— मनीषा कुमारी —
1. विकास का वास्तविक पैमाना: मानव कल्याण-
चर्चा की शुरुआत प्रोफेसर आनंद कुमार ने विकास की अवधारणा को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझाते हुए की। उन्होंने कहा कि विकास का मूल्यांकन करने के दो अलग-अलग पैमाने हो सकते हैं। पहला पैमाना बड़े शहरों, हवाई अड्डों, सड़कों, रेलवे, सेना और बाजार की चमक-दमक से जुड़ा है। यह मुख्यतः राजसत्ता और बाजार की शक्ति को प्रदर्शित करता है। दूसरा पैमाना आम नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से संबंधित है। इसमें स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, आवास, रोजगार, सामाजिक न्याय, नागरिक स्वतंत्रता और समाज में हिंसा की स्थिति जैसे प्रश्न शामिल हैं।
उन्होंने स्कैंडिनेवियाई देशों—डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे और फिनलैंड—का उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और रोजगार के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। मानव विकास के मूल्यांकन में इन देशों का बेहतर प्रदर्शन इस बात को रेखांकित करता है कि विकास का वास्तविक उद्देश्य नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। प्रोफेसर आनंद कुमार के अनुसार भारत में बड़े शहरों का विस्तार और बुनियादी ढाँचे का विकास दिखाई देता है, लेकिन महानगरों में प्रदूषण, यातायात, अपराध और जीवन की बढ़ती कठिनाइयाँ भी गंभीर चुनौतियाँ हैं। उन्होंने कुपोषण, कम आय, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और शिक्षा की समस्याओं पर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार देश में संपत्ति का असमान वितरण एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने चर्चा में यह तथ्य भी रेखांकित किया कि देश की लगभग 40 प्रतिशत संपत्ति एक प्रतिशत आबादी के हाथों में केंद्रित है। उन्होंने कहा कि यदि विकास का लाभ समाज के एक छोटे वर्ग तक सीमित रह जाता है, तो उसे समावेशी विकास नहीं कहा जा सकता।
2. लोकतंत्र, सामाजिक समानता और डॉ. आंबेडकर की दृष्टि-
डॉ. अभय कुमार ने भारतीय लोकतंत्र और आर्थिक-सामाजिक असमानता के बीच संबंधों को स्पष्ट करते हुए अपने विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारत में गैर-बराबरी को समझने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों को गंभीरता से समझना आवश्यक है। वे विशेष रूप से संविधान निर्माण के समय आंबेडकर द्वारा प्रस्तुत उस चेतावनी का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने राजनीतिक समानता और सामाजिक-आर्थिक असमानता के बीच मौजूद विरोधाभास की ओर ध्यान दिलाया था।
डॉ. अभय कुमार ने इस विरोधाभास को एक सामान्य उदाहरण के माध्यम से समझाया। चुनाव में एक करोड़पति व्यक्ति और उसके घर में काम करने वाली महिला—दोनों को एक-एक वोट का समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन चुनाव के बाद दोनों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर बना रहता है। एक व्यक्ति के पास आर्थिक संसाधन, राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जबकि दूसरा व्यक्ति झुग्गी में रहने, बच्चों की बीमारी, भोजन की कमी और कर्ज जैसी समस्याओं से जूझता है। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक समानता स्थापित कर देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्र के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता भी आवश्यक है।
उनके अनुसार उदारवादी लोकतंत्र की सीमाओं को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि वह अक्सर नागरिकों की राजनीतिक समानता पर तो जोर देता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
उन्होंने डॉ. आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सरकार चुनने का अधिकार देना नहीं, बल्कि समाज में मौजूद गैर-बराबरी को समाप्त करने की दिशा में काम करना भी है। उन्होंने राममनोहर लोहिया के विचारों का भी उल्लेख किया। लोहिया का मानना था कि किसी भी कार्यालय में सबसे निचले और सबसे ऊँचे वेतन के बीच का अंतर सीमित होना चाहिए अर्थात दोनों के बीच 10 गुना से ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए। इस प्रकार सामाजिक और आर्थिक समानता लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।
3. वैश्विक पूँजीवाद, स्थानीय राजनीति और विकास का विरोधाभास-
