फासिज्म यानी अन्य का दिमाग़ निगलने का सिस्टम

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— प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी —

भारत प्रथा और रिवाजों का देश इन दिनों नए सिरे से प्रथा और रिवाज बनाए जा रहे हैं और उन रिवाजों में लोगों ढाला जा रहा है।नया रिवाज है एक बुद्धिजीवी ने दूसरे लेखक को देशद्रोही कह दिया। एक प्रोफेसर ने दूसरे प्रोफेसर को शिक्षक दिवस पर देशद्रोही कह दिया। एक हिन्दू ने दूसरे हिन्दू को देशद्रोही कह दिया। भारतीय समाज के ये दैनंदिन चित्र हैं।ये ऐसे चित्र हैं,इनसे सोशल मीडिया भरा पड़ा है।इन रिवाजों से जुड़ी भाषायी बर्बरता सोशल मीडिया में छायी है।समाज में छायी है।इस तरह की वाचिक बर्बरता भारत में पहले कभी नहीं देखी गयी।यह फासिज्म की ‘वाचिक बर्बर संहिता’ है,इसके ज़रिए सभी संहिताओं को अपदस्थ किया जा रहा है। फासिस्ट चिन्तन का यह रूप है जिसकी भारत ने कभी कल्पना नहीं की थी।

भारत ने यह कभी नहीं सोचा नहीं था कि एक प्रोफेसर ,दूसरे प्रोफेसर को देशद्रोही कहेगा,या एक हिन्दू ,दूसरे हिन्दू को देशद्रोही कहेगा।अरूंधती राय जैसे विदुषी लेखिका को देशद्रोही कहना ,नया रिवाज है। यह अपमान वही कर सकते हैं जो विचारों में स्त्री का अपमान करते हों।विदुषी औरतों का अपमान करके सम्मान पाने की कला नई फासिस्ट कला है। सवाल यह है इस दशा तक हम पहुँचे कैसे ? अरूंधती राय विदुषी हैं, लेखिका हैं और उनका सम्मान करना हमें सीखना चाहिए।जो लोग अरूंधती राय जैसी विदुषी का सम्मान नहीं कर सकते,वे अपने समाज में स्त्रियों का कभी सम्मान नहीं कर सकते।

अरूंधती राय कैसी है,उसके विचार क्या हैं ? क्या खाती है ?क्या पहनती हैं?क्या पीती हैं और कब सोती हैं? वह कश्मीर पर क्या सोचती है,पाकिस्तान पर क्या सोचती है ? उससे हमारे विचार मिलते या नहीं मिलते ? ये सारे प्रश्न अर्थहीन हैं।विषय विशेष पर अरूंधती की आलोचना की जा सकती है लेकिन वह देशद्रोही नहीं है।वह भारत की नागरिक है और नागरिक देशद्रोही नहीं होता।

लेखक की स्थिति देश से बड़ी होती है। लेखक कभी राष्ट्र के नाम पर सत्ता पर बैठे लोगों का पिछलग्गू नहीं होता।उसकी नज़र में जनता और सिर्फ जनता पर केन्द्रित होती है। उसकी नज़र जनांदोलन और जनसंघर्षों पर केन्द्रित होती है।वह सिर्फ अपने ही देश की जनता के बारे में नहीं सोचता अन्य देशों की जनता के बारे में भी सोचता है।लेखक बुनियादी तौर किसी का दास नहीं होता।अरूधंती तक़रीबन इस मिट्टी की बनी है।हरेक के लिए वैसा बनना संभव नहीं है।

