भारतीय इतिहास के पन्नों में 13 जनवरी 1948 की तारीख केवल एक कैलेंडर का दिन नहीं, बल्कि एक नैतिक क्रांति की शुरुआत थी। दिल्ली के बिड़ला हाउस में 78 वर्षीय महात्मा गांधी ने जब अपने जीवन का अंतिम आमरण अनशन शुरू किया, तो पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। यह उपवास केवल एक राजनीतिक कदम नहीं था, बल्कि नफरत की आग में जलते हुए भारत की अंतरात्मा को जगाने का अंतिम प्रयास था।
अनशन के पीछे का उद्देश्य
उस समय बिड़ला हाउस में संवाददाताओं का भारी जमावड़ा था। हर कोई जानना चाहता था कि गांधी ने अचानक यह कदम क्यों उठाया। कुछ लोग इसे पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये के बकाये भुगतान से जोड़ रहे थे, तो कुछ इसे मुस्लिम तुष्टीकरण मान रहे थे। किंतु 78 वर्षीय राष्ट्रपिता के लिए ये संख्याएँ और आरोप बहुत छोटे थे। वे जानते थे कि विभाजन के बाद देश में जो हिंसा का तांडव मच रहा है, उसे रोकना केवल व्यवस्था के बस की बात नहीं है; इसके लिए जन-मानस का हृदय परिवर्तन आवश्यक है।
गांधीजी ने स्पष्ट कहा था, “मेरा उपवास राजनीतिक नहीं, बल्कि अंतरात्मा का आदेश है।” उनके लिए उपवास आत्मशुद्धि का एक जरिया था, जहाँ वे घने अंधेरे में अपनी अंतरात्मा की रोशनी से अगला कदम ढूंढते थे।
13 जनवरी को उन्होंने आमरण अनशन शुरू किया। नेहरू, ‘द स्टेट्समैन’ के पूर्व संपादक आर्थर मूर और कई अन्य लोग महात्मा गांधी के साथ अनशन पर बैठ गए, जिसमें हिंदुओं और सिखों की एक बड़ी तदाद थी और उनमें से कई तो पाकिस्तान से आये शरणार्थी भी थे। 12 जनवरी को महात्मा गांधी की प्रार्थना सभा में गांधीजी का एक लिखित भाषण पढ़कर सुनाया गया-
“कोई भी इंसान जो पवित्र है, अपनी जान से ज्यादा कीमती चीज कुर्बान नहीं कर सकता। मैं आशा करता हूं कि मुझमें उपवास करने लायक पवित्रता हो। उपवास कल सुबह (मंगलवार) पहले खाने के बाद शुरू होगा। उपवास का अरसा अनिश्चित है। नमक या खट्टे नींबू के साथ या इन चीजों के बगैर पानी पीने की छूट मैं रखूंगा। तब मेरा उपवास छूटेगा जब मुझे यकीन हो जाएगा कि सब कौमों के दिल मिल गए हैं और वह बाहर के दबाव के कारण नहीं, बल्कि अपना धर्म समझने के कारण ऐसा कर रहे हैं।”
भय मुक्त राष्ट्र का संदेश
13 से 18 जनवरी तक चले इस अनशन ने वैश्विक स्तर पर हलचल पैदा कर दी। गांधीजी का संदेश स्पष्ट था: “आत्मविश्वास से भरा व्यक्ति या देश कभी डरता नहीं है, और जो डरता नहीं, वह कभी नफरत नहीं पालता।” उन्होंने समझाया कि डर कमजोरी और नैतिक आत्मबल की कमी से उपजता है। बापू का यह उपवास देश को अराजकता की अग्नि में भस्म होने से बचाने का एक कवच बन गया।
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी गांधीजी के इस अडिग संकल्प का सम्मान किया। उन्होंने जनता से कहा कि बापू को उपवास तोड़ने के लिए मनाना तभी संभव है जब अवाम अपने कर्तव्य को पहचाने और नफरत का त्याग करे।
दिल्ली का हृदय परिवर्तन
गांधी के संकल्प का प्रभाव जादुई रहा। दिल्ली की सड़कों पर कत्लेआम और लूटपाट थमने लगी। करोल बाग से लेकर रेलवे और प्रेस संगठनों के श्रमिकों तक, हर समुदाय ने शांति का संकल्प लिया। 18 जनवरी 1948 को सभी समुदायों के प्रतिनिधियों ने एक सात-सूत्रीय घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। बापू ने तब प्रसन्न होकर कहा, “अब तक हमारा मुख शैतान की ओर था, अब हमने ईश्वर की ओर मोड़ लिया है।”
गांधी की अधूरी परिकल्पना
गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत एक प्रसंग सुनाते है कि गांधी अपनी हत्या से एक दो रोज पहले एक और कठिन कार्य करने की सोच रहे थे। वे नही चाहते थे कि भारत के पड़ोस में एक स्थायी शत्रु हमेशा के लिए बन जाये। इसलिए वे उन हिन्दू व सिक्खों को जो पाकिस्तान से मारकर भगा दिए थे उन्हें वापस पाकिस्तान लेकर जाएंगे और पाकिस्तान से उन मुसलमानों को वापस लेकर आएंगे जो यहां से मारकर भगा दिए थे। इसलिए उन्होंने शुशीला नैयर को जिन्ना के पास भेजा कि वे बिना पासपोर्ट और वीसा के उन हिन्दू और सिक्खों के साथ पाकिस्तान आना चाहते हैं। अगर जिन्ना को लगता है कि यह गलत और गैरकानूनी है तो वे उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल सकते हैं । जब शुशीला नैयर जिन्ना के पास पहुंचती हैं तो जिन्ना कहते हैं कि आप गिरफ्तारी की बात करती हो गांधी पाकिस्तान में जहां चाहें वहां जा सकते हैं। पर मेरी यह गुजारिश है कि यहां गांधीजी की सुरक्षा का जिम्मा पाकिस्तान की पुलिस करेगी क्योंकि पाकिस्तान में यदि गांधीजी को कुछ हो गया तो पाकिस्तान का नक्शे से नाम मिट जाएगा। दुर्भाग्य से गांधी ऐसा नहीं कर सके और एक छोटा सा पाकिस्तान हमारे लिए हमेशा के लिए एक समस्या बन गया।
आज के संदर्भ में अंतिम उपवास की व्याख्या
गांधी जैसा उपवास करना हर किसी के सामर्थ्य की बात नहीं है। इसके लिए पूरी जिंदगी जनता के सुख-दुख में समर्पित करनी पड़ती है। आज के समय में जब भी कोई नेतृत्व संकट आता है, दुनिया गांधी के आदर्शों की कसौटी पर ही खुद को परखती है। गांधीजी ने 1948 में जो कहा उसकी अनुगूंज कुछ इस तरह आज भी सुनाई देती है-
मेरा उपवास किसी भी अर्थ में राजनीतिक कदम नहीं माना जाना चाहिए। यह अंतरात्मा और कर्तव्य के अनिवार्य आह्वान का पालन है। भारत में रहने वाले हम सब भाई हैं; जनता ने मेरे आदर्शों में विश्वास नहीं खोया है और मैं कब्र में भी जीवित रहूंगा और वहीं से बोलूंगा।

















