
सो साल बाद भी किसी नेता की याद में अगर कोई यादगार आयोजन होता है ,(बशर्ते परिवार वालों द्वारा आयोजित न हो) वह अपने आप में ही मिसाल होती है, उनकी बड़ी शख्सियत की। हिंदुस्तानी सोशलिस्ट तहरीक की पहली कतार के नेता आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, युसूफ मेहर अली, डॉ राममनोहर लोहिया, कमला देवी चट्टोपाध्याय वगैरा के बाद की दूसरी पीढ़ी जिसमें मधु लिमए, राजनारायण, कर्पूरी ठाकुर, रामसेवक यादव, मामा बालेश्वर दयाल वगैरा के साथ-साथ रवि राय जी का नाम भी शामिल हैं।
1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के 23 सदस्य लोकसभा में चुनकर आए थे, रवि राय जी उड़ीसा से चुने गए थे। कनॉट प्लेस का दिल्ली का टेंट वाला काफी हाउस जो अब नहीं रहा, वह दिल्ली के राजनीतिक कार्यकर्ताओं का शाम के वक्त मिलने का अड्डा था। सोशलिस्टों का मजमा एक टेबल पर जुटा था, सर्दियों के दिन थे सिर, गले,कान पर देहाती अंदाज में अच्छी तरह से मफलर लपेटे इंसान के बारे में पता चला कि यह रवि राय है जो लोकसभा में संसोपा ग्रुप के नेता भी हैं। उनके नेता चुने जाने की अहमियत इस बात में भी थी कि वह डॉ राम मनोहर लोहिया, एसएम जोशी, मधु लिमए, रामसेवक यादव, मनीराम बागड़ी , जॉर्ज फर्नांडीज जैसे नेताओं के नेता बने थे। कॉफी हाउस की उस दिन की मुलाकात के बाद मृत्यु पर्यन्त मेरा रवि राय जी से निकट का ताल्लुक बना रहा। रवि राय जी की तामीर एक खांटी सोशलिस्ट कार्यकर्ता के रूप में हुई थी। अभी वे राबेनशा कॉलेज कटक के छात्र थे कि 1945 में समाजवादी संघ की स्थापना में वे शामिल थे। 1940 में जब जयप्रकाश जी जेल से रिहा होकर आए तो कटक में जयप्रकाश जी की एक विशाल सभा का आयोजन था।
उस सभा की कामयाबी तथा जयप्रकाश जी को थैली सौंपनें के लिए नौजवान रवि राय कटक की गलियों में ढोल मंजीरे बजाते, चंदा मांगते कटक शहर के घर-घर जाते थे तथा उड़िया में गीत गाते थे, ‘विद्यार्थियों जागो’ ‘जनता जागो’ ‘हंस के जागो’ ‘जयप्रकाश की दुंदुभी हमारे कानों में गूंज रही है’। राबेनशा कॉलेज के छात्रों ने अंग्रेजी जैक झंडे को उतार कर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया इसी एवज में उनको पहली जेल हुई। वहां से शुरू हुई इस संघर्ष यात्रा पर जीवन भर रवि राय जी चलते रहे। सोशलिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित किसानों, मजदूरों, कामगारों छात्रों नागरिक अधिकारों के लिए वक्त वक्त पर होने वाले संघर्षों में रवि राय जी हमेशा पहली कतार में शामिल रहे। 1949 में वे समाजवादी पार्टी के सदस्य बन गए।1953 ,-54 मे अखिल भारतीय समाजवादी युवक सभा के सह सचिव भी बने। 1956 में उड़ीसा में उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 1960 और 61 में वे समाजवादी पार्टी के महासचिव भी बने।
संसद सदस्य, केंद्रीय मंत्री, लोकसभा अध्यक्ष के रूप में मैंने उनको बहुत नजदीक से देखा। अक्सर मैंने नेताओं के जीवन में पद प्रतिष्ठा मिलने पर एकदम उलट प्रभाव पढ़ते देखा है, परंतु रवि राय जी जीवन पर्यंत एक सच्चे सोशलिस्ट ही बने रहे। सादगी, शराफत, ईमानदारी के साथ-साथ एक समता मूलक सोच और व्यवहार उनके जीवन में हमेशा देखने को मिलता था। उनका सरकारी घर समाजवादी कार्यकर्ताओं का आश्रय स्थल बना रहता था शरद यादव सांसद सदस्य नहीं रहे तो दिल्ली में रवि राय जी के घर में ही उनको पनाह मिली। उनके निजी जीवन की पवित्रता का आलम यह था उनकी पत्नी डॉक्टर सरस्वती स्वाई जो एक मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल थी जब दिल्ली आयी उस समय रवि राय जी केंद्रीय मंत्री थे, सरकारी गाड़ी उन्हें स्टेशन से लेने के लिए गई परंतु उन्होंने कहा कि मैं तो निजी कार्य से आयी हूं, सरकारी गाड़ी में न जाकर टैक्सी से गई। 1977 में जनता पार्टी बनने पर घटकों के आधार पर संगठन की रचना की गई थी। सोशलिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में मधु लिमए, जनसंघ के नानाजी देशमुख, लोक दल के रवि राय, पुरानी कांग्रेस के रवींद्र वर्मा महासचिव बने।
रवि राय जी और मधु लिमए की एकता और समझदारी के कारण बड़े स्तर पर देश पर के सोशलिस्ट कार्यकर्ताओं को विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा तथा अन्य पदों पर जाने का मौका मिला। रवि राय जी अक्सर मधु लिमए के घर पर आकर समाजवादी आंदोलन की समीक्षा करने के साथ-साथ कैसे इस विचारधारा का प्रचार प्रसार हो इस पर चर्चा करते थे। उनकी चर्चा में रवि राय जी के विशद ज्ञान की झलक मिलती थी। रवि राय जी की समाजवादी वैचारिक आस्था कभी धूमिल नहीं हुई, इसलिए उन्होंने अपने घर पर ,’लोक शक्ति अभियान’ संगठन की मार्फत नियमित वैचारिक शिक्षण का संचालन प्रोफेसर आनंद कुमार की मार्फत किया। उनके जीवन में एक पल भी ऐसा नहीं आया जब वे समाजवादी आंदोलन से एक पल के लिए भी हटे हो। हालांकि एक आक्षेय उन पर लगता है की राजनारायण जी ने उनको अपना एकमात्र प्रतिनिधि बना रखा था, परंतु जब चौधरी चरण सिंह और राजनारायण जी का अलगाव हुआ तो रवि राय जी मंत्री बन गए। दिल्ली से वापस उड़ीसा जाने पर उन्होंने लोहिया अकादमी का निर्माण किया। वहां पर एक बड़े पुस्तकालय की स्थापना की तथा नवयुवकों को समाजवादी विचारधारा में दीक्षित करने के लिए वह जीवन के अंत तक लग रहे।
