फासिस्टों का कोई सगा नहीं होता, वह करीबी रिश्तों को शत्रुता में बदल देता है। मित्रों में पंगे करा देता है।बाप को बेटा का शत्रु बना देता।पति-पत्नी के संबंध ख़राब कर देता है।पुरानी पुख्ता मित्रताओं को ध्वस्त कर देता है।एक-दूसरे के बीच में अविश्वास और अनास्था की मज़बूत दीवार खड़ी कर देता।फासिस्ट विचारों में पक्के होते हैं।वे मर जाएं पर विचार नहीं बदलते।भारत ने देश विभाजन ,साम्प्रदायिकता, पृथकतावाद, आतंकवाद आदि को देखा और लड़ भी लिया।लेकिन फासिज्म और फासिस्ट जनता का भारत को कोई अनुभव नहीं था।पहली बार ‘फासिस्ट जनता’ और ‘फासिस्ट बुद्धिजीवी’ का व्यापक रूप हमारे सामने आया है यह बहुत बड़ी चुनौती है।

सन् 2014 से भारत में ‘फासिस्ट जनता’ और ‘फासिस्ट बुद्धिजीवी’ के निर्माण का सघन प्रयास आरंभ हुआ जो इन दिनों चरम पर है।इस प्रयास ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। जनता,शिक्षित समाज,बुद्धिजीवी,नौकरशाह ,राजनीतिक कार्यकर्ता आदि की एकदम नई फासिस्ट जमात तैयार कर दी है। इस तरह की कट्टरपंथी जमात गांधी -नेहरू भी नहीं बना पाए थे।एकच्छत्र चालीस साल से अधिक शासन करने के बावजूद कांग्रेस भी यह काम नहीं कर पाई।बंगाल में 34 साल शासन करने के बाद भी वाममोर्चा भी इस तरह की फासिस्ट जनता और फासिस्ट बुद्धिजीवी नहीं बना पाए। धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक जनता और बुद्धिजीवी वर्ग को फासिस्ट बनाना बहुत बड़ी त्रासदी है।यह हमारे लोकतंत्र की असफलता भी है ।

इन दिनों ‘मोदी महान और हम महान’ ‘ मोदी का ज्ञान महान और मेरी बुद्धि महान’ इन दो मुहावरों के तहत सभी की दिमागी संरचनाएं बना दी गयी हैं। सबके दिमाग़ में यह बात बिठा दी गयी है कि आप जो सोच रहे हैं,सही सोच रहे हैं,मोदी जो सोच रहे हैं सही सोच रहे हैं,मोदी राष्ट्र का विकास कर रहे हैं और आप लोग भी राष्ट्र का विकास कर रहे हैं।मोदी की दृष्टि समावेशी है ,आपकी भी दृष्टि समावेशी है।मोदी भी स्वदेश प्रेमी हैं,आप भी स्वदेश प्रेमी हैं।मोदी का मानना है जो मेरा विरोध करता है वह देशद्रोही है।उनके अनुयायायियों का भी मानना है कि वह देशद्रोही है।इसने सभी रंगत के विमर्शों को समाज और सोशल मीडिया से बेदखल कर दिया है।

मजेदार बात है फासिस्ट बुद्धिजीवी कभी केन्द्र सरकार की नीतियों का मूल्यांकन नहीं करते,सोशल मीडिया में कभी मोदी की नीतियों पर नहीं लिखते,मीडिया में नहीं लिखते।मोदी सरकार की नीतियों के जनता पर प्रभाव का मूल्यांकन नहीं करते। सरकार की नीतियों के मूल्यांकन और उन पर सार्वजनिक बहस से भागना इनकी आदत है। वे सिर्फ बार बार यही लिखते हैं मोदी महान हैं, महान काम कर रहे हैं।वे यह नहीं बताते कि जनता की विगत ग्यारह सालों में क्या दुर्गत बनी है। मोदी के आलोचकों को देशद्रोही बताकर इस तरह के बुद्धिजीवी यश,पद, सरकारी यात्रा सुख, सेमीनार सुख पा रहे हैं। इनका व्यापक सांगठनिक समूह है जो देश में सैंकडों तथाकथित सांस्कृतिक एनजीओ की शाखाओं के जरिए काम कर रहा है। इस वैचारिक नैटवर्क में वे सब शामिल हैं जो अदल-बदल-सुविधावाद-संरक्षण-पदोन्नति -सेमीनार, मंच आदि के आकांक्षी हैं।

