— मनीषा कुमारी —
समता मार्ग न्यूज़ पोर्टल और न्यूज़लेंस इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में ‘युवा आंदोलन और परिवर्तन की राजनीति’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों, लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही, राजनीतिक दलों की भूमिका और भारतीय राजनीति में उभरती नई पीढ़ी की भागीदारी पर विचारोतक चर्चा हुई।
इस परिचर्चा में प्रोफेसर राधाकांत बारिक (भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर), प्रोफेसर जगरूप सिंह सेखों (गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के पूर्व प्रोफेसर), सीजेपी के कार्यकर्ता अंकित कुमार तथा युवा समाजशास्त्री रणधीर कुमार गौतम ने अपने विचार रखे।
परिचर्चा का संचालन करते हुए प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने परिचर्चा की भूमिका रखते हुए सवाल उठाया कि क्या युवाओं का एकजुट होना वास्तव में भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदल सकता है? उन्होंने कहा कि भारत में युवा आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि सड़क पर होने वाले विरोध प्रदर्शन किस हद तक संस्थागत बदलाव ला पाते हैं। क्या ये आंदोलन चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं, सरकारों को निर्णय बदलने के लिए मजबूर करते हैं या राजनीतिक व्यवस्था अंततः इन्हें अपने भीतर समाहित कर लेती है?
लोकतंत्र में युवाओं की बढ़ती राजनीतिक स्वायत्तता-
चर्चा की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर जगरूप सिंह सेखों ने भारतीय लोकतंत्र के ऐतिहासिक विकास और युवाओं की बदलती राजनीतिक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भारत ने अनेक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना किया। 1960 की दशक में चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध, आर्थिक संकट, खाद्यान्न की कमी, कांग्रेस व्यवस्था की कमजोरी और राजनीतिक अस्थिरता जैसे दौर के बावजूद भारतीय लोकतंत्र आगे बढ़ता रहा।
उन्होंने आपातकाल के दौर और उसके बाद के राजनीतिक परिवर्तनों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय राजनीति में युवाओं की भूमिका को समझने के लिए विभिन्न ऐतिहासिक चरणों का विश्लेषण आवश्यक है। राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने युवाओं तथा व्यापक समाज को राजनीतिक परिवर्तन के लिए प्रेरित किया।
प्रोफेसर सेखों के अनुसार, 1980 और 1990 के दशक में भारतीय राजनीति में जाति, धर्म, मंडल और कमंडल जैसे मुद्दों का प्रभाव बढ़ा। हालांकि, 1990 के दशक के उत्तरार्ध से युवाओं में राजनीतिक स्वायत्तता बढ़ने के संकेत दिखाई देने लगे। शिक्षा के विस्तार, संचार के नए माध्यमों और भाषाई बाधाओं के कम होने से युवाओं की राजनीतिक समझ तथा सामाजिक सक्रियता में बदलाव आया।
उन्होंने कहा कि जब संसद और स्थापित राजनीतिक संस्थाएं नागरिकों की समस्याओं का प्रभावी समाधान नहीं कर पातीं, तब सड़क पर उतरकर विरोध करना लोगों के लिए अपनी बात रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन जाता है। भारत में छात्र आंदोलनों और किसान आंदोलनों ने समय-समय पर अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है।
रोजगार, आर्थिक असुरक्षा और युवाओं की आकांक्षाएं-
प्रोफेसर सेखों ने वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा करते हुए कहा कि नई पीढ़ी की आकांक्षाएं पहले से अधिक स्पष्ट हैं। युवा अपने भविष्य, रोजगार और सामाजिक अवसरों को लेकर गंभीर हैं। तकनीकी विकास और संचार के विस्तार ने उन्हें देश-दुनिया की परिस्थितियों से अधिक परिचित कराया है।
उन्होंने रोजगार के सीमित अवसरों, सरकारी नौकरियों में कमी, संविदा आधारित काम और कृषि क्षेत्र में रोजगार की चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि वे अपने भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए किन अवसरों पर भरोसा करें।
