एक बार की बात है, बापू गहरी साधना (ध्यान) में लीन थे। तभी अचानक एक साँप उनकी गोद में चढ़ गया। पास ही बैठी एक लड़की, जिसका ध्यान पूरी तरह नहीं लगा था, उसने यह देख लिया। उसने घबराकर शोर मचाने के बजाय धीरे से बापू के कान में कहा— “बापू, आपकी जाँघों पर साँप चढ़ आया है।”
सामान्यतः ऐसी स्थिति में कोई भी इंसान झटपटाकर खड़ा हो जाता या डर के मारे काँपने लगता। लेकिन बापू? उनके भीतर भय का लेश मात्र भी नहीं था। उन्होंने आँखें खोलकर साँप को देखा, पर शरीर में कोई हलचल नहीं की।
परिणाम? साँप उन्हें सूँघकर शांति से उतर गया। मानो उसे भी एहसास हो गया हो कि इस इंसान के भीतर ‘अहिंसा’ और ‘प्रेम’ इतना गहरा समावेश है कि यहाँ जहर का कोई स्थान ही नहीं है।
दरअसल विपरीत परिस्थितियों में हम असामान्य व्यवहार करने लगते हैं। अक्सर हम डर में अपना आपा खो देते हैं, लेकिन महात्मा गांधी के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है निर्भयता का सतत अभ्यास। यह प्रसंग हमें स्थितप्रज्ञ आत्मबल का असली अर्थ सिखाता है।
संदर्भ -लोकदेव नेहरू
रामधारी सिंह दिनकर
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