समाजशास्त्री रणधीर कुमार गौतम ने विकास के वर्तमान मॉडल को समझने के लिए वैश्विक आर्थिक शक्तियों और स्थानीय राजनीति के परस्पर संबंधों पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में कोई भी देश वैश्विक बाजार से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि वैश्विक बाजार की शोषणकारी प्रवृत्तियों से अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था को बचाया जाए।
उन्होंने world system theory का उल्लेख करते हुए कहा कि विकसित देशों की पूँजी और विकासशील देशों के श्रम एवं बाजार के बीच एक गहरा संबंध है। विकसित देशों की आर्थिक प्रगति में विकासशील देशों के श्रम और बाजार की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि भारत में जो आर्थिक विकास हो रहा है, उसका वास्तविक लाभ भारतीय नागरिकों को कितना मिल रहा है।उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहुसंख्यक नागरिकों के पास मतदान की शक्ति होती है, लेकिन सरकारों की आर्थिक नीतियाँ हमेशा बहुसंख्यक आबादी के हितों को प्राथमिकता नहीं देतीं।
उन्होंने इस संदर्भ में तीन प्रमुख कारकों की चर्चा की:
1.वैश्विक आर्थिक शक्तियाँ और अंतरराष्ट्रीय पूँजी।
2.देश के प्रभावशाली पूँजीपति एवं उच्च वर्ग, जिनके आर्थिक हित नीतियों को प्रभावित करते हैं।
3. आम नागरिक, विशेषकर किसान, आदिवासी और समाज के अन्य हाशिये पर स्थित समुदाय।
उन्होंने कहा कि भारत के विकास मॉडल में पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच भी गंभीर टकराव दिखाई देता है।
एक तरफ प्रकृति, जंगल और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है, तो दूसरी तरफ शहरीकरण, औद्योगीकरण और मध्यवर्गीय उपभोग को बढ़ावा देने वाला विकास मॉडल है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों का विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव विकास की मौजूदा अवधारणा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
उनके अनुसार विकास का उद्देश्य लोगों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि विकास के नाम पर उनके अधिकारों, आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों को उनसे छीन लेना। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक वर्ग की जवाबदेही है कि वह विकास और विनाश के बीच के इस अंतर को समझे और आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे।
5. औपनिवेशिक विरासत, ऊर्जा, शिक्षा और रोजगार का संकट-
प्रोफेसर आनंद कुमार ने आगे कहा कि भारत की वर्तमान आर्थिक चुनौतियों को समझने के लिए औपनिवेशिक शासन की ऐतिहासिक विरासत को भी ध्यान में रखना होगा।
उन्होंने दादाभाई नौरोजी के ‘ड्रेन थ्योरी’ का उल्लेख करते हुए बताया कि ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था और उत्पादन व्यवस्था को भारी नुकसान पहुँचा था।
वर्तमान विकास मॉडल की चुनौतियों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने चार महत्वपूर्ण प्रश्नों पर चर्चा की— Economy (ऊर्जा), Education ( शिक्षा), Employment (रोजगार) और Economy (आर्थिक संरचना)।
ऊर्जा का प्रश्न: उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था और औद्योगिक गतिविधियाँ ऊर्जा पर निर्भर हैं। देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित ईंधन से पूरा होता है। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता और विकास की स्थिरता प्रभावित होती है।
शिक्षा का प्रश्न: उन्होंने उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और वैश्विक स्तर पर भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार चीन ने शिक्षा के क्षेत्र में लगातार निवेश करके उल्लेखनीय प्रगति की है, जबकि भारत को इस दिशा में अभी बहुत काम करना है।
रोजगार का प्रश्न: उन्होंने बेरोजगारी को देश की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बताया। उनके अनुसार शिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं हैं। कृषि क्षेत्र में भी आवश्यकता से अधिक लोगों की निर्भरता है, जिसे छिपी हुई बेरोजगारी कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि विकास को मापने के लिए यह देखना आवश्यक है कि लोगों को रोजगार मिल रहा है या नहीं, उनकी आमदनी बढ़ रही है या नहीं और उनके खानपान एवं जीवन स्तर में सुधार हो रहा है या नहीं।
6. नवउदारवाद और जीडीपी केंद्रित विकास मॉडल-