उन्होंने यह भी कहा कि जब सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता है और संस्थाएं आम लोगों की समस्याओं पर समय रहते प्रतिक्रिया नहीं देतीं, तब असंतोष आंदोलन का रूप ले सकता है। ऐसे में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों को केवल तात्कालिक राजनीतिक घटना मानकर नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रोफेसर सेखों ने वर्तमान युवा आंदोलनों को सकारात्मक संभावना के रूप में देखते हुए कहा कि विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े युवाओं का साझा मुद्दों पर एक साथ आना महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, यह आंदोलन समाज में नई उम्मीद पैदा कर रहा है और लोगों को यह विश्वास दिला रहा है कि संगठित होकर सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है।
जवाबदेही की मांग और युवा आंदोलन-
परिचर्चा के दौरान अंकित कुमार ने आंदोलन के उद्देश्य और उसके प्रभावों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि किसी एक मंत्री या अधिकारी के इस्तीफे से पूरी व्यवस्था नहीं बदल जाती। उदाहरण के तौर पर, यदि एक व्यक्ति पद छोड़ता है और उसकी जगह उसी राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ा दूसरा व्यक्ति आ जाता है, तो इससे व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन अपने आप नहीं हो जाता।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे आंदोलनों से जवाबदेही की संस्कृति विकसित होती है। यदि किसी विभाग या संस्था में गलती होती है, तो संबंधित पदाधिकारी को उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उनके अनुसार, आंदोलन ने इस सोच को मजबूत किया है कि सत्ता में बैठे लोगों को अपनी गलतियों के लिए जवाब देना होगा।
अंकित कुमार ने यह भी कहा कि आंदोलन के कारण युवाओं में अपनी बात खुलकर रखने का साहस बढ़ा है। सोशल मीडिया पर युवा अब विभिन्न सामाजिक और सार्वजनिक मुद्दों पर वीडियो बनाकर अपनी राय सामने रख रहे हैं। इससे उनकी आवाज व्यापक समाज तक पहुंच रही है।
उन्होंने आंदोलन को लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा संघर्ष बताया। उनके अनुसार, लोकतंत्र में आम लोगों की वास्तविक भागीदारी तभी संभव है, जब उनकी आवाज संसद और राजनीतिक संस्थाओं तक पहुंचे तथा उन्हें अपने मुद्दे उठाने का अवसर मिले।
युवा आंदोलन जाति और धर्म से परे नई राजनीतिक पहचान बना रहा है: रणधीर कुमार गौतम –
परिचर्चा के दूसरे चरण में चर्चा इस सवाल पर केंद्रित हुई कि स्थापित राजनीतिक दल युवा आंदोलनों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कैसे करते हैं और क्या युवा अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने में सफल हो सकते हैं। वक्ताओं ने इस बात पर भी विचार किया कि आंदोलन को स्थायी नीतिगत बदलाव में बदलने के लिए किन रणनीतियों की आवश्यकता है।
राजनीतिक दलों की सीमाएं और युवा नेतृत्व का सवाल-
चर्चा के दौरान संचालक प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने कहा कि स्थापित राजनीतिक दल अक्सर किसी आंदोलन के व्यापक होने पर उसे अपने नियंत्रण में लेने या उसका राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि परंपरागत राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीतियां अक्सर जाति, धर्म और क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इसके विपरीत, मौजूदा युवा आंदोलन एक अलग राजनीतिक पहचान विकसित करने की संभावना प्रस्तुत करता है।
इस सवाल का जवाब देते हुए युवा समाजशास्त्री रणधीर कुमार गौतम ने कहा कि किसी भी सामाजिक आंदोलन को समझने के लिए दो अवधारणाएं महत्वपूर्ण हैं—मोबिलाइजेशन (जन लामबंदी) और इंस्टीट्यूशनलाइजेशन (संस्थागत रूप लेना)। मोबिलाइजेशन सिविल सोसाइटी के राजनीतिक प्रक्रिया को समझने में मदद देती है वहीं राजनीतिक दल ही माध्यम बनता है संस्थागत सुधार के लिए।
उन्होंने कहा कि लंबे समय से नागरिक समाज अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दे रहा था, लेकिन वर्तमान आंदोलन ने उसमें नई उम्मीद और सक्रियता पैदा की है। इस उम्मीद ने लोगों को अपनी आवाज उठाने और राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने की एजेंसी प्रदान की है। उनके अनुसार, आंदोलन के दौरान नागरिक समाज का मजबूत होना और एक नए दबाव समूह का उभरना महत्वपूर्ण घटनाक्रम है।
गौतम ने कहा कि राजनीतिक आंदोलनों का प्रभाव केवल तत्कालीन मांगों तक सीमित नहीं रहता। कई बार आंदोलन से उभरने वाला नेतृत्व आगे चलकर व्यापक राजनीतिक भूमिका निभाता है। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के उभार और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले आंदोलन का उल्लेख करते हुए बताया कि सामाजिक आंदोलनों ने भारतीय राजनीति को कई बार नई दिशा दी है।
