुनाफे को कम कर वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की समस्या से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी सहयोग जरूरी है।
प्रो. कुमार के अनुसार, जब सरकारों के पास सार्वजनिक सेवाओं के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचते, तो सबसे अधिक नुकसान श्रमिकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को होता है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए सार्वजनिक व्यवस्थाओं पर निर्भर रहते हैं।
4. अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ और आर्थिक संप्रभुता-
प्रो. अरुण कुमार ने ब्रेटन वुड्स संस्थाओं—मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक—की नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा की। उन्होंने कहा कि ऋण और वित्तीय सहायता से जुड़ी शर्तें कई बार सरकारों पर खर्च में कटौती, श्रम सुधारों और निजी पूँजी को प्रोत्साहन देने का दबाव बनाती हैं।
उनके अनुसार, यदि सरकारें अंतरराष्ट्रीय पूँजी को आकर्षित करने के लिए श्रमिकों के हितों और सार्वजनिक सेवाओं को लगातार कमजोर करती हैं, तो उनकी नीतिगत स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि भारत और अन्य विकासशील देशों को वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग के साथ-साथ मौजूदा नीतियों के विकल्प भी तलाशने चाहिए। उनका तर्क था कि केवल निर्णय लेने वाली संस्थाओं में स्थान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है; जरूरी यह है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण और लोकतांत्रिक बने।
5. असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा और विकास के दावों पर सवाल
प्रो. कुमार ने अपने व्याख्यान के निष्कर्ष में कहा कि भारत की विकास रणनीति की एक बड़ी कमजोरी असंगठित क्षेत्र की समस्याओं को पर्याप्त महत्व न देना है। उनके अनुसार, कृषि, छोटे व्यवसायों, घरेलू उत्पादन और अन्य असंगठित गतिविधियों में लगे लोगों की वास्तविक स्थिति को आर्थिक आँकड़ों तथा नीतियों में पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं किया जाता।
उन्होंने रोजगार और बेरोजगारी की परिभाषाओं पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि यदि कोई व्यक्ति सप्ताह में केवल एक घंटे काम करता है, तो उसे रोजगार प्राप्त मान लेने से उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति का पता नहीं चलता। रोजगार की गुणवत्ता, काम के घंटे, नियमित आय और सामाजिक सुरक्षा को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
प्रो. कुमार ने यह भी तर्क दिया कि यदि असंगठित क्षेत्र में लोगों की आय और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, तो उनकी क्रयशक्ति में वृद्धि होगी। इससे कपड़े, जूते और रोजमर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं की मांग बढ़ सकती है, जिससे घरेलू उत्पादन और रोजगार को प्रोत्साहन मिलेगा।
उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास का मूल्यांकन केवल जीडीपी वृद्धि के आधार पर नहीं, बल्कि यह देखकर भी किया जाना चाहिए कि रोजगार कितना बढ़ा, आय का वितरण कितना न्यायपूर्ण हुआ और श्रमिकों की जीवन-स्थितियों में कितना सुधार आया।
6. क्रोनी कैपिटलिज्म और बाजार में एकाधिकार
चर्चा के दौरान प्रो. कुमार ने क्रोनी कैपिटलिज्म यानी सत्ता और बड़े व्यावसायिक हितों के बीच निकट संबंधों से पैदा होने वाली आर्थिक विकृतियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों का बंदरगाहों, हवाई अड्डों और अन्य बुनियादी ढाँचे में बढ़ता प्रभाव प्रतिस्पर्धा और समान अवसरों के लिए चुनौती बन सकता है।
उन्होंने कहा कि जब आर्थिक गतिविधियों में कुछ बड़े समूहों का प्रभुत्व बढ़ता है, तो छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो सकता है। उन्होंने निजी निवेश में अपेक्षित वृद्धि न होने के संदर्भ में कमजोर मांग और बढ़ती आर्थिक असमानता को भी महत्वपूर्ण कारक बताया।
उनके अनुसार, यदि आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा सीमित वर्गों में केंद्रित रहता है, तो व्यापक आबादी की क्रयशक्ति कमजोर होती है। इससे बाजार में मांग प्रभावित होती है और उत्पादन तथा निवेश के विस्तार पर भी असर पड़ सकता है।
7. श्रमिक अधिकार, निजीकरण और रोजगार की असुरक्षा
चर्चा में श्रमिक संगठनों से जुड़े वक्ताओं ने रोजगार के बदलते स्वरूप पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में नियमित नौकरियों की जगह ठेका और आउटसोर्सिंग आधारित रोजगार बढ़ रहा है, जहाँ नौकरी की सुरक्षा, न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर स्वास्थ्य-सुरक्षा की गारंटी कमजोर हो सकती है।
वक्ताओं ने कोयला खदानों और रेलवे का उदाहरण देते हुए कर्मचारियों की संख्या में गिरावट, रिक्त पदों और कामकाज की परिस्थितियों पर सवाल उठाए। इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने तर्क दिया कि तकनीकी बदलाव के साथ-साथ निजीकरण और श्रम नीतियों में परिवर्तन भी रोजगार की स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं।
उन्होंने ट्रेड यूनियनों की कमजोर होती भूमिका पर चिंता जताई और कहा कि यदि श्रमिक संगठित होकर अपनी मांगें प्रभावी ढंग से नहीं रख पाते, तो उनके वेतन और कार्य-स्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि रोजगार की समस्या का समाधान केवल निवेश बढ़ाने से नहीं होगा। इसके लिए सुरक्षित रोजगार, उचित वेतन, श्रम कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
8. ई-श्रम पोर्टल और असंगठित श्रमिकों की पहचान
चर्चा के दौरान ई-श्रम पोर्टल का मुद्दा भी उठा। एक वक्ता ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान असंगठित श्रमिकों की वास्तविक संख्या और उनकी रोजगार संबंधी स्थिति का पर्याप्त डेटा उपलब्ध न होने की समस्या सामने आई थी। इसके बाद ई-श्रम पोर्टल के माध्यम से श्रमिकों का पंजीकरण किया गया, लेकिन पंजीकरण के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि श्रमिकों को वास्तविक योजनागत लाभ मिलें।
वक्ता ने सवाल उठाया कि पंजीकृत श्रमिक किस क्षेत्र में काम करते हैं, उनकी रोजगार संबंधी परिस्थितियाँ क्या हैं और उन्हें किन योजनाओं का लाभ मिल रहा है—इस तरह की जानकारी नीतियों के निर्माण और मूल्यांकन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस चर्चा का केंद्रीय निष्कर्ष यह था कि असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण तभी सार्थक होगा, जब उसके आधार पर प्रभावी सामाजिक सुरक्षा, रोजगार सहायता और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित किया जा सके।
9. सूरत के श्रमिकों की स्थिति और ग्रामीण बेरोजगारी
प्रश्नोत्तर सत्र में सूरत के श्रमिकों की कार्य-स्थितियों का मुद्दा उठाया गया। एक वक्ता ने दावा किया कि अनेक श्रमिक लंबे कार्यदिवस, साप्ताहिक अवकाश की कमी और कम वेतन जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि रोजगार की तलाश में शहरों में आए श्रमिकों के सामने काम छोड़ने पर गाँव लौटने की स्थिति में भी रोजगार के सीमित अवसर रहते हैं।
इस संदर्भ में प्रो. कुमार ने कहा कि ठेका श्रम, कमजोर सामाजिक सुरक्षा और कम वेतन जैसी समस्याएँ व्यापक आर्थिक नीतियों से जुड़ी हैं। उनके अनुसार, जब कृषि और असंगठित क्षेत्र पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाते, तो श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर होती है। ऐसी स्थिति में उन्हें कम वेतन और असुरक्षित परिस्थितियों में काम स्वीकार करना पड़ सकता है।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल निर्यात या पूँजी निवेश बढ़ाना नहीं होना चाहिए, बल्कि देश के भीतर रोजगार, आय और मांग को मजबूत करना भी होना चाहिए।
10. सार्वभौमिक बुनियादी आय बनाम सम्मानजनक रोजगार
प्रो. अरुण कुमार ने सार्वभौमिक बुनियादी आय (Universal Basic Income—UBI) की अवधारणा पर भी विचार रखा। उनके अनुसार, तकनीकी बदलाव और रोजगार के संकट के कारण कुछ देशों में सभी नागरिकों को न्यूनतम आय देने के प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है। लेकिन उन्होंने आगाह किया कि केवल नकद आय उपलब्ध कराना सम्मानजनक काम, सामाजिक सहभागिता और आत्मसम्मान का पूर्ण विकल्प नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि रोजगार व्यक्ति को केवल आय ही नहीं देता, बल्कि समाज में उसकी भूमिका, पहचान और गरिमा से भी जुड़ा होता है। इसलिए आर्थिक नीतियों में रोजगार सृजन, श्रमिक अधिकार और सामाजिक सुरक्षा को केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए।
11. भारत के विकास मॉडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता
प्रो. कुमार ने अपने व्याख्यान में कहा कि भारत की विकास संबंधी चुनौतियाँ घरेलू नीतियों और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों—दोनों से जुड़ी हैं। उनके अनुसार, यदि असंगठित क्षेत्र की गिरावट, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और सार्वजनिक संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ बनी रहती हैं, तो केवल उच्च जीडीपी वृद्धि के दावे देश की वास्तविक आर्थिक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शा पाएँगे।
उन्होंने आर्थिक आँकड़ों की विश्वसनीयता और नीतिगत निर्णयों के आधार पर भी सवाल उठाए। उनका तर्क था कि यदि रोजगार, गरीबी और महँगाई से संबंधित आँकड़े वास्तविक परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करते, तो नीतियों की प्रभावशीलता का सही आकलन करना कठिन हो जाता है।