डॉ. अभय कुमार ने प्रोफेसर प्रभात पटनायक की पुस्तक ‘Socialism and the Indian Constitution’ का उल्लेख करते हुए भारत की स्वतंत्रता के बाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद लगभग 1980 तक अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी नीतियों ने संपत्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण को कुछ हद तक कम करने में भूमिका निभाई। लेकिन 1980 के बाद नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का प्रभाव बढ़ने लगा। बाजार आधारित विकास और निजी पूँजी को अधिक महत्व दिया जाने लगा।
उन्होंने डेविड हार्वे की नवउदारवाद संबंधी व्याख्या का उल्लेख करते हुए कहा कि जहाँ पहले बाजार मौजूद नहीं था, वहाँ भी बाजार का निर्माण करना नवउदारवादी व्यवस्था की एक प्रमुख प्रवृत्ति है।
डॉ. अभय कुमार के अनुसार इस बदलाव के साथ विकास की अवधारणा में भी परिवर्तन आया। पहले विकास को औपनिवेशिक शोषण से मुक्ति, राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता और कल्याणकारी राज्य के संदर्भ में देखा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे जीडीपी वृद्धि को ही विकास का प्रमुख पैमाना बना दिया गया। उन्होंने इसे ‘जीडीपी राष्ट्रवाद’ की संज्ञा देते हुए कहा कि आर्थिक वृद्धि के आँकड़े महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे अपने आप में आम नागरिकों के कल्याण का प्रमाण नहीं हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारत से छोटे कई देशों में मानव विकास, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति बेहतर दिखाई देती है। श्रीलंका का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि किसी देश की अर्थव्यवस्था का आकार ही वहाँ के नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता निर्धारित नहीं करता।
इस चर्चा के दूसरे चरण में डॉ. अभय कुमार ने विकास के मौजूदा मॉडल, आदिवासी समाज, पर्यावरण और तकनीकी प्रगति से जुड़े नैतिक प्रश्नों को उठाया। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान संघर्ष, लोकतंत्र और सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से ही संभव है। इसके लिए समाज में राजनीतिक चेतना और जागरूकता पैदा करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि आज देश को एक नहीं, बल्कि अनेक डॉ. राममनोहर लोहिया और डॉ. भीमराव आंबेडकर की जरूरत है।
डॉ. अभय कुमार ने आदिवासी समाज के जीवन और नवउदारवादी अर्थव्यवस्था के बीच अंतर की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव का उल्लेख करते हुए बताया कि आदिवासी समाज के जीवन में अभी भी बाजार के अंधाधुंध प्रभाव और व्यावसायीकरण की प्रवृत्ति अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदायों के जीवन में अनेक सुधारों की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उनकी जीवनशैली की सकारात्मक और प्रकृति के अनुकूल विशेषताओं से समाज को सीखना चाहिए।
उन्होंने पंजाब के कृषि मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि अधिक उत्पादन और लगातार कई फसलें उगाने की होड़ ने जमीन, भूजल और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। इसके विपरीत आदिवासी समाज की पारंपरिक कृषि पद्धतियों में प्रकृति के साथ संतुलन का एक महत्वपूर्ण तत्व मौजूद है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और तकनीकी विकास पर उन्होंने कहा कि वे मशीनों या प्रगति के विरोधी नहीं हैं। डॉ. लोहिया भी मशीन और तकनीक के विरोधी नहीं थे। लेकिन विकास के साथ नैतिक प्रश्नों को जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने सवाल उठाया कि विकास किसके लिए हो रहा है और उसका लाभ किसे मिल रहा है? क्या विकास की प्रक्रिया में पेड़-पौधों, जंगलों, नदियों, मछलियों, पशुओं और पक्षियों के अस्तित्व तथा अधिकारों का भी ध्यान रखा जा रहा है?
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने झारखंड के लेखक शुभेंदु शेखर हांसदा की कहानी The Adivasi Will Not Dance का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस कहानी में आदिवासियों को एक सरकारी कार्यक्रम में मांदर बजाने के लिए बुलाया जाता है, जबकि उसी कार्यक्रम के पीछे उनकी जमीन और घरों को उजाड़कर थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने की योजना होती है। विकास की यह कैसी अवधारणा है, जिसमें आदिवासियों की जमीन और उनकी सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करके विकास की इमारत खड़ी की जाती है?