उनके अनुसार, वर्तमान युवा आंदोलन भी एक नए प्रकार की जनसत्ता और राजनीतिक भागीदारी की मांग सामने ला रहा है। राजनीतिक दल लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन जब उनके प्रति लोगों का विश्वास कम होता है, तब नागरिक समाज और दबाव समूहों की भूमिका बढ़ जाती है।
गौतम ने कहा कि जयप्रकाश नारायण की लोकशक्ति की अवधारणा के संदर्भ में इस आंदोलन को समझा जा सकता है। यह आंदोलन लोगों की सामूहिक राजनीतिक शक्ति और नागरिक हस्तक्षेप की संभावना को सामने लाता है।
जाति और धर्म की पहचान से आगे बढ़ने की संभावना
रणधीर कुमार गौतम ने कहा कि भारतीय राजनीति में लंबे समय से जाति, धर्म और मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों के आधार पर सामाजिक विभाजन देखने को मिलता रहा है। इन विभाजनों ने युवाओं को भी अलग-अलग समूहों में बांटा है।
लेकिन वर्तमान आंदोलन में अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि और विचारधाराओं से जुड़े युवाओं का एक साथ आना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में वकीलों, शिक्षित युवाओं, बुद्धिजीवियों तथा वामपंथी और अन्य विचारधाराओं से जुड़े लोगों की भागीदारी दिखाई देती है।
गौतम के अनुसार, यह एकजुटता युवाओं को उनकी पारंपरिक सामाजिक पहचानों से अलग एक नई पहचान प्रदान कर रही है—एक ऐसे नागरिक की पहचान, जो लोकतांत्रिक अधिकारों और जवाबदेही के सवाल पर एक साथ खड़ा है।
उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और भगत सिंह जैसे व्यक्तित्वों से जुड़ी लोकतांत्रिक, सामाजिक और राजनीतिक परंपराएं इस तरह के आंदोलनों को वैचारिक संदर्भ प्रदान करती हैं।
उन्होंने बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में हुए आंदोलनों का भी उल्लेख किया, लेकिन कहा कि प्रत्येक देश की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां और विशिष्टताएं होती हैं। भारतीय युवा आंदोलन की विशेषता यह है कि इससे नागरिक समाज की ताकत, जनभागीदारी और लोकशक्ति के निर्माण की नई संभावनाएं उभर रही हैं।
गौतम ने विश्वास जताया कि युवाओं की यह एकजुटता भारतीय राजनीति के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।
आंदोलनों को बदनाम करने की राजनीति और सरकार की जवाबदेही
इसके बाद चर्चा इस सवाल पर पहुंची कि जब कोई आंदोलन व्यापक जनसमर्थन हासिल करने लगता है, तो सरकारें उससे कैसे निपटती हैं और आंदोलन की मांगों को स्थायी नीतिगत बदलाव में बदलने के लिए क्या किया जाना चाहिए।
प्रोफेसर जगरूप सिंह सेखों ने कहा कि बड़े आंदोलनों के सामने आने पर अक्सर उन्हें बदनाम करने के लिए विभिन्न प्रकार के राजनीतिक विमर्श तैयार किए जाते हैं। आंदोलन को बाहरी प्रभाव से प्रेरित बताने, प्रदर्शनकारियों को गैर-जिम्मेदार ठहराने या विपक्षी दलों के बहकावे में आया हुआ बताने जैसी कोशिशें की जाती हैं।
उन्होंने कहा कि जब विरोध को पूरी तरह नजरअंदाज करना संभव नहीं रहता, तब समितियां बनाने या भविष्य में समीक्षा करने का आश्वासन देकर मामले को टालने की कोशिश भी की जाती है।
सेखों के अनुसार, किसी आंदोलन की सफलता के लिए उत्साह के साथ विवेक और रणनीतिक समझ भी जरूरी है। उन्होंने मौजूदा युवा आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह बताई कि इसमें जाति, धर्म, क्षेत्र और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर साझा मुद्दों पर एकजुट होने की कोशिश दिखाई देती है।
मीडिया की विश्वसनीयता और सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका
प्रोफेसर सेखों ने कहा कि लोकतंत्र में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मीडिया नागरिकों की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने और सरकारी नीतियों की समीक्षा करने का माध्यम है। लेकिन जब पारंपरिक मीडिया की विश्वसनीयता कमजोर होती है, तो एक खाली स्थान पैदा होता है, जिसे सोशल मीडिया और वैकल्पिक संचार माध्यम भरने लगते हैं।
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से युवा अपने अनुभव, सवाल और विरोध सीधे लोगों तक पहुंचा रहे हैं। इससे आंदोलनों की आवाज को व्यापक समाज तक ले जाने की संभावना बढ़ी है।
