धर्म पर कुछ विचार : चौथी किस्त

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— राममनोहर लोहिया —

भी-कभी ब्रह्मज्ञान कठोर भी बन जाता है। बजाय संगीत की मधुरता लाने के वह दूसरे संप्रदायों और धर्मों के प्रति अत्याचार करने लग जाता है। वह अच्छा नहीं होता कि दूसरे खराब हैं, ये अच्छे नहीं हैं, हम ही सबसे अच्छे हैं। आप अपने मन में समझो कि आप सबसे अच्छे हैं, लेकिन उसे जबान से कभी नहीं कहना चाहिए और अपने कर्म और व्यवहार से, अपने उदाहरण से बतलाना चाहिए कि आप सबसे अच्छे हो। जहाँ जबान पर कोई धर्म की बात ले आता है कि वह सबसे अच्छा है, तब फिर वह धर्म खराब होने लग जाता है। मैं थोड़ा बहुत हिंदू-धर्म को समझ पाया हूँ, उसमें यही एक विशेषता है। बाकी और धर्म वाले तो आसानी से अपने मुँह में ले आया करते हैं कि वे सबसे अच्छे हैं। सही हिंदू ज्यादा से ज्यादा कभी अपने पुरखों के बड़प्पन को बताएगा तो वह यह कह देगा कि बड़प्पन को उस ऊँचाई तक हमलोग पहुँचे जिससे ऊँचे और कोई नहीं पहुँच सके, मतलब दूसरों को भी मौका दो कि शायद वे लोग पहुँचे हों।

इसी के साथ-साथ एक सवाल आपके मन में उठता होगा, या उठना चाहिए कि क्या बात है कि और देशों में जहाँ समझो इस्लाम या ईसाई धर्म है या बुद्ध धर्म, जो कि एक मानी में हिंदू धर्म का ही एक रूप है, वहाँ तबदीली हो जाती है, जल्दी-जल्दी राज या समाज बदलते हैं। लेकिन अपने देश में बदलाव नहीं होता, यह एक बड़ा जबरदस्त सवाल है। इधर न जाने कितनी जगह पर तख्ते पलटे, बर्मा में तख्ता पलटा, चीन में तख्ता पलटा और कई बार पलटा, अफगानिस्तान वगैरह में तो आए दिन पलटते ही रहते हैं, पाकिस्तान में पलटा, टर्की में पलटा, लेकिन हमारा देश जहाँ का तहाँ चल रहा है। यह अच्छा या बुरा है, इस सवाल को भी अपने दिमाग में रखना। अगर अच्छा है तो किस हद तक, बुरा है तो किस हद तक। लेकिन, इस एक चीज पर जरूर दृष्टि रखना कि कुछ कर्मकाण्ड और कुछ ब्रह्मज्ञान इस ढंग का रहा है कि जिसके परिणाम-स्वरूप आज भी, हजारों बरस के बाद भी, अपना देश जल्दी परिवर्तन नहीं कर पाता। कुछ तो इस पर बड़ा घमंड करते हैं। एक गाने में भी यही घमंड है कि यूनान, मिस्र, रोम जहाँ से मिट गये, बाकी बचा है हमारा हिंदुस्तान। और वह घमंड किसने किया थाइकबाल ने।

कभी किसी जमाने में गाँधी जी जैसे आदमी भी, अपने बुढ़ापे में नहीं, अपनी जवानी में घमंड कर गये थे। नादान लोग उसको कई दफे अपनी किताबों में उद्धृत कर दिया करते हैं और बाद के, गाँधी जी ने भी एक दफे कहा है, शायद 1906 के आसपास या 1908 में कि हिंदुस्तान में कोई खूबी है कि हम लोग स्थिर रहते हैं, जमे हुए रहते हैं, जल्दी किसी चीज को अपना नहीं लेते। और दूसरे लोग किसी भी हवा के तेज झोंके के साथ बह जाया करते हैं। पहली बात तो यह है कि बहुत घमंड करने की जरूरत नहीं। मिस्र कहाँ मिट गया, चीन कहाँ मिट गया, यूनान कहाँ मिट गया? आप कहोगे कि मिट जाने की बात नहीं, लेकिन बदलने की बात। आज का जो यूनान है, वह 2500 बरस पहले का तो यूनान नहीं है, बहुत बदल गया। किसी हद तक वह बात सही है। जो कि चीन में भी है, मिस्र में भी है।