डॉ. अभय कुमार ने निष्कर्षतः कहा कि अर्थव्यवस्था को मानवीय संवेदना और नैतिक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। केवल आर्थिक आंकड़ों और तकनीकी मॉडल के आधार पर विकास का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इसके लिए लोकतांत्रिक और सामाजिक आंदोलनों को मजबूत करना होगा।
7. बाजार बनाम नागरिक: एस. एन. साहू का वक्तव्य-
इसके बाद चर्चा में श्री एस. एन. साहू शामिल हुए। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. के. आर. नारायणन के विशेष कार्याधिकारी (OSD) के रूप में उनके साथ निकटता से कार्य कर चुके हैं।
संचालक प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने उनसे सवाल किया कि जब राजनीतिक दल चुनाव के समय आम आदमी की बात करते हैं, लेकिन आर्थिक नीतियों में बाजार को प्राथमिकता दी जाती है, तो नागरिक-केंद्रित नीतियों और व्यवहार को वास्तविकता में कैसे लागू किया जा सकता है?
श्री साहू ने अपने वक्तव्य की शुरुआत महात्मा गांधी के विचारों से की। उन्होंने कहा कि नवउदारवादी दौर में बाजार का प्रभाव इतना व्यापक हो गया है कि समाज की लगभग हर चीज को बाजार के नजरिये से देखा जाने लगा है। इसका परिणाम आर्थिक असमानता में लगातार वृद्धि के रूप में सामने आया है।
उन्होंने थॉमस पिकेटी के असमानता संबंधी अध्ययन और भारत में बढ़ती आर्थिक विषमता का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में अरबपतियों की संख्या और संपत्ति बढ़ने के साथ यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आम नागरिक की स्थिति क्या है? उन्होंने महात्मा गांधी के 1920 के विचार का उल्लेख किया कि “एक सुव्यवस्थित समाज की पहचान अरबपतियों के उत्पादन से नहीं, बल्कि भूख, गरीबी और अभाव को कम करने से होनी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि यदि देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, तो हमें यह भी देखना चाहिए कि भूख, कुपोषण और गरीबी की स्थिति क्या है। भोजन, पोषण और शिक्षा तक पहुंच के साथ अब नागरिकों के सामने मतदान के अधिकार को सुरक्षित रखने की चुनौती भी खड़ी हो रही है।
8. मतदान का अधिकार और नागरिकता का संकट-
श्री साहू ने कहा कि आज देश में नागरिकता और मताधिकार से जुड़े प्रश्न गंभीर होते जा रहे हैं। उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए जाने की खबरों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि मतदाता पहचान और नागरिकता के प्रश्न को लेकर ऐसी स्थिति बन रही है, जहां लोगों के अन्य सरकारी अधिकार और कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच भी प्रभावित हो सकती है। उन्होंने पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया संस्थानों की खोजी रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विषय पर सामने आए तथ्यों को गंभीरता से समझने की जरूरत है।
उन्होंने महात्मा गांधी के 1930-31 के कराची प्रस्ताव और मौलिक अधिकारों की चर्चा करते हुए कहा कि वयस्क मताधिकार को मौलिक अधिकारों के व्यापक विचार का हिस्सा माना गया था। उन्होंने 1924 की एक घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें एक व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था और चुनाव समाप्त होने के बाद ही उसे दोबारा जोड़ा गया। इस प्रसंग पर गांधी ने Depriving Him of His Right शीर्षक से लेख लिखकर मताधिकार से वंचित किए जाने की समस्या को उठाया था।
श्री साहू ने इस ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से कहा कि चुनाव के समय किसी नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित करना और चुनाव समाप्त होने के बाद उसका नाम मतदाता सूची में वापस जोड़ देना लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।
उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान समय में केवल बाजारवादी व्यवस्था ही नागरिकों के अधिकारों के लिए चुनौती नहीं है, बल्कि एक ऐसी विचारधारा का भी प्रभाव बढ़ रहा है, जो संविधान द्वारा स्थापित अधिकारों की व्यापक और समावेशी अवधारणा के विरुद्ध जाती है। उनके अनुसार, हिंदुत्व की बहिष्करणवादी राजनीति और कॉरपोरेट हितों का गठजोड़ नागरिकता के विचार को कमजोर कर सकता है।
9. अहिंसक आंदोलन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा
श्री साहू ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस कार्रवाई, लोगों को हिरासत में लेने और उनसे Bond भरवाने जैसी घटनाओं पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार, रोजगार गारंटी से जुड़े अधिकार और अब मताधिकार जैसे नागरिक अधिकारों पर भी दबाव दिखाई दे रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विरोध और प्रदर्शन करना संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है। इस संदर्भ में उन्होंने मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में अमेरिका में अश्वेत नागरिकों के मतदान अधिकार के लिए चले अहिंसक आंदोलन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अहिंसक आंदोलन इसलिए सफल हो सकते हैं क्योंकि वे संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की रक्षा के व्यापक उद्देश्य से जुड़े होते हैं तथा समाज का समर्थन प्राप्त करते हैं।
उन्होंने गांधी के दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष का भी उल्लेख किया। वर्ष 1894 में south africa में मताधिकार को सीमित करने के प्रयासों का विरोध करते हुए गांधी ने चेतावनी दी थी कि यदि नागरिकों का राजनीतिक अधिकार छीन लिया गया, तो आगे चलकर उनके व्यापार और अन्य अधिकार भी खतरे में पड़ सकते हैं। श्री साहू के अनुसार, उस समय कुछ व्यापारियों ने अपने आर्थिक हितों के कारण इस संघर्ष को गंभीरता से नहीं लिया था।
उन्होंने इस ऐतिहासिक अनुभव को वर्तमान परिस्थितियों से जोड़ते हुए कहा कि जब नागरिकों के राजनीतिक अधिकार कमजोर होते हैं, तो अंततः उनके आर्थिक और व्यावसायिक अधिकार भी सुरक्षित नहीं रह सकते। इसलिए लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा केवल राजनीतिक प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक जीवन और आम आदमी के हितों से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।
श्री साहू ने कहा कि भारत में नागरिकता की अवधारणा व्यापक और उदार होनी चाहिए। उन्होंने संविधान सभा में सरदार पटेल द्वारा व्यक्त उस विचार का उल्लेख किया कि भारतीय नागरिकता की परिभाषा इतनी व्यापक और उदार होनी चाहिए कि दुनिया उससे सीख सके।
उन्होंने डॉ. आंबेडकर के संविधान सभा में दिए गए अंतिम भाषण का संदर्भ देते हुए कहा कि राजनीतिक लोकतंत्र का आधार ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ है, लेकिन इसके साथ ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ की स्थापना भी जरूरी है। आज जब मतदान के अधिकार पर ही सवाल खड़े हो रहे हैं, तब लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा की रक्षा करना और भी आवश्यक हो जाता है।
10 . स्वदेशी विकास मॉडल की आवश्यकता
श्री एस. एन. साहू के वक्तव्य के बाद संचालक प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने चर्चा को विकास के वैचारिक आधार की ओर आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि भारत में विकास को लेकर एक ओर पश्चिमी मॉडल है, जबकि दूसरी ओर स्वदेशी और स्थानीय जीवन-पद्धतियों पर आधारित विकास की अवधारणाएं हैं।
उन्होंने प्रोफेसर आनंद कुमार से सवाल किया कि भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने के लिए केवल पश्चिमी दृष्टिकोण पर निर्भर रहने के बजाय स्वदेशी सैद्धांतिक ढांचे और विकास मॉडल की आवश्यकता पर वे लंबे समय से जोर देते रहे हैं। ऐसे में, जब वैश्वीकरण और पश्चिमी विकास मॉडल का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है तथा सरकार भी स्वदेशी की बात करती है, तो भारत में एक वैकल्पिक और जन-केंद्रित स्वदेशी विकास मॉडल किस प्रकार विकसित किया जा सकता है?