उनके अनुसार, भारत को ऐसी विकास रणनीति की आवश्यकता है जो घरेलू मांग बढ़ाए, असंगठित क्षेत्र को मजबूत करे, श्रमिकों की आय और सुरक्षा में सुधार लाए तथा वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच अपनी नीतिगत स्वतंत्रता बनाए रखे।

प्रोफेसर अरुण कुमार के व्याख्यान और उसके बाद हुई चर्चा ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को रेखांकित किया। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण रोजगार में संभावित बदलाव, असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा, श्रमिक अधिकारों में गिरावट, वैश्विक पूँजी की बढ़ती शक्ति, सार्वजनिक संसाधनों पर दबाव और आर्थिक असमानता प्रमुख रहे।
चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत के विकास का मूल्यांकन केवल जीडीपी की दर से नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह देखना भी जरूरी है कि विकास का लाभ समाज के विभिन्न वर्गों तक कितना पहुँचा है, श्रमिकों को कितना सम्मानजनक रोजगार मिला है और आम नागरिकों की जीवन-स्थितियों में कितना सुधार हुआ है।

व्याख्यान के अंत में समाजवादी समागम के वरिष्ठ साथियों ने खासकर इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हरभजन सिंह सिद्धू जी ने प्रो. अरुण कुमार का आभार व्यक्त किया और उनके विचारों को व्यापक स्तर पर पहुँचाने तथा इन मुद्दों पर विस्तृत चर्चा आयोजित करने की आवश्यकता जताई।


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