नरेन्द्र ऐसा बदला!

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Swami Vivekananda

रमहंस रामकृष्ण ने मां से प्रार्थना की थी कि > मां,मैने जो पाया है, उसमें संदेह करने वाले किसी व्यक्ति को मेरे पास भेज दे! और नरेन्द्र ऐसा ही था। नरेंद्र हिन्दू देवी-देवताओं को अस्वीकार करता था।अद्वैतवाद का विरोधी था और भावप्रवण भक्ति से घृणा करता था और धर्मशास्त्रों का खुलेआम मजाक उडाता था।हठी और नास्तिक था।उद्दंड और छिछोरे मित्रों के दल के साथ रामकृष्ण के पास पंहुचा।परमहंस के आग्रह से संगीत सुनाया।संगीत समाप्त होने पर रामकृष्ण खडे हो गये,आनन्दविभोर हो कर रोने लगे।नरेन्द्र का हाथ पकड लिया।

सुबकियां लेने लगे।यह मेरे आन्तरिक अनुभवों को ग्रहण करने के योग्य है।

परमहंस रामकृष्ण किसी मनोवैज्ञानिक- मुहूर्त की प्रतीक्षा में थे!एक दिन एक क्षण में अर्धचेतन अवस्था में थे कि नरेन्द्र आ पंहुचा ,नरेन्द्र का स्पर्श किया और नरेन्द्र के मन में आध्यात्मिक-तूफान उठा।उसे तो ईश्वर की अनुभूति और केवल ईश्वर ही ईश्वर की अनुभूति होने लगी ! लगने लगा कि > ईश्वर के अतिरिक्त किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है।नरेन्द्र ऐसा बदला कि संसार आज उसे विवेकानन्द के नाम से जानता है!

जैसे दंडी स्वामी विरजानन्द को छोड़ कर स्वामी दयानन्द को समझना कठिन होगा, ठीक वैसे ही परमहंस रामकृष्ण को छोड़ कर विवेकानन्द को,विवेकानन्द के साहित्य को नहीं समझा जा सकेगा !

उनका कंठ बड़ा मधुर था और उनके स्वर ने ही
परमहंस को आकर्षित किया था ।

महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने स्वामीजी के संबंध में अपने एक निबंध में लिखा था कि >
पवहारी-बाबा की कन्दरा में उनकी नजर जैसे ही परमहंस के चित्र पर पड़ी , वे चित्र के नीचे बैठ कर विह्वल हो कर गाने लगे >>
छेले खेला करि तव सने
कभु क्रोध करि तव परे
जेते चाइ दूर पलाइये
शियरे दांडाइ तुमि रेते
निर्वाक आनन
छल-छल आंखी
चाह मम मुख पाने ।
प्रभु तुमि
प्राणसखा तुमि मोर ।
कभू देखी
आमि तुमि
तुमि आमि ।
तुम्हारे साथ बाल-सुलभ क्रीडा करता रहा ।
मैंने कभी तुम पर क्रोध भी किया किन्तु तुम छलछलाई आंखों से मुझे देखते रहे ।
तुम प्रभु हो मेरे प्राणसखा हो ।
मैं देखता हूं > तुम मैं हो और मैं तुम हूं ।

स्वामी विवेकानन्द ने श्रीमती सरला घोषाल को पत्र लिखा था >>>>>>

कि मैंने दस बरसों तक भारत के विभिन्न स्थानों पर घूम-घूम कर देखा है कि समाजसुधारक -संस्थाओं की बाढ़ सी आयी है किन्तु जिनका रक्त-शोषण करके हमारे भद्र लोगों ने ये खिताब प्राप्त किया है या कर रहे हैं ,उन बेचारों के लिये क्या किया गया ? भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण तो यही है न कि संपूर्ण विद्या-बुद्धि ,राज-शासन तो मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में है । मुसलमान कितने सिपाही लाये थे ? यहां अग्रेज कितने हैं ?