इस प्रश्न के साथ चर्चा का अगला चरण भारतीय स्वदेशी विकास की अवधारणा और वैश्वीकरण के प्रभावों की ओर बढ़ा।
स्वदेशी विकास मॉडल और ग्राम स्वराज की अवधारणा
चर्चा के तीसरे चरण में प्रोफेसर आनंद कुमार ने भारतीय समाज की विविधता को ध्यान में रखते हुए विकास के एक वैकल्पिक और स्वदेशी मॉडल की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत का सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है। भारत में भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र और संस्कृति की व्यापक विविधता है। इसलिए पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल की हूबहू नकल करके भारत अपनी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता।
उन्होंने कहा कि भारत के लिए विकेंद्रीकृत लोकतांत्रिक व्यवस्था अधिक उपयुक्त होगी, जिसमें सत्ता और निर्णय लेने के अधिकार केंद्र से राज्यों, राज्यों से जिलों और जिलों से गांवों तक पहुंचें। ग्राम पंचायत को लोकतांत्रिक व्यवस्था का केंद्र बनाया जाना चाहिए। जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकार सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ रहा है और निर्णय लेने की शक्ति कुछ लोगों तक सीमित होती जा रही है। इसके विपरीत भारत की विविधता को सुरक्षित रखने के लिए सत्ता का वास्तविक विकेंद्रीकरण जरूरी है।
11.उन्होंने ग्राम स्वराज की गांधीवादी अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि नागरिकों की प्रत्यक्ष भागीदारी को भी महत्व दिया जाना चाहिए। नागरिकों को अपने स्थानीय परिवेश और संसाधनों के प्रबंधन में निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए। नौकरशाही की भूमिका इसमें सहयोगी की होनी चाहिए, न कि नियंत्रक की।
उन्होंने कहा कि राजीव गांधी के समय पंचायती राज व्यवस्था के माध्यम से इस दिशा में प्रयास किए गए थे, लेकिन यह प्रक्रिया अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ सकी। उनके अनुसार, भारत की वास्तविक लोकतांत्रिक मजबूती सत्ता के विकेंद्रीकरण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी में निहित है।
12.सरकार और सुशासन: आम आदमी को वास्तव में क्या मिला?
इसके बाद संचालक प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने डॉ. अभय कुमार से सवाल किया कि सरकार लगातार जन-केंद्रित शासन, सुशासन और अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की बात करती है। प्रशासनिक तंत्र को भी जनकल्याणकारी नीतियां बनाने के निर्देश दिए जाते हैं। इसके बावजूद आम आदमी के जीवन में अपेक्षित संतोष और खुशहाली क्यों नहीं दिखाई देती?
डॉ. अभय कुमार ने अपने जवाब में राजनीति विज्ञान की एक महत्वपूर्ण अवधारणा का उल्लेख किया—सरकार (Government) और शासन (Governance) के बीच अंतर। उन्होंने कहा कि इस अंतर को समझने से वर्तमान आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविकता स्पष्ट हो सकती है।
उन्होंने बताया कि 1990 से पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजी और निजी क्षेत्र पर सरकार का एक हद तक नियामक नियंत्रण था। वे उस दौर को पूरी तरह समाजवादी व्यवस्था नहीं मानते, लेकिन राज्य की ओर से बाजार को नियंत्रित करने और सार्वजनिक हितों की रक्षा करने के कुछ प्रयास अवश्य होते थे।
1990 के बाद आर्थिक उदारीकरण के साथ बाजार को अधिक स्वतंत्रता देने की मांग बढ़ी। उस दौर में पूर्ववर्ती आर्थिक नीतियों को लाइसेंस-कोटा राज, नौकरशाही और कम आर्थिक विकास से जोड़कर उनकी आलोचना की गई।
डॉ. अभय कुमार ने कहा कि सुशासन के नाम पर जनभागीदारी, प्रशासनिक दक्षता, तकनीकी नवाचार, ई-गवर्नेंस और नागरिकों के सशक्तीकरण की बातें की गईं। लेकिन उनके अनुसार, इस मॉडल का वास्तविक परिणाम बाजार और निजी क्षेत्र की शक्ति में वृद्धि के रूप में सामने आया।