मोदी और उनके पक्षधर फासिस्ट बुद्धिजीवियों का जनतंत्र, समावेशीकरण और देश की एकता की रक्षा के लक्ष्य से कोई संबंध नहीं है। लोकतंत्र,समावेशीकरण,सामंजस्य, सद्भाव, भारत,सेना, जनता, किसान,मजदूर,युवा वर्ग ये सारे पदबंध सिर्फ भाषायी रूप हैं इनके अर्थ और जीवन से मोदी और फासिस्ट बुद्धिजीवियों का कोई संबंध नहीं है।असल में सत्ता के बहुआयामी संस्कृति,शिक्षा,लोकतंत्र विरोधी कामों को छिपाने के लिए इन पदबंधों का मोदी और उनके अनुयायी इस्तेमाल रहे हैं।

मुझे कोई पंडित कहे या देशद्रोही,कॅामरेड कहे या मार्क्सवादी इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता।अपनी दशा पर कोई शिकायत या आलोचना नहीं करनी।मैं इस बात से ख़ुश हूँ कि जब पढ़ता था तब भी विचार स्वतंत्रता का दीवाना था और बुद्धि व्यवस्थापकों के ख़िलाफ़ अपने कर्म में मजा लेता था। मेरा एक ही सपना था और उसी सपने में जीता हूँ कि मैं विचारों की स्वतंत्रता का पक्षधर हूँ। एक व्यक्ति को अपनी स्वतंत्रता को किसी के मातहत नहीं बनाना चाहिए। सरकारें आएंगी और जाएंगी।लेकिन स्वतंत्रता रहेगी।

विचार स्वतंत्रता आज के दौर पर सबसे महत्वपूर्ण तत्व है।हमारे बीच में ऐसे तमाम लेखक-बुद्धिजीवी हैं जो बुद्धि व्यवस्थापकों के सहारे जी रहे हैं और उनके निर्देश पर ही सोचते और लिखते हैं।एक शिक्षक कभी भी विचार स्वातंत्र्य छोड़ नहीं सकता।मेरे घर में अधिकतर किताबें शिक्षकों और बुद्धिजीवियों की ही हैं। ये किताबें आंखों के सामने तैरती रहती हैं और चुनौती देती रहती हैं कि आओ विचारों की स्वतंत्रता का आनंद लो और उसका विकास करो।

विचार स्वतंत्रता के बिना कोई मनुष्य जिंदा नहीं रह सकता।मनुष्यत्व को पाने के लिए विचार-स्वातंत्र्य का नशा बेहद जरूरी है।हमारे यहां दो तरह के लोग हैं एक वे हैं जो विचार रखते हैं, दूसरे वे हैं जो विचार स्वातंत्र्य रखते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध उन लोगों ने किया जो विचार-स्वातंत्र्य के पक्षधर थे।विचार स्वातंत्र्य का एक जीवन मूल्य की तरह आचरण में इस्तेमाल किया।अगर सभी विचारशील लोग ‘विचार से विचार’ की यात्रा करते तो हमारे पास ज्ञान का अक्षय भंडार न होता। ‘विचार से विचार’ यात्रा रूढिबद्ध बनाती है।जो कह दिया गया उसके अनुकरण पर ज़ोर देती है।बुद्धिजीवी अपने तरीके से वैचारिक रूढिबद्धता को तोड़ता है।वैचारिक रीतिवाद को चुनौती देता है।इस नज़रिए से देखें तो फासिस्ट बुद्धिजीवी बाँझ होता है।वह रीतिवाद को चुनौती नहीं गेता।

