
धनबाद और उसके आसपास के इलाके से मेरा एक जमाने में गहरा संबंध रहा है। पिछले दिनों मैंने सिजुआ-धनबाद इलाके के मजदूरों और उनके संगठन के बारे में कुछ लिखा था। उसी सिलसिले में कुछ और पुरानी बातें याद आ रही हैं। जब मैं समाजवादी युवजन सभा में सक्रिय था, उन्हीं दिनों की बात है। तय हुआ कि धनबाद या झरिया में दो दिनों का एक प्रशिक्षण शिविर लगाया जाए। संभवतः यह सन् 1972 या 1973 की बात है।
उन दिनों वहाँ के जाने-माने मजदूर नेता और समाजवादी नेता इमामुल हई खान संभवतः झरिया माइंस बोर्ड के अध्यक्ष थे। मुझे लगा कि उनके सहयोग से शिविर के आयोजन के लिए जरूरी साधन जुटाने में आसानी होगी। मैंने उनसे बात की। वे तैयार हो गए। इसी सिलसिले में मैं धनबाद गया।
इमामुल हई खान मूल रूप से बलिया जिले के रहने वाले थे। आजादी के पहले ही वे धनबाद आ गए थे। उन्होंने खुद कोयले की खदान में काम किया था। खदान के भीतर कोयला काटने का काम करते थे। किसी तरह उनका संपर्क जयप्रकाश नारायण जी से हुआ। जयप्रकाश जी भी बलिया जिले के ही रहने वाले थे। संभव है कि इसी परिचय के माध्यम से वे उनके संपर्क में आए हों और उनसे प्रभावित हुए हों। इसके बाद उन्होंने मजदूर संगठन के काम में अपने को लगा दिया।
वे बहुत लड़ाकू स्वभाव के आदमी थे। जिंदगी में उन्होंने काफी संघर्ष किया था। इसमें कोई संदेह नहीं कि मजदूरों के बीच उनका अपना एक स्थान था।
उन दिनों झरिया माइंस बोर्ड के अध्यक्ष के नाते उनके नाम पर एक सरकारी बंगला था, लेकिन वे खुद अपने निजी मकान में रहते थे। उन्होंने मेरे ठहरने का इंतजाम उसी सरकारी बंगले में कर दिया। बंगला काफी बड़ा था, लेकिन उसमें मच्छरों की भरमार थी। पहली रात तो जागते-जागते ही कट गई। अगले दिन मच्छर भगाने वाला यंत्र आया, तब जाकर कुछ राहत मिली।
खान साहब से जब मैं शिविर की तैयारियों के बारे में पूछता तो उनका एक ही जवाब होता—सब हो रहा है, निश्चिंत रहिए। कहाँ शिविर होगा, लोगों के ठहरने का इंतजाम कैसे होगा, खाने-पीने की व्यवस्था क्या होगी, पर्चे और पोस्टर छपे या नहीं—इन सब बातों के बारे में पूछने पर वे यही कहते कि सब इंतजाम हो रहा है।
उनकी बातों पर मैं इतना भरोसा कर बैठा था कि बाहर निकलकर खुद भी कुछ पता नहीं लगा रहा था। लेकिन शिविर की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही थी, मेरी परेशानी बढ़ती जा रही थी।
एक दिन मैंने खान साहब से कहा कि भाई, शिविर का पोस्टर तो दिखाइए, कैसा छपा है। उन्होंने पोस्टर का एक नमूना दिखाया और कहा कि सब कुछ तैयार है, बस छपाई होनी बाकी है।
लेकिन मुझे उनकी बातों से संतोष नहीं हो रहा था। मधु लिमये जी का कार्यक्रम भी तय हो चुका था। उन्होंने खुद पत्र लिखकर बताया था कि वे शिविर में आएँगे।
आखिर जब मुझे लगा कि वास्तव में कोई तैयारी नहीं हुई है, तो मैं खुद बाजार की ओर निकल पड़ा। पुराने साथियों से बात की। कई ऐसे लोग भी मिल गए जिनसे मेरा पहले से संपर्क था। करकेंद मुहल्ले में एक धर्मशाला थी, जो शिविर के लिए उपयुक्त लगी। तय हुआ कि शिविर वहीं किया जाए।
फिर क्या था, सब लोग काम में लग गए। किसी ने आटा खरीद दिया, किसी ने डालडा दे दिया, किसी ने मसालों की व्यवस्था कर दी, तो किसी ने सब्जी का इंतजाम कर दिया। इस तरह स्थानीय साथियों ने मिल-जुलकर खाने-पीने की व्यवस्था कर दी। बाद में खान साहब ने भी कुछ इंतजाम करा दिया। आखिरकार दो दिनों के शिविर का बढ़िया आयोजन हो गया।
इस शिविर में मधु लिमये जी तो आए ही, सत्यदेव त्रिपाठी, मुख्तार अनीस आदि भी आए थे। संभवतः थोड़ी देर के लिए कर्पूरी ठाकुर जी भी शिविर में आए थे।
मैंने मधुजी को शिविर की तैयारियों के बारे में हुई पूरी घटना सुनाई। उन्होंने भी अपने साथ पहले घटित इसी तरह की एक घटना सुनाई। इस तरह शिविर तो हो गया, लेकिन इस अनुभव से धनबाद के मजदूर आंदोलन की राजनीति का एक दूसरा चेहरा भी मेरे सामने आया।
धनबाद के मजदूर आंदोलन की राजनीति–
उन दिनों धनबाद के मजदूर आंदोलन में काफी आपाधापी थी। वहाँ दो बड़े और जाने-माने नेता थे। एक थे बी.पी. सिन्हा, जो इंटक और कांग्रेस से जुड़े हुए थे। उनके बारे में कहा जाता था कि मजदूरों से जुड़े कानूनों की उन्हें बहुत अच्छी जानकारी थी।
दूसरे थे इमामुल हई खान साहब। वे समाजवादी विचारधारा के थे और समाजवादियों के मजदूर संगठन तथा हिंद मजदूर सभा से जुड़े हुए थे।