उन्होंने सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का उदाहरण देते हुए कहा कि समय के साथ इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका घटती गई और निजी क्षेत्र का प्रभाव बढ़ता गया। उन्होंने हवाई अड्डों के निजीकरण, सार्वजनिक सेवाओं में निजी भागीदारी और संवैधानिक संस्थाओं में आरक्षण से जुड़े सवालों का उल्लेख किया।
उनके अनुसार, सुशासन और दक्षता की भाषा का इस्तेमाल कई बार कल्याणकारी योजनाओं और गरीबों के अधिकारों को सीमित करने के लिए भी किया जाता है। मनरेगा के बजट में कटौती, छात्रवृत्तियों में कमी, पर्यावरणीय नियमों को कमजोर करने और सार्वजनिक संसाधनों को निजी हाथों में सौंपने जैसी प्रवृत्तियों पर उन्होंने चिंता जताई।
डॉ. अभय कुमार ने कहा कि हमें 1980 के दशक में लौटने की जरूरत नहीं है, बल्कि अतीत के अनुभवों से सीखकर वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप नई जन-केंद्रित नीतियां विकसित करनी चाहिए। ऐसी नीतियों में गरीबों, दलितों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों, पूर्वोत्तर राज्यों और कश्मीर के लोगों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विकास के केंद्र में केवल आर्थिक दक्षता नहीं, बल्कि नागरिक, सामाजिक न्याय और पर्यावरण भी होने चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियों की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध के माध्यम से ही बदलाव संभव है।
12.नवउदारवाद, कॉरपोरेट प्रभाव और कल्याणकारी राज्य-
इसके बाद प्रोफेसर सुखदेव सिंह ने श्री एस. एन. साहू से सवाल किया कि क्या सरकारी नीतियों के निर्माण में ही कुछ ऐसी अंतर्निहित कमियां होती हैं, जिनके कारण कागजों पर जनकल्याणकारी दिखाई देने वाली योजनाएं जमीन पर आम आदमी तक अपना लाभ नहीं पहुंचा पातीं?
श्री साहू ने जवाब में कहा कि 1990 से पहले भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां, एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार आयोग (MRTP) तथा अन्य नियामक व्यवस्थाएं निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट घरानों की शक्ति पर कुछ हद तक नियंत्रण रखती थीं।
उदारीकरण के बाद इन नियामक व्यवस्थाओं का प्रभाव कम हुआ और राज्य ने धीरे-धीरे कई क्षेत्रों से अपनी भूमिका सीमित कर ली। शिक्षा, स्वास्थ्य, दूरसंचार और खनन जैसे क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ी।
श्री साहू ने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रोफेसर प्रभात पटनायक के विश्लेषण का उल्लेख करते हुए कहा कि मिश्रित अर्थव्यवस्था में सरकार की नीतियां कॉरपोरेट क्षेत्र की शक्ति पर नियंत्रण रखने का काम करती थीं। लेकिन निजी क्षेत्र के नेतृत्व में विकास की प्रक्रिया तेज होने के बाद बड़े कारोबारी घरानों का आर्थिक प्रभाव बढ़ता चला गया।
उन्होंने कहा कि जब कॉरपोरेट क्षेत्र आर्थिक रूप से अधिक शक्तिशाली होता है, तो उसका प्रभाव मीडिया, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीति जैसे क्षेत्रों पर भी बढ़ने लगता है। इस प्रकार आर्थिक शक्ति का राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं पर प्रभाव स्थापित होने लगता है।
उन्होंने इस संदर्भ में राज्य की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य की शक्ति का इस्तेमाल नागरिकों के कल्याण के बजाय कॉरपोरेट हितों को आगे बढ़ाने के लिए नहीं होना चाहिए।
12. ‘केयरिंग इकोनॉमी’ (caring economy ) और अधिकार आधारित विकास-
श्री साहू ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा व्यक्त ‘केयरिंग इकोनॉमी’ यानी संवेदनशील और देखभाल करने वाली अर्थव्यवस्था की अवधारणा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसी अर्थव्यवस्था का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों की आवश्यकताओं और अधिकारों का ध्यान रखना होना चाहिए।
उन्होंने वन अधिकार अधिनियम और ग्रामसभा की भूमिका का उदाहरण दिया। विशेष रूप से ओडिशा के नियमगिरि क्षेत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां ग्रामसभाओं ने खनन परियोजना के लिए अपनी सहमति देने से इनकार किया था। यह स्थानीय समुदायों के अधिकारों और लोकतांत्रिक भागीदारी का महत्वपूर्ण उदाहरण था।