उन्होंने यह भी कहा कि केवल सरकारी शक्ति के सहारे जन असंतोष को लंबे समय तक दबाए रखना आसान नहीं होता। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सरकार नागरिकों की समस्याओं को सुनती है या नहीं और संस्थाएं जनता के प्रति कितनी जवाबदेह रहती हैं।
चुनावी जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा
प्रोफेसर सेखों ने रोजगार, किसानों की आय और न्यायिक संस्थाओं को लेकर सार्वजनिक असंतोष का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकारों की घोषणाओं और आम नागरिकों के वास्तविक अनुभवों के बीच अंतर होने पर लोगों का भरोसा प्रभावित होता है।
उनके अनुसार, लोकतंत्र में जनता के पास चुनाव के माध्यम से सत्ता को जवाबदेह बनाने का अवसर होता है। लेकिन जवाबदेही केवल चुनाव तक सीमित नहीं होनी चाहिए। नागरिकों को सरकार और संस्थाओं से लगातार सवाल पूछने तथा अपनी समस्याओं को सार्वजनिक रूप से उठाने का अधिकार होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि युवाओं की बढ़ती नागरिकता बोध को लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। जब नागरिक संस्थाओं और सत्ता के निर्णयों पर सवाल उठाते हैं, तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श का दायरा बढ़ता है।
सेखों ने यह भी कहा कि वर्तमान आंदोलन ने नागरिक समाज और राजनीतिक भागीदारी के उन सवालों को फिर से प्रमुखता दी है, जो लंबे समय से कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे थे।
शांतिपूर्ण और संवैधानिक संघर्ष पर जोर
फैर संचालक ने अंकित कुमार से पूछा कि आंदोलन को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए क्या रणनीति अपनाई जाएगी। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले वे लोग, जो दिल्ली के जंतर-मंतर तक नहीं पहुंच सकते, आंदोलन में किस प्रकार भागीदारी कर सकते हैं।
जवाब में अंकित कुमार ने कहा कि आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए उनकी प्राथमिकता शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में रहकर संघर्ष करना है। उन्होंने महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी आंदोलन को लंबे समय तक चलाने के लिए अहिंसक और संवैधानिक तरीके महत्वपूर्ण हैं।
अंकित कुमार ने बताया कि आंदोलन के अगले चरण की रणनीति पर टीम के स्तर पर चर्चा की जानी बाकी है। उन्होंने कहा कि साथियों की रिहाई के बाद टीम की बैठक में आगे की योजना पर विचार किया जाएगा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन की भावी रणनीति में दो बातों को प्राथमिकता दी जाएगी—शांतिपूर्ण संघर्ष और कानून के दायरे में रहकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें उठाना।
उनके अनुसार, आंदोलन की कोशिश होगी कि सरकार को कानून-व्यवस्था के उल्लंघन का बहाना न मिले और लोकतांत्रिक मांगों को प्रभावी ढंग से सामने रखा जा सके।
समता मार्ग न्यूज़ पोर्टल एवं न्यूज़लेंस इंडिया की संयुक्त परिचर्चा
आंदोलन को जारी रखने और शांतिपूर्ण संघर्ष पर जोर
परिचर्चा के तीसरे चरण में युवाओं के आंदोलनों की निरंतरता, जेन-ज़ी की राजनीतिक भूमिका, नए नेतृत्व के उभार और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा जैसे सवालों पर चर्चा हुई।
सीजेपी के कार्यकर्ता अंकित कुमार ने कहा कि लोकतंत्र में आंदोलनों का होना जरूरी है। आंदोलन इस बात का प्रमाण हैं कि समाज के लोग अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर सजग हैं। इनके माध्यम से सरकारों को यह संदेश मिलता है कि सत्ता का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता और गलत निर्णयों के खिलाफ आवाज उठाने वाले नागरिक मौजूद हैं।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थान को लेकर पैदा हुई परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए अंकित कुमार ने कहा कि आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए वैकल्पिक स्थान और रणनीति पर विचार किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से जारी रहेगा और उनकी प्रमुख मांग मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा है।
जेन-ज़ी की राजनीति: डिजिटल माध्यमों से सड़कों तक