एक तीसरे नेता भी धीरे-धीरे उभर रहे थे। वे थे ए.के. राय। वे सिंदरी फर्टिलाइजर में संभवतः केमिकल इंजीनियर थे और ट्रेड यूनियन के काम में सक्रिय हो चुके थे। लेकिन जिस समय की मैं बात कर रहा हूँ, उस समय तक वे बी.पी. सिन्हा और इमामुल हई खान के बराबर की हैसियत में नहीं पहुँचे थे।
अभी हाल में मैंने आचार्य रजनीश यानी ओशो का एक कथन पढ़ा। उनके विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं है, लेकिन कभी-कभी उनकी बातें सोचने पर मजबूर करती हैं।
उनका एक कथन है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता तो आपस में मेल-जोल रखते हैं, लेकिन उनके कार्यकर्ता एक-दूसरे का गला काटने पर तैयार रहते हैं।
मुझे उनकी यह बात इसलिए याद रह गई कि धनबाद में मैंने इसका एक उदाहरण सुना था।
सिंदरी इलाके में इमामुल हई खान साहब के समर्थकों की एक सभा हो रही थी। उसमें कुछ पढ़े-लिखे समाजवादी नौजवान भी शामिल थे। सिंदरी इंजीनियरिंग कॉलेज के भी एक-दो छात्र वहाँ मौजूद थे। उसी सभा पर बी.पी. सिन्हा के समर्थकों ने हमला कर दिया। लाठी-पत्थर चलने लगे। भगदड़ मच गई और सभा पूरी तरह तितर-बितर हो गई।
सभा में शामिल नौजवान अपनी जान बचाकर वहाँ से भागे। सिंदरी से सिजुआ की दूरी भी कम नहीं थी। इमामुल हई खान साहब सिजुआ में रहते थे। ये लोग जंगल के रास्ते भागते-भागते उनके बंगले पर पहुँचे।
खान साहब जिस कमरे में बैठते थे, उसके दरवाजे पर एक नौजवान दरबान तैनात था। उसने इन लोगों को रोकने की कोशिश की। लेकिन ये लोग मार खाकर और अपनी जान बचाकर वहाँ पहुँचे थे। वे रुकने वाले नहीं थे। उन्होंने दरबान को धक्का दिया और दरवाजा खोलकर भीतर चले गए।
अंदर का दृश्य देखकर वे लोग हैरान रह गए। वहाँ बी.पी. सिन्हा और इमामुल हई खान दोनों साथ बैठे हुए थे। सामने शराब की बोतल खुली हुई थी। वहाँ एक महिला भी मौजूद थी।
उन नौजवानों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। सार्वजनिक रूप से जिन दो नेताओं के समर्थकों के बीच इतनी दुश्मनी है, उनके बीच हुई मारपीट से बचकर वे यहाँ भागे-भागे आए हैं और यहाँ दोनों नेता साथ बैठकर शराब और सुंदरी का आनंद ले रहे हैं!
जिन लोगों के समर्थकों ने थोड़ी देर पहले उन पर हमला किया था, उन्हीं के नेता यहाँ हमारे नेता के साथ बैठे हुए हैं!
बी.पी. सिन्हा तो वहाँ से निकल गए। इमामुल हई खान साहब उन नौजवानों को समझाने लगे। उनका कहना था कि हम इतने दिनों तक जेल में रहे हैं, लड़ाई लड़ी है और न जाने कितनी तकलीफें झेली हैं। इन सब परिस्थितियों को समझिए।
इस घटना को मैं किसी एक नेता के चरित्र पर टिप्पणी के रूप में नहीं देखता। वे भी मनुष्य थे और मानवीय कमजोरियों से मुक्त नहीं थे। लेकिन इस घटना से एक दूसरी बात जरूर समझ में आती है।
राजनीति में ऊपर के नेताओं और नीचे काम करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच काफी फर्क होता है। बड़े नेता आपस में मिलते-जुलते रहते हैं। एक-दूसरे के पारिवारिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, एक-दूसरे के यहाँ आते-जाते हैं और बैठकें भी करते हैं। उनके बीच अपने निजी संबंध बने रहते हैं।
लेकिन नीचे के स्तर पर काम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को जनता के बीच रहना पड़ता है। उन्हें अपने संगठन का समर्थन बढ़ाना होता है और अपने समर्थकों को भी साथ लेकर चलना होता है। इस क्रम में दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ बहस होती है, कई बार तीखी नोकझोंक भी होती है और कभी-कभी बात टकराव तक पहुँच जाती है। अपने-अपने समर्थकों को एकजुट रखने के लिए भी उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
संभवतः इसी वजह से नीचे के स्तर पर जो तनातनी और टकराव दिखाई देता है, वह ऊपर के नेताओं के बीच उतना नहीं होता। ओशो ने इसी स्थिति को शायद यह कहकर व्यक्त किया था कि नेता आपस में मेल-जोल रखते हैं, लेकिन उनके कार्यकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा इतनी तीखी रहती है कि वे एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने को तैयार रहते हैं।
लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि राजनीति में ऊपर और नीचे के स्तर पर संबंधों का यह अंतर अक्सर दिखाई देता है।
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