आप यहां से सोचिए-भरत ने नाट्यशास्त्र की रचना की,ऐसे जमाने में रचना की जिस समय आज से सैंकड़ों गुना ज्यादा सामाजिक पिछड़ापन था।इस एक कृति ने भारतीय साहित्य और संस्कृति को व्यापक रूप में प्रभावित किया, दुनिया के तमाम देशों में ज्ञान विमर्श ,रस विमर्श, नाट्य विमर्श में यह कृति व्यापक अध्ययन के केन्द्र में है। इस कृति ने जो जनप्रियता हासिल की है वह बेमिसाल है।कोई सरकार इस रचना की प्रमोटर नहीं रही है। नाट्यशास्त्र का लेखक किसी राजा के यहाँ दरबारी नहीं था।वे स्वतंत्र विचार रखते थे और इच्छित प्रिफॅारमेंश पर बल दिया था। भारतीय संदर्भ का उल्लेख में जानबूझकर कर रहा हूँ जिससे विचारों की आचरणगत स्वतंत्रता और सैद्धान्तिक स्वतंत्रता का अपने मित्रों को एहसास करा सकूँ।साथ ही बता सकूँ कि हिन्दुत्व और मोदी की आड़ में जो चल रहा है उसका भारतीय ज्ञान परंपरा से कोई संबंध नहीं है।

वैचारिक स्वतंत्रता का बुनियादी आधार है जनता से प्रेम और असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता।इन दिनों उलटा हो रहा है हमारे देश के बुद्धिजीवियों में एक बड़ा तबका विचारों के अनुकरण करने और बुद्धि व्यवस्थापकों औक मोदी के अनुसार काम करने,लिखने,पढ़ने सोचने आदि में व्यस्त है।

मैं आलोचना पढ़ता लिखता रहा हूँ। विधा के नाते मुझे आलोचना सबसे अधिक प्रिय है।वे तमाम आलोचक मेरे प्रिय हैं जो किसी न किसी रूप में असहमति के रूप में नए विचारों का सृजन करते रहे हैं।सोचिए,संस्कृत की विशाल समृद्ध वैचारिक आलोचना परंपरा क्यों नष्ट हो गयी ? यह परंपरा इसलिए नष्ट हो गयी क्योंकि वह एक समय के बाद नए विचारों को जन्म नहीं दे पाई । एक लेखक,बुद्धिजीवी , आलोचक का काम सिर्फ विचारों का पुनर्रूत्पादन करना नहीं है।बल्कि उसका यह भी है कि वह नया सोचे, प्रचलित विचारों की बाढ़ में बह न जाय।इन दिनों बुद्धि व्यवस्थापकों और मोदी ने जनता की बुद्धि का सटीक प्रबंधन कर रखा है। इसलिए हमारे विचारों की खिड़की एक ही दिशा की ओर खुलती है। हम नए से डरने लगे हैं,नए को अर्जित करना नही चाहते।सत्ता से अलग हटकर सोचना नहीं चाहते,सत्ता के ग़लत कामों का विरोध करने से डरने लगे हैं।

हिंदी समाज और उसके बुद्धिजीवियों के बड़े अंश में नई प्रगतिशील विचारधाराओं के प्रति अछूत भाव है।असहमति और विचार स्वतंत्रता से नफ़रत है ।ये वे लोग है जो मोदी के नशे में डूबे हैं। हम सब जोड़ तोड़ करना सीख गए हैं।आज लोकतंत्र में सफल वही है जो इस कला में निष्णात है। जिनकी किताबें आप पढ़ते हैं या जिनके नाम जानते हैं वे जोड़तोड़ की कला में निष्णात नहीं थे। वेदव्यास, बाल्मीकि, चार्वाक, से लेकर तमाम दार्शनिक,वामन,आनंदवर्द्धन, अभिनवगुप्त तक के महान आलोचक और भक्ति आंदोलन के कवियों में जोड़तोड़ की कला के दर्शन नहीं होंगे।ये सभी मध्यकालीन लेखक आज भी हमारे सिरमौर बने हुए हैं।
‘मोदी काल’ जोड़तोड़ की कला के आधार पर संपत्ति, यश,जनप्रियता का मचान खड़ा करने के लिए जाना जाएगा। इस दौर में जोड़-तोड़ ही सत्य है,सत्ताभक्त इसमें व्यस्त हैं।जोड़-तोड़ को ही हमने सत्य मान लिया है।अधिकतर लोगों ने स्वतंत्रता और नागरिक के अधिकारों के बारे में सम्मान और अधिकार के साथ सोचना बंद कर दिया है, हम अब लाभार्थी हो गए हैं,उसी तरह सोचने और आचरण करने लगे हैं।