लेकिन चांदी के छह सिक्कों के लिये भाई का गला काटने-वाले लाखों आदमी सिवा भारत के और कहां मिल सकते हैं ?
छह करोड़ मुसलमान और बीस लाख ईसाई कैसे बन गये ?
स्वामीविवेकानन्द ने इतनी कम उम्र पायी थी
किन्तु उन्होंने अपने युग को इतना प्रभावित किया !
केवल भारत को ही नहीं , संसार को ।
लोकमान्य तिलक से लेकर के गांधी और नेहरू तक !
साहित्य में देखें तो प्रेमचन्द ,निराला ,मैथिलीशरण गुप्त ,जयशंकरप्रसाद ,महादेवी वर्मा , रामधारीसिंह दिनकर ,अज्ञेय ।
सुमित्रानन्दनपन्त ने तो उनकी अंग्रेजी में लिखी गयी कविताओं का
’हिन्दी में रूपान्तरण किया था ।
वे अत्यन्त कठिनाइयों को सहते हुए देश-विदेश में घूमे थे और
लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष देखा था ,पढा था ,समझा था ।
स्वामीविवेकानन्द ने लिखा था >>
शूद्र-जाति के असाधारण -बुद्धि और योग्यता वाले लोगों को उच्च वर्ग वाले अपने वर्ग में उठा लेते हैं और
शूद्र- समाज उनकी बुद्धि और गुणों से वंचित हो जाता है ।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा कि
” तुम ब्राह्मण को
निर्मूल कर सकते हो
परन्तु ध्यान रखना कि जो लोग ऐसा करेंगे ,
वे लोग स्वयं ही उनके स्थान पर कब्जा कर लेंगे तथा
उनसे भी अधिक अनाचार-अत्याचार करेंगे ।”
{संदर्भ :विवेकानन्द साहित्य-संचयन पृष्ठ १५९}
“एक दिन स्वामी विवेकानन्द बोले >>
>>>>>>>हमारे देश को आवश्यकता है लौह-बाहुओं की ,फौलादी-स्नायुओं की ,दुर्दमनीय प्रचंड इच्छाशक्ति की ,जो सृष्टि के अन्त:स्थित भेदों और रहस्यों में प्रवेश कर सके और जो अपने उद्देश्य की पूर्ति प्रत्येक अवस्था में करने को तैयार हो ,चाहे उसके लिये समुद्र के अन्तस्तल में जाना पड़े या प्रत्यक्ष मृत्यु का सामना करना पड़े ! हमें मनुष्य को निर्भीक बनाने वाली शिक्षा चाहिये । हमारा अन्तिम ध्येय मनुष्यता का विकास करना है ।
मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रवाह संयमित होकर आविष्कार के रूप में सफल हो !”

स्वामी विवेकानन्द का अनुभव था कि “भारत की आशा का केन्द्र केवल जनता है
उच्चवर्ग मानसिक और नैतिक-धरातल पर मृतवत हो गये हैं ।”
लास एंजिलिस ,केलिफोर्नियां में बोलते हुए [१९००ई, ]स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -”
तरंग उठती हैं और विलीन भी होती हैं ।
फिर एक प्रबल तरंग उठती है ,मुहूर्त-मात्र में उसका पतन हो जाता है ।
इसी प्रकार तरंग पर तरंग सागर के वक्ष पर अग्रसर होती रहती है ।
विश्व के घटना-प्रवाह में भी इसी प्रकार का उत्थान और पतन होता रहता है ,हालांकि हमारा ध्यान उत्थान की ओर ही जाता है ।”
हमें पतन का विस्मरण हो जाता है ।
यही विश्वप्रवाह की रीति है ।”

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था -“यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आ सके तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास क्यॊ न जाय ?यदि गरीब लड़का शिक्षा के मन्दिर तक न आ सके तो शिक्षा को ही उसके पास चला जाना चाहिये !”


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