लेकिन उन्होंने चिंता जताई कि आज ग्रामसभाओं के निर्णयों को प्रभावित करने और आदिवासी क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है।
उन्होंने मनरेगा का उदाहरण देते हुए कहा कि इस योजना ने ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार और न्यूनतम मजदूरी के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अधिकार दिया। इससे ग्रामीण श्रमिकों की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ी। लेकिन कॉरपोरेट क्षेत्र के कुछ हिस्सों ने इसे सस्ते श्रम की उपलब्धता के लिए चुनौती के रूप में देखा।
श्री साहू ने यह भी कहा कि अधिकार आधारित कानूनों और योजनाओं के कारण ग्रामीण समाज में एक नई सामाजिक-आर्थिक चेतना पैदा हुई थी। सूचना का अधिकार, काम का अधिकार और भोजन का अधिकार इसी व्यापक अधिकार आधारित दृष्टिकोण का हिस्सा थे।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में इन अधिकारों और कल्याणकारी व्यवस्थाओं को कमजोर किए जाने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण, खनन परियोजनाओं और सुरक्षा अभियानों के नाम पर स्थानीय समुदायों के विस्थापन और दमन की घटनाएं भी गंभीर चिंता का विषय हैं।
उनके अनुसार, विकास की प्रक्रिया में यदि आम आदमी, आदिवासी समाज और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा नहीं होती, तो ‘केयरिंग इकोनॉमी’ की अवधारणा का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह जाता।
डॉ. के. आर. नारायणन: संवेदनशील नेतृत्व का उदाहरण
अपने वक्तव्य के अंतिम हिस्से में श्री एस. एन. साहू ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. के. आर. नारायणन के साथ अपने कार्यकाल का एक महत्वपूर्ण अनुभव साझा किया।
उन्होंने ओडिशा के काशीपुर क्षेत्र में बॉक्साइट और एल्युमिनियम खनन परियोजनाओं के विरोध के दौरान हुई पुलिस फायरिंग का उल्लेख किया, जिसमें 13 लोगों की जान चली गई थी।
श्री साहू ने बताया कि जनवरी 2002 के आसपास स्वामी अग्निवेश और कुछ अन्य लोग इस घटना से संबंधित दस्तावेज लेकर राष्ट्रपति डॉ. नारायणन से मिलने राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे। उस समय डॉ. नारायणन ने उन्हें बुलाकर इन दस्तावेजों का अध्ययन करने और मामले को समझने को कहा।
श्री साहू के अनुसार, डॉ. नारायणन ने इस घटना को गंभीरता से लिया और गणतंत्र दिवस के अपने संबोधन में आदिवासियों के अधिकारों से जुड़ी बात को शामिल करने का निर्णय किया। उन्होंने कहा कि देश की प्रगति के नाम पर निर्दोष आदिवासियों के अधिकारों को कुचला नहीं जाना चाहिए।
उन्होंने इस प्रसंग में डॉ. आंबेडकर के विचारों का भी उल्लेख किया कि आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए वहां के लोगों के साथ संवाद करना, उन्हें समझाना, उनका पुनर्वास करना और किसी भी परिस्थिति में उनका शोषण नहीं करना आवश्यक है।
श्री साहू ने कहा कि यह एक संवेदनशील और जिम्मेदार नेतृत्व का उदाहरण था। किसी भी लोकतांत्रिक देश में नेतृत्व का मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वह समाज के सबसे कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों के प्रति कितना संवेदनशील है।
पूरी चर्चा में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आर्थिक विकास का उद्देश्य केवल उत्पादन, निवेश और बाजार का विस्तार नहीं होना चाहिए। विकास का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और लोकतंत्र में नागरिकों की भागीदारी तथा उनके संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहें।
इस पैनल चर्चा का केंद्रीय संदेश यही रहा कि भारत की अर्थव्यवस्था और विकास नीति का केंद्र बाजार या कॉरपोरेट हित नहीं, बल्कि आम नागरिक, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और पर्यावरण होना चाहिए।
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