इन दिनों छोटे छोटे सुखों के लिए बुद्धिजीवी वर्ग जोड़-तोड़ करने में व्यस्त हैं और विचारों की स्वतंत्रता और नागरिक के सम्मान का गला अपने ही हाथों घोंट रहे हैं।मोदी सरकार को किसी आपातकाल की ज़रूरत नहीं है। थोड़ी जोड़-तोड़ ही स्वतंत्रता की हवा निकालने के लिए काफी है।सत्ता संरक्षण,संपदा और यश प्राप्ति के लिए जब आप लिखने लगते हैं तो विचार स्वातंत्र्य का दामन छोड़ देते हैं। तटस्थता के मिथ में रहकर वैचारिक स्वंत्रतता बनाए रखना असंभव है।अब तो जोड़-तोड़ ही महान है।
एक नए संकट में हम लोग रह रहे हैं। यह उपग्रह संप्रेषण का संकट। अंतर्राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली ने हमारी स्वतंत्रता छीन ली है पर हम बेफिक्र हैं।उपग्रह संप्रेषण ने अंतर्राष्ट्रीय -राष्ट्रीय-स्थानीय स्तर पर हमारे संवाद करने के अधिकार को छीन लिया है।सतह पर उपग्रह संप्रेषण साधारण नागरिक को कहीं से कहीं तक संप्रेषण देने की वायदा करता है।लेकिन हकीकत में क्या भारत के साधारण नागरिक के पास यह अधिकार है ?साधारण आदमी के पास न साधन हैं और न सुविधाएं हैं।इसके बावजूद हम ग्लोबल कम्युनिकेशन के विभ्रम में जी रहे हैं।साधारण सा आंदोलन उठता है सरकार तुरंत नेटवर्क बंद कर देती है।जम्मू कश्मीर और मणिपुर में तो महीनों नेटवर्क बंद रहता है।इसलिए उपग्रह कम्युनिकेशन को गंभीरता से समझने की ज़रूरत है,वह हमारी आवाज़ बंद कर देता है।

जोड़ -तोड़ की संस्कृति का सुंदर विवेचन प्रोफेसर हर्बर्ट शिलर ने किया है।शिलर ने जो कहा है उसे उद्धृत करना समीचीन होगा।शिलर ने लिखा , ‘ जोड़ -तोड़ पूरी तरह कारगर हो इसके लिए जरूरी है कि उसकी उपस्थिति के साक्ष्य ग़ायब हों ।जोड़-तोड़ तब सफल होता है जब जोड़-तोड़ के शिकार को विश्वास होता है कि चीजें जिस तरह हैं वही उसका स्वाभाविक ढंग है और वे अपरिहार्य रूप से वैसे ही होती हैं । संक्षेप में, जोड़ तोड़ के लिए झूठे यथार्थ अर्थात् उसके अस्तित्व के निरंतर इनकार की ज़रूरत रहती है।’

‘ इसलिए यह अनिवार्य है कि वे लोग ,जिन्हें जोड़-तोड़ कर बहलाया-फुसलाया जाता है, अपनी महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाओं की निष्पक्षता या तटस्थता में विश्वास करें।यह आवश्यक है कि उन्हें यह विश्वास हो कि सरकार,मीडिया ,शिक्षा और विज्ञान परस्पर संघर्षरत ,परस्पर निरोधी सामाजिक हितों के झगड़े से परे हैं।सरकार, विशेषकर राष्ट्रीय सरकार तटस्थता के मिथक की केन्द्र बनी रहती है।’

