आर एस एस का ऐतिहासिक कबूलनामा

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Ram sharan

इस साल विजयदशमी पर ऐतिहासिक घटना हुई। अधिकांश भारतीय मानते हैं कि विजयदशमी के दिन रावण की नाभि से अमृत को नष्ट कर उसे पराजित कर दिया गया।‌ कुछ ऐसी ही घटना इस बार हुआ है।
विजय दशमी के दिन ही सौ साल पहले आर एस एस का जन्म हुआ था। इसीलिए हर विजयदशमी पर आर एस एस प्रमुख का भाषण साल भर में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस वर्ष आरएसएस की सौंवी वर्षगांठ थी, इसलिए यह भाषण विशेष महत्व का था। लेकिन इस बार आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने ऐसी बात कबूल कर ली, जिसमें इस संगठन का भविष्य खतरे में पड़ गया है। उन्होंने खुलेआम घोषणा कर दी कि आरएसएस मोदी सरकार की रक्षा केलिए रेजीम चेंज का मुकाबला करेगा।

आरएसएस सांस्कृतिक संगठन या राजनैतिक
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आरएसएस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के कारण बैन लगा दिया गया था। तब आरएसएस ने अपने को गैर राजनैतिक संगठन घोषित कर के मुक्ति पाई थी। हालांकि संघ के अंदर और बाहर के अधिकांश लोग इस झूठ को जानते हैं। सब जानते हैं कि आरएसएस के कार्यकर्ता भाजपा को चुनाव जिताने और मजबूत करने केलिए कितना मेहनत करते हैं।
लेकिन यह पहली बार है कि इस महत्वपूर्ण अवसर पर आरएसएस प्रमुख ने भाजपा का लाठीधारी होना स्वीकार कर लिया। अब आरएसएस पर कानूनी तौर पर बैन लगाना आसान हो गया है।

भाजपा सरकार को किससे खतरा है ?
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मोहन भागवत जी ने आरोप लगाया है कि भारत और अन्य देशों में चल रहे युवाओं के आन्दोलन के पीछे पश्चिमी ताकतों का हाथ है, जिसके कारण नेपाल और बांग्लादेश में सत्ता बदल चुकी है और भारत में जारी है। अब यूरोप के अधिकांश देशों में भी यह आन्दोलन चल रहे हैं। लेकिन उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया। इंदिरा गांधी तो अपने विरोधियों को बदनाम करने के लिए सीधे अमेरिका का नाम लेती थीं। पर भागवत जी या मोदीजी क्या अमेरिका का नाम लेने की हिम्मत करेंगे? आज अमेरिका और इजरायल के त्रिगुट में शामिल होने के कारण भारत पूरी दुनिया में बदनाम हो रहा है, जैसे दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी जापान और इटली थे। आज गाजा पट्टी में जो नरसंहार हो रहा है उषका दोष भारत पर भी है। अन्य पश्चिमी देशों में तो खुद आन्दोलन चल रहा है। तब इन युवाओं के आक्रोश की जड़ कहां है? वास्तव में जब से सोवियत संघ समाप्त हुआ और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राज आया है, अधिकांश देशों की सरकार पर पूंजीपतियों का नियंत्रण होगया है। इन कंपनियों के भारी शोषण और दमन के कारण अधिकांश देशों में मंहगाई, बेरोजगारी और गरीबी तेजी से बढ रही है। यही युवा आक्रोश का मुख्य कारण है। लेकिन यह बात मोदीजी या भागवत जी कैसे कबूल कर सकते हैं?

आरएसएस की गुलामी का कबूलनामा
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मोहन भागवत जी का करीब 25 वर्षों से आरएसएस पर नियंत्रण है। उन्होंने अडवाणी जी से काफी जूनियर होते हुए भी पूंजीपतियों से सांठगांठ करके उन्हें निबटा दिया। लेकिन मोदीशाह की सत्ता उनके नियंत्रण से बाहर हो गई। यह ठीक है कि सरकार ने कश्मीर, राममंदिर आदि मुद्दों पर आरएसएस को संतुष्ट कर दिया तथा सही गलत तरीके से भरपूर आर्थिक सहयोग दिया। इतना पैसा दिया कि आरएसएस पूरी तरह बदल गई। लेकिन सरकारी नीतियों में आरएसएस का हस्तक्षेप खत्म कर दिया। सत्ता पर असली नियंत्रण पूंजीपतियों और उनके दलालों का है। मोहन भागवत जी ने काफी कोशिश की कि भाजपा पर पहले जैसा नियंत्रण रखा जाये, पर असफल रहे। मोदीजी को पचहत्तर साल होने पर रिटायर कराने की कोशिश पूरी तरह नाकाम हुई। यहां तक कि दो साल तक संघर्ष करने के बावजूद वे भाजपा के अध्यक्ष पद पर अपना आदमी नहीं बिठा पाये। इस फ्रस्ट्रेशन में वे मोदीजी की अप्रत्यक्ष आलोचना करते रहे, नसीहतें देते रहे। अपने को काफी उदारवादी दिखाने की कोशिश की । लेकिन उनके संगठन को पैसे का चस्का लग चुका है। मोदी शाह का हटना किसी कार्यकर्ता को कबूल नहीं है। भ्रष्टाचार इतना है कि राममंदिर के चंदे से दो करोड़ की जमीन अठारह करोड़ में खरीदी गई। तब आरएसएस का डंडा मोदी जी पर कैसे चलता। अंत में मोहन भागवत जी को ही समर्पण करना पड़ा। इस भाषण में मोहन भागवत जी ने मोदीजी की भूरी भूरी प्रशंसा करके पूरा सरेंडर कर दिया। अब भविष्य में भाजपा पर आरएसएस का नियंत्रण नहीं रहेगा। आरएसएस कांग्रेस सेवादल की तरह एक सेवक संगठन बन जायेगा। लेकिन सौ साल तक के वर्चस्व के बाद गुलामी हमेशा हमेशा दुखद स्मृति देगा।।।


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