चर्चा का संचालन करते हुए प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने जेन-ज़ी की राजनीतिक भागीदारी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सामान्यतः 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी को स्मार्टफोन, एल्गोरिदम और बिखरे हुए मीडिया परिवेश के बीच सामाजिक अनुभव प्राप्त हुआ है।
इस पीढ़ी के सामने गिग इकॉनमी में रोजगार की असुरक्षा, पेपर लीक, बेरोजगारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली यह पीढ़ी अब अपने मुद्दों को लेकर सड़कों पर भी उतर रही है।
संचालक ने कहा कि इस पीढ़ी के आंदोलनों में विकेंद्रीकृत नेतृत्व और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल महत्वपूर्ण दिखाई देता है। ऐसे आंदोलन परंपरागत राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखते हुए अपनी स्वतंत्र पहचान विकसित करने की कोशिश करते हैं।
उन्होंने प्रोफेसर जगरूप सिंह सेखों से पूछा कि क्या सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले अभियान और बिखरा हुआ जनाक्रोश किसी केंद्रीय नेतृत्व के बिना ठोस राजनीतिक तथा संस्थागत बदलाव ला सकते हैं?
जेन-ज़ी के पास सवाल करने का साहस और तर्क करने की क्षमता है: प्रोफेसर सेखों
प्रोफेसर जगरूप सिंह सेखों ने कहा कि किसी भी आंदोलन को केवल गैर-राजनीतिक बताकर नहीं समझा जा सकता। यह देखना जरूरी है कि आंदोलन किन उद्देश्यों के लिए चल रहा है, उसमें कौन लोग भाग ले रहे हैं और उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
उन्होंने नई पीढ़ी की प्रशंसा करते हुए कहा कि युवाओं में अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने, सवाल करने और तर्क प्रस्तुत करने की क्षमता बढ़ी है। उनके अनुसार, शिक्षा के विस्तार और सामाजिक अनुभवों ने युवाओं के भीतर आलोचनात्मक चेतना विकसित की है।
प्रोफेसर सेखों ने कहा कि वर्तमान युवा आंदोलन को अधिक खुला और समावेशी माना जा सकता है। इसमें विभिन्न सामाजिक समूहों और विचारधाराओं से जुड़े लोग शामिल हैं, जबकि आंदोलन के मुद्दों पर अपेक्षाकृत अधिक स्पष्टता दिखाई देती है।
उन्होंने जोर दिया कि आंदोलन की अगुवाई और नियंत्रण युवाओं के हाथ में रहना महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दलों का समर्थन मिलना और आंदोलन के नेतृत्व पर उनका नियंत्रण स्थापित होना दो अलग-अलग बातें हैं।
बेरोजगारी, महंगाई और शिक्षा जैसे मुद्दे बना रहे हैं साझा आधार
प्रोफेसर सेखों ने कहा कि बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा में अनियमितताएं और मताधिकार से जुड़े सवाल ऐसे मुद्दे हैं, जो विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों के युवाओं को एक साथ ला सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जब सार्वजनिक विमर्श में सांप्रदायिक पहचान और विभाजनकारी मुद्दे अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं, तब रोजगार, शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा जैसे सवाल पीछे छूटने लगते हैं। वर्तमान आंदोलन इन बुनियादी मुद्दों को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में लाने की संभावना प्रस्तुत करता है।
उनके अनुसार, यह केवल किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक पद के विरुद्ध संघर्ष नहीं है, बल्कि नागरिकों की भागीदारी और सत्ता की जवाबदेही से जुड़ा व्यापक प्रश्न भी है।
उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन की शुरुआत को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक जागरण के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसके परिणामों का आकलन करने के लिए लंबी अवधि तक इसकी निरंतरता और संगठनात्मक क्षमता पर नजर रखना जरूरी होगा।
प्रोफेसर राधाकांता बारिक: आंदोलन से नए नेतृत्व का उभार
इसके बाद चर्चा में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर राधाकांता बारिक भी शामिल हुए। उन्होंने इस सवाल पर अपनी बात रखी कि लोकतांत्रिक आंदोलनों से उभरने वाले नए नेतृत्व को स्थापित राजनीतिक दलों और पारिवारिक राजनीति के बीच कितनी जगह मिल पाती है।
