जनतंत्र में कोई शासक या पार्टी जब यह समझे कि जब तक वह शासन में है तब तक उजाला रहेगा, वह गया तो फिर अंधेरा छा जाएगा ।।इस तरह के मनोवृत्ति के लोग देश को रसातल में ले जाऐगा”।। उक्त कथन बाबू भूपेंद्र नारायण मंडल राज्य सभा में तब के काग्रेसी शासन के लिए कहा जो वर्तमान दौर की राजनीति में अक्षरसः प्रासंगिक है।
भूपेंद्र नारायण मंडल को हम किस रूप में अपने बीच पाते हैं?
विचार, आदर्श व नेतृत्व
● एक स्वराजी ,स्वतंत्र भारत के स्वयंसेवक जिसने गांघी जी के आह्वान पर सन 1942 के अगस्त क्रांति में भाग लिया एवं 13 अगस्त 1942 को मधेपुरा की सरजमीन पर अंग्रेजी आक्रांता के खिलाफ प्रण लिए स्वराजी युवाओं को नेतृत्व कर्ता ।।क्रांति कि ज्वाला मधेपुरा पुरानी कचहरी में ताला बंदी व राष्ट्रीय झंडा तिरंगा फहराना।।
● समाजवाद के संत जिन्होंने समाजवादी सिद्धांत को अपने राजनैतिक आवरण व आचरण में पिरोया।
● डॉक्टर राममनोहर लोहिया,आचार्य नरेन्द्रदेव के हमराही…
● एक व्यक्ति एक पद के हठ धर्मी
● एक जन नेता जो जनप्रतिनिधि के सम्मान में,रूकने के प्रबंध हेतु पटना सर्किट हाउस के सामने धरना व अपना गिरप्तारी देता है।एक हठ योगी जिसने जमानत नहीं करवाया एवं आजाद भारत के जेल की कोठड़ियों में तब तक रहा जब तक शासन ने सर्किट हाउस का दरवाजा जनप्रतिनिधियों के लिए नहीं खोला।।
● सामाजिक न्याय के अग्रिम योद्धा जिसने शोषित वंचित उपेक्षित सर्वहारा पिछड़े वर्ग के शासन, सेवा में प्रतिनिधित्व हेतु आरक्षण का सरजमीन तैयार किया व अपने समाजवादी साथी डॉ लोहिया, राजनारायण, मधुलिमिये, कर्पूरी ठाकुर ,किशन पटनायक आदि के साथ सड़क से सदन तक संघर्ष किया।
● ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय मधेपुरा के संस्थापक सचिव
● किसान मजदूर नौजवान के मुद्दों जैसे फसल के दाम,मजदूरी,रोजगार के सवाल पर स्पष्ट रूप से शासन की जिम्मेदारी तय करवाने वाले नायक थे बाबू भूपेंद्र नारायण मंडल। ।
आज के भारतीय राजनैतिक पटल पर जब फिजुलखर्ची,स्वार्थसिद्धी,कुर्सी से चिपके रहने की लालसा, पुजींवादी तंत्र हमारी भारतीय लोकतंत्र पर हावी हो रही है तो भारतीय दर्शण के बुद्ध , नानक , कबीर , पेरियार , लोहिया की जीवनशैली,कर्म,फक्कड़पन को जमीन पर उतारने वाले महान समाजवादी नेता ,संत मनीषी भूपेन्द्र नारायण मंडल को याद करना आव्शयक है।।
वह मनखुश बाबु (बचपन का नाम) बाबु भूपेन्द्र “1 Feb 1904 – 29 May 1974” जो अपनी माता दोनावती पिता जय नारायण मंडल, गाँव माधव नगर उर्फ रानीपट्टी,जनपद मधेपुरा,जिला मुख्यालय से 22 km दुर संपन्न जमींदार परिवार में स्नेह,सुकुन से पल बढ़ रहा था।

प्रारंभिक शिक्षा सिरिज इंस्टीट्युशन मधेपुरा(अब के SNPM उच्च विधालय),मुंगेर के जिला हाईस्कुल,इन्टरमिडियेट – स्नातक तब के TNJ कॉलेज भागलपुर अब के TNB college Bhagalpur,वकालत की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से प्राप्त की ।
अपने युवा अवस्था,विद्यार्थी जीवन के दौरान भारत की स्वाधीनता संग्राम की लड़ाई अपनी चरमोत्कर्ष दौर में थी।भला वह मन जो वंचित, शोषित, उपेक्षित भारतीय समाज को देख कर व्याकुल हो रहा था।अंग्रजी हुकूमत, पुलिसिया जुर्म,औपनिवेशिक तंत्र की कायरता कार्य को देखकर उबल रहा था।वह भला पीछे कैसे रहता।गाँधी ,लोहिया के आह्वान पर वह Quit India Movement- भारत छोड़ो आंदोलन शन 1942 में कूद पड़ा।
13 अगस्त 1942 को मधेपुरा के पुरानी कचहरी पर स्वराजी महताब लाल मंडल मौजमा, कमलेश्वरी बाबू मनहरा सुखासन,स्वराजी शिवनंदन प्रसाद मंडल रानीपट्टी समेत सौतार आदिवासी समुदाय , ग्रामीण, आमजन, किसान मजदूर संग मिलकर तत्कालीन अंग्रजी SDM राजकिशोर प्रसाद सिंह के सामने अपने तमाम छात्र ,युवा,क्रन्तिकारी साथी के साथ , यूनियन जैक का झंडा उतार कर हिंदुस्तान का राष्ट्रीय झंडा तिरंगा फहरा दिया।
एक ही कसम खाये थे “मर जायेगें – मर जायेगें देश के नाम पर…”
अपने आरंभिक दौर में 1930 में वे त्रिवेणी संघ से जुड़े उसके बाद पेरियार ई. रामास्वामी की नेतृत्व वाली जस्टिस पार्टी से जुड़े।फिर समाज में व्यप्त असृपृश्यता,छुआ-छुत,गैरबराबरी ,रूढ़िवादी परंपरा से लोगों को निकलने में,लोगों को प्रेरित करते रहे।जमीन के संपर्क में कहीं चटाई पर बैठ कर के….