एक अन्य चीज़ है वह भारतीय विचारों को अपरिवर्तनीय मानने का सिद्धांत।इस तरह का प्रचार जमकर हो रहा है।भारत के प्राचीन-मध्यकाल में जो विचार थे वे आज भी प्रासंगिक हैं अपरिवर्तनीय हैं।हकीकत यह है कि भारत जैसे विशाल देश में एक या कुछ विचारों के अपरिवर्तनीय रूपों के आधार पर कोई भी विमर्श संभव नहीं है। इसके लिए जरूरी है विचारों में परिवर्तन के सिद्धांत को लागू किया जाय। परिवर्तन के सिद्धांत को माने बिना नए विचारों का जन्म संभव नहीं है।नए विचारों के प्रति नफ़रत का भाव है उसका प्रधान कारण है ‘हमारे विचार अपरिवर्तनीय हैं’, इस सिद्धांत में गहरा विश्वास।

इन दिनों मनुष्य में ‘आक्रामकता’ बढ़ी है। ‘अपरिवर्तनीयता’ और ‘अतीत प्रेम’ के बहाने मनुष्य को बर्बरता और अविवेकवाद की ओर ठेला जा रहा है। सत्ता और उसके संस्थानों के द्वारा बर्बरता और जोड़ तोड़ के अनुकरण पर ज़ोर दिया जा रहा है।इनके लिए न मानव स्वभाव बदला है ,न भारत बदला है,न दुनिया बदली है।अब हमारे सामने भारत को भी इतना जटिल और हिंसक बनाकर पेश किया जा रहा है कि भारत को उनके विचारों की रोशनी में देखने से परेशानी होती है।

जोड़ -तोड़ की कला में माहिर लोग समाज और इतिहास दोनों की अनदेखी करते हैं।वे लोकतांत्रिक भारत की संस्थाओं की संवैधानिक संरचनाओं में आए परिवर्तनों को देखना ही नहीं चाहते,क्योंकि इससे उनकी जोड़-तोड़ के प्रभावित होने की संभावना है।वे यह देखना ही नहीं चाहते कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों को ताकत देने वाली ताकतें कौन सी हैं।वे कुशलता के साथ इन सबसे जुड़े सवालों और समस्याओं से अलग रहते हैं।

जोड़-तोड़ की कला में माहिर बुद्धिजीवी ‘सामाजिक अन्तर्विरोधों’ को छिपाते हैं। ‘सामाजिक अन्तर्विरोधों’ को अस्वीकार करते हैं।यह सब काम वे ‘सामाजिक समरसता’ के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए करते हैं।कृत्रिम और गढ़ी हुई इमेजों और विचारों में रहते हैं। इस तरह के लोग ही ‘सामाजिक विचार नियंत्रक’ बने हुए हैं।

इस अंधकार से निकलने का एकमात्र तरीका है सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों पर ईमानदारी से संवाद किया जाय इससे सामाजिक असमानता के ख़िलाफ़ संघर्ष और सघन रूप लेगा।साथ ही प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयासों को चुनौती मिलेगी।
मिथकों का जो जाल विगत पचास साल में खड़ा किया गया है उसे चुनौती मिलेगी। मिथकों का माया संसार बहुत शक्तिशाली है इसके दायरे तोड़ने और इसके विभिन्न पहलुओं के उद्घाटन की ज़रूरत है।मिथ अब पूजा की चीज़ नहीं है बल्कि आज वे सूचना प्रोडक्ट में तब्दील हो चुके हैं।मिथ का सूचना बनना उसे और अधिक ताक़तवर बनाता है।लेकिन हकीकत यह है आम लोगों को जोड़तोड़ की कला के ज़रिए मिथकों का शिकार बनाया जा रहा है।

सामाजिक -राजनीतिक-आर्थिक -मीडिया गठजोड़ ने मिथकों ने वर्चस्व स्थापित कर लिया है।आम लोग नहीं जानते कि मिथक किस तरह जोड़तोड़ की प्रक्रिया में शामिल कर लिए गए हैं। इस मिथक और मीडिया नियंत्रित संसार से मुक्ति का सपना पैदा करना।


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