प्रोफेसर बारिक ने कहा कि मौजूदा आंदोलन नए नेताओं को सामने ला रहा है। उन्होंने नेहा बोरा, आंबेडकरवादी अधिकारों से जुड़ी नेहा और प्रधानमंत्री की नकल के माध्यम से राजनीतिक व्यंग्य प्रस्तुत करने वाली नेहा राठौर जैसे नामों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, इन युवाओं ने आंदोलन से पहले भी अपनी अलग पहचान बनाई थी और अब आंदोलन के माध्यम से उनकी आवाज तथा राजनीतिक हस्तक्षेप का दायरा बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति में परिवारों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन वर्तमान आंदोलन से उभर रहे नए नेतृत्व की अपनी स्वतंत्र पहचान है। यह नेतृत्व अपने तरीके से राजनीतिक सवाल उठा रहा है और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर रहा है।
नफरत की राजनीति के बजाय समान अधिकारों की मांग
प्रोफेसर बारिक ने आंबेडकरवादी विचारों और समान नागरिक अधिकारों के सवाल को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने चर्चा में सामने आए उन विचारों का उल्लेख किया, जिनमें धार्मिक स्थलों के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए नफरत की राजनीति का विरोध करने और सभी समुदायों की मुक्ति तथा समानता की बात कही गई।
उन्होंने कहा कि आंदोलन में उभरने वाले कुछ युवा नेता अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि युवा केवल विरोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे राजनीति के स्वरूप और उसके मूल्यों पर भी सवाल उठा रहे हैं।
प्रोफेसर बारिक के अनुसार, इस आंदोलन को केवल भ्रष्टाचार के प्रश्न तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इसके केंद्र में लोकतंत्र, सार्वभौमिक मताधिकार और नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी जैसे बुनियादी सवाल भी हैं।
उन्होंने भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिकों को समान रूप से अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने का अवसर मिले।
मतदाता सूची से लोगों के नाम हटाए जाने को लेकर उठी चिंताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बताया। उनके अनुसार, चुनावी प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी और मताधिकार की सुरक्षा पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
महिलाओं की भागीदारी आंदोलन की महत्वपूर्ण विशेषता
प्रोफेसर बारिक ने आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति और सत्ता से सवाल करने की क्षमता लोकतांत्रिक राजनीति के लिए महत्वपूर्ण है।
उन्होंने महिला अधिकारों और समानता से जुड़े सवालों पर चर्चा करते हुए कहा कि महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार और स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उनके अनुसार, जब महिलाएं सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होकर सामाजिक मान्यताओं और सत्ता को चुनौती देती हैं, तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श का दायरा बढ़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि युवा महिलाओं का नेतृत्व और उनकी स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति इस आंदोलन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल हैं।
मीम, रील और राजनीतिक व्यंग्य बने प्रतिरोध के नए माध्यम
चर्चा के अगले चरण में संचालक ने सोशल मीडिया पर युवाओं की रचनात्मक राजनीतिक भागीदारी का सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जेन-ज़ी ने रील, मीम और हैशटैग जैसे डिजिटल माध्यमों को विरोध तथा प्रतिरोध के साधन के रूप में इस्तेमाल किया है।
पहले जिस पीढ़ी को मोबाइल फोन और सोशल मीडिया में व्यस्त रहने वाली या राजनीतिक रूप से उदासीन माना जाता था, वही पीढ़ी अब इन माध्यमों के जरिए सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त कर रही है।
संचालक ने इस बदलाव को असहमति के लोकतंत्रीकरण के रूप में प्रस्तुत करते हुए रणधीर कुमार गौतम से पूछा कि क्या डिजिटल संस्कृति युवाओं को राजनीति से दूर करने के बजाय राजनीतिक अभिव्यक्ति का नया अवसर प्रदान कर रही है।
समता मार्ग न्यूज़ पोर्टल और न्यूज़लेंस इंडिया की परिचर्चा में वक्ताओं ने युवा चेतना, डिजिटल माध्यमों, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक अधिकारों पर विचार रखे।
डिजिटल माध्यमों से उभरती नई राजनीतिक चेतना
परिचर्चा के अंतिम चरण में प्रो. सुखदेव सिंह ने रणधीर कुमार गौतम से सवाल किया कि क्या डिजिटल माध्यमों के जरिए युवाओं में एक नई राजनीतिक चेतना विकसित हुई है? क्या डिजिटल फर्स्ट अप्रोच ने युवा आंदोलनों को एक नया रूप दिया है?