यह मैं मानता हूँ कि हिंदुस्तान में मन का और शरीर का भी जितना कम बदलाव पिछले तीन-चार हजार वर्ष में हुआ है उतना कम बदलाव दुनिया के और किसी देश में नहीं हुआ होगा। इस हद तक यह बात सही है। बदलाव सभी जगह थोड़ा बहुत होता रहता है, और हिंदुस्तान बाकी है, तो किस तरह बाकी है? डिनोसोरस की तरह जो बहुत बड़े-बड़े प्राणी थे। ऐसे प्राणी पाँच करोड़ बरस पहले हो चुके हैं, करीब पचास-साठ फीट लम्बे प्राणी थे। प्रकृति ने शायद यही खेल उस वक्त खेलना ठीक समझा कि इतने बड़े बिचारे बन गये कि अपने ही बोझ से खुद मर गये। इतने लम्बे, इतने चौड़े, इतने बोझिल कि उनसे आसानी से चलते ही नहीं बना। फिर छोटे प्राणी, हल्के प्राणी आए और उन्होंने उनको खतम कर दिया। संसार में ऐसा हुआ है। हमलोग भी इसी तरह से खतम हुए हैं। खैर, प्रकृति ने तरह-तरह के उपाय इस्तेमल किये जिनमें बड़े ताकतवर, लम्बे-चौड़े प्राणी खतम हो गये, लेकिन कीड़े-मकोड़े, चींटी, छोटे-छोटे कीड़े सब बाकी हैं।

क्या उस पर घमंड करना चाहिए? क्या ज्यादा पसंद करोगे?प्रकृति से जूझते हुए और कभी-कभी ममता करते हुए चाहे हम खतम हो जाएँ, लेकिन एक आन और शान और अड़ पर तो डटे रहें। या यह पसंद करोगे, जैसा नानक ने कहा– और यह मत समझना कि वह केवल सिक्खों का ही धर्म है, वह असल में हिंदू धर्म के एक अंग का सार है।

क्या आँधी और हवा आएगी तो पेड़ गिर जाएँगे, बड़े-बड़े पहाड़ खतम हो जाएँगे, लेकिन नन्हीं दूब तो बच जाएगी क्योंकि वह झुक जाएगी। इस पर कई लोग बड़ा अभिमान करते हैं। देखो, न जाने कितनी हवा के कितने झोंके आते हैं, हम हिंदू लोग सिर झुका कर बच जाया करते हैं।

क्या दूब, चींटी, कीड़े-मकोड़े, यही जिंदगी अच्छी हुआ करती है? ऐसे बचने से आखिर फायदा क्या? खतम हो जाना ही ज्यादा अच्छा है। उसमें भी एक मर्यादा बाँधनी चाहिए। यह मैं मानता हूँ कि अति दोनों तरह की खराब हुआ करती है। अगर किसी व्यक्ति या राष्ट्र में अड़ने की इतनी अति हो जाए कि वह हठ का रूप ले ले तो वह खराब होता है, लेकिन झुकने की इतनी अति हो जाए कि वह हमेशा आत्मसमर्पण का रूप ले ले, वह भी व्यक्ति और राष्ट्र के लिए जहर बन जाया करता है। दोनों की मर्यादा होना चाहिए कि उसके पार तो हम नहीं जाएँगे, सिर नहीं झुकाएँगे, चाहे कट जाएँ, पर नन्हीं दूब नहीं बनेंगे। वह मर्यादा अपने देश में इधर कई सौ बरसों, शायद हजार, पन्द्रह सौ बरस से नहीं है। हजार-डेढ़ हजार बरस से हिंदू खाली नन्हीं दूब की तरह झुकना जानता है, दबना जानता है, मर्यादा खीचना नहीं जानता। किस हद तक उसी ब्रह्मज्ञान और कर्मकाण्ड का नतीजा निकलता है। जब लोग कह दिया करते हैं कि हम बचे हुए हैं, और सब तो मिट गये तो जरा इस पर भी ध्यान देना कि किस रूप में बचे हुए हैं। यह बुरा है। ऐसा बचने से कोई फायदा नहीं।

(जारी)

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