इसके जवाब में रणधीर कुमार गौतम ने कहा कि युवाओं का गैर-अनुरूपतावादी रवैया (Non-conformist attitude) अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। अब तक युवाओं के एक बड़े हिस्से को नरेंद्र मोदी का समर्थक मानते हुए अक्सर राष्ट्रवादी राजनीति के एक खास खांचे में देखा जाता था, लेकिन मौजूदा युवा आंदोलन ने नागरिकता-बोध, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की एक नई समझ सामने रखी है।
उन्होंने कहा कि इस आंदोलन की खास बात यह है कि इसमें युवाओं ने बिना पारंपरिक संगठनात्मक प्रशिक्षण के ही साहस और प्रतिरोध की क्षमता प्रदर्शित की है। पुराने आंदोलनों में नेतृत्व अक्सर संगठनों और वैचारिक प्रशिक्षण के माध्यम से तैयार होता था, जबकि आज के युवा अपने अनुभवों और परिस्थितियों से स्वयं प्रतिरोध की भाषा विकसित कर रहे हैं।
गौतम के अनुसार, लंबे समय से सत्ता और निर्णय-प्रक्रिया से दूर महसूस कर रहे युवाओं ने आंदोलन के माध्यम से अपनी नागरिक पहचान को फिर से स्थापित करने की कोशिश की है। यह केवल भारत तक सीमित परिघटना नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया और पश्चिमी यूरोप के कई समाजों में भी युवा लोकतांत्रिक स्पेस और राजनीतिक भागीदारी के नए रास्ते तलाश रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी के आंदोलनों का इतिहास लिखते समय युवाओं की भूमिका को केंद्र में रखना होगा।
प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही का सवाल
इसके बाद परिचर्चा में युवाओं की प्रमुख समस्याओं—पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, बेरोजगारी और गिग इकॉनमी की असुरक्षा—पर चर्चा हुई। प्रो. सुखदेव सिंह ने प्रो. राधाकांत बारिक से पूछा कि क्या प्रशासनिक मशीनरी इन समस्याओं को हल करने में सक्षम नहीं है, या इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है?
प्रो. राधाकांत बारिक ने कहा कि सार्वजनिक प्रशासन में जवाबदेही (Accountability) और उत्तरदायित्व (Responsibility) एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी भी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को जनता की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
उन्होंने जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक जवाबदेही का विशेष महत्त्व है। यदि कोई जनप्रतिनिधि जनता के हितों के विरुद्ध काम करता है, तो नागरिकों को उससे सवाल पूछने का अधिकार होना चाहिए।
बारिक ने प्रशासनिक जवाबदेही के साथ-साथ नैतिक जवाबदेही पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, सार्वजनिक जीवन में मूल्यों और नैतिकता का महत्त्व तभी है, जब उनका पालन व्यवहार में भी दिखाई दे। केवल परंपरा और सभ्यता की बात करना पर्याप्त नहीं है; राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन को अपने आचरण से भी जवाबदेही प्रदर्शित करनी चाहिए।
आर्थिक असमानता और लोकतांत्रिक अधिकार
प्रो. बारिक ने आर्थिक केंद्रीकरण को भी भारतीय समाज की एक गंभीर समस्या बताया। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में संपत्ति का संकेंद्रण बढ़ा है, जबकि समाज के बड़े हिस्से की आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। उनके अनुसार, आर्थिक गतिविधियों का विकेंद्रीकरण आवश्यक है, ताकि विकास के अवसर समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच सकें।
उन्होंने मौजूदा युवा आंदोलन की विशेषता बताते हुए कहा कि इसके केंद्र में केवल आर्थिक मांगें नहीं हैं। पहले के कई युवा आंदोलन रोजगार, शिक्षा और अन्य आर्थिक समस्याओं से जुड़े थे, लेकिन वर्तमान आंदोलन में लोकतंत्र, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और नागरिकों के राजनीतिक अधिकार भी प्रमुख प्रश्न बनकर उभरे हैं।
बारिक ने चेतावनी दी कि यदि मतदान के अधिकारों को सीमित करने या नागरिकों को मतदाता सूची से बाहर करने की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और समाज के अन्य हाशिए पर स्थित समूहों पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हों।
युवा आंदोलन की सफलता के लिए क्या जरूरी है?
परिचर्चा के समापन से पहले संचालक ने सभी वक्ताओं से एक महत्त्वपूर्ण सवाल पूछा—ऐसा कौन-सा कारक है, जिसके आधार पर कोई युवा आंदोलन राजनीतिक बदलाव लाने में सफल हो सकता है, और किन परिस्थितियों में वह विफल हो सकता है?
प्रो. जगरूप सिंह सेखों ने कहा कि युवाओं में विकसित हो रही नई सामाजिक-राजनीतिक चेतना और व्यवस्था की कमजोरियों को पहचानने की क्षमता इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहा कि यदि युवाओं को समाज का समर्थन मिलता रहा और वे अपने संघर्ष को बनाए रखने में सफल रहे, तो इससे बदलाव का नया रास्ता निकल सकता है।
प्रो. राधाकांत बारिक ने सड़क को लोकतांत्रिक राजनीति के एक महत्त्वपूर्ण स्थल के रूप में देखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक लोकप्रिय संस्कृति और हिंदी फिल्मों में सड़क की भूमिका प्रमुख रही, लेकिन राजनीतिक स्पेस के रूप में सड़क की उपस्थिति अपेक्षाकृत कमजोर हुई। मौजूदा युवा आंदोलन ने सड़क को फिर से राजनीतिक अभिव्यक्ति का मंच बनाया है।
बारिक के अनुसार, युवा आंदोलन में नृत्य, संगीत, मिमिक्री, संवाद और राजनीतिक व्यंग्य जैसे माध्यमों का इस्तेमाल हो रहा है। इससे विरोध की भाषा अधिक व्यापक और जनसुलभ बन रही है। उन्होंने कहा कि अब युवा, बुजुर्ग और महिलाएं भी इन अभिव्यक्तियों में भागीदारी कर रहे हैं। इस तरह सड़क एक बार फिर लोकतांत्रिक प्रतिरोध और जनसंवाद का महत्त्वपूर्ण स्थान बन रही है।
रणधीर कुमार गौतम: संघर्ष की शर्त है आशा-
रणधीर कुमार गौतम ने कहा कि एक समाजशास्त्री के रूप में वह किसी भी आंदोलन में दो महत्त्वपूर्ण तत्व देखते हैं—एजेंसी (Agency) और आशा (Hope)। उनके अनुसार, एजेंसी संघर्ष की क्षमता है, जबकि आशा उस क्षमता को बनाए रखने की शर्त है।
उन्होंने डॉ. राममनोहर लोहिया के विचार का उल्लेख किया कि यदि सड़कें वीरान हो जाएंगी, तो संसद आवारा हो जाएगी। गौतम ने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की आवाज, उसके संघर्ष और उसकी लोकतांत्रिक कल्पना में निहित है।
उन्होंने गांधी के सत्याग्रह को भी मौजूदा समय के लिए महत्त्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, जनसंघर्ष का उद्देश्य केवल सत्ता पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और जनता की भागीदारी को मजबूत करना भी है।
लोकतंत्र में जनता की भूमिका पर जोर
परिचर्चा के अंत में संचालक प्रो. सुखदेव सिंह ने दर्शकों से भी अपनी राय साझा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि युवा आंदोलनों के भविष्य और उनके संभावित राजनीतिक प्रभाव पर नागरिकों को अपनी बात रखनी चाहिए।
पूरी चर्चा में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि युवा आंदोलन केवल तात्कालिक असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं हैं। वे प्रशासनिक जवाबदेही, नागरिक स्वतंत्रता, मतदान के अधिकार, आर्थिक असमानता और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे व्यापक प्रश्नों को सामने ला सकते हैं।
इस परिचर्चा का केंद्रीय संदेश यह रहा कि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसकी शुरुआत या भीड़ पर निर्भर नहीं करती। उसके लिए सामाजिक समर्थन, राजनीतिक चेतना, निरंतर संघर्ष, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता और भविष्य के प्रति आशा भी आवश्यक हैं।
समता मार्ग न्यूज़ पोर्टल और न्यूज़लेंस इंडिया की इस परिचर्चा ने युवा आंदोलनों के बदलते स्वरूप और भारतीय लोकतंत्र में उनकी संभावित भूमिका पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया।
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