कांग्रेस प्रगतिशील गुट के नेताओं ने एक सोशिलिस्ट ग्रुप का गठन किया ,जिसमें जेपी ,अचुत्यपटवर्धन, युसफमेहरअली,नरेन्द्रदेव ,लोहिया आदि थे।यह गुट कांग्रेस पार्टी से 1948 में अलग हो गया।1954 में जेपी के सक्रिय सियासत से संन्यास लेने और पहले आम चुनाव के वर्षों बाद जब दो धड़ो- प्रजा सोशिलिस्ट पार्टी और सोशिलिस्ट पार्टी में बंटी,तो लोहिया के नेतृत्व वाली सोशिलिस्ट पार्टी में मधु लिमये ,मामा बालेश्वरदयाल ,बद्री विशाल पित्ती ,पी.वी.राजू,जॉर्जफर्णाडिस, इंदुमतिकेलकर,रामसेवक यादव, राजनारायण, मृणालगोड़ो, सरस्वती अम्बले, मनीराम बागड़ी व भूपेंद्र नारायण मंडल जैसे नेता थे।
आजादी के पश्चात पहले आम चुनाव में 1952 में मधेपुरा विधानसभा से अपने संबंध में भाई लगने वाले तत्कालीन कांग्रेसी बी.पी. मंडल (जो बाद में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष भी बने) उनसे चुनाव महज 666 मत के अंतर से हार गये। फिर दूसरी आम चुनाव 1957 में वे बिहार के एक मात्र सोशिलिस्ट विधायक चुन कर के विधानसभा पहुँचे।1962 के आम चुनाव में वे प्रख्यात कांग्रेसी नेता ललित नारायण मिश्र को सहर्षा संसदीय लोकसभा क्षेत्र से शिक्शत दी।इन्हीं कारण उन्हें भारतीय राजनीति का “ज्वॉइंट किलर ऑफ इंडियन पाॅल्टिक्स” का संज्ञा दिया गया।
पर वह चुनाव रद्द कर दिया गया।1964 के उपचुनाव में भी उन्होंने जीत हासिल की,तत्काल उन्हें विजयी सर्टिफिकेट हासिल नही हुआ था।उनके समर्थक अपने – अपने गांव,कस्बे ,घर लोट चुके थे।दिल्ली दरवार के एक इशारे पर तत्कालिन जिलापदाधिकारी रिकॉउंटिंग में गड़बरी कर के परिणाम को पलट दिया गया।
लोहिया जी भूपेन्द्र बाबु के लिए कई बार कैपेन कर चुके थे।राजनारायण तो क्षेत्र में ही डेरा डाले हुए थे,उन्हें जब पता चली तो चिरपरिचित अंदाज में डीएम पर बरस परे ,और कहा “मन तो ऐसा होता है कि आपको खींच के सीधे…”
दैनिक जीवन की परख
“जिंदगी के जीवेअ् खातिर कौनअ् न् कौनअ् नशा होबे के चाही”…
अच्छा काम के नशा… किताब परहैअ् के नशा…
पान व जर्दा के शोकीन थे…
रानीपट्टी के सियाराम मंडल , राघवैन्द्र मंडल से उनका व्यक्तिगत संबंध बहुत अच्छा था। गांव जब भी आते तो अपने पैतृक निवास स्थान ठाकुड़बाड़ी टोला से , उनका कमलपुर टोला स्थित सियाराम मंडल जी के यहां उनका जाना होता था।बीच रास्ते में चौधरी मोहल्ला पड़ता है,उन दिनों रास्ता कच्ची हुआ करती थी।वे बीच रास्ते कच्ची सड़क पर “थाल कादो युक्त” होते हुए सियाराम मंडल जी से भेंट-मुलाकात कुशल-क्षेम, आगामी योजना पर विचार करते।
रास्ते में गांव में निवास करने वाले कोई व्यक्ति उन्हें टोक देता
“वकील साहब अपने इ थाल-कादो वाला रास्ता के बजायअ् , इ डैरा दैनअ् सुखलका रास्ता दाय कै चलअ्”…।
तब वकील साहब भूपेंद्र बाबू बहुत शालीनता से अपने लोगों से कहते
“ऐं हो सब गौरअ् जैतेअ् इ कादो वाला रास्ता दायअ् कैअ्।हम जाअ्ब सुखलका दायअ् कैअ्, इ तै वाजिब बात नै भैलैअ्”।…
यहां भी हमें हैं भूपेंद्र बाबू की समाजवादी दर्शन सिद्धांत देखने को मिलता है ,वे आम और खास में कभी अंतर नहीं करते।वे समान अवसर ,समान रास्ते ,समान प्रतिनिधित्व की वकालत किया करते थे।
जात नीति
भूपेंद्र बाबू भारतीय समाज की बनावट ,समस्या जैसे भुखमरी,गरीबी, बेगाड़ी, बंधुआ व्यवस्था का गहन अवलोकन अध्ययन किया। उन्होंने इन सब कारणों का जड़ “जाति आधारित भेदभाव” की संक्रामक सोच को पाया , जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक समाज में दीमक की तरह घुन लगा रही थी।
देश में आजादी के बाद जल ,जंगल ,जमीन ,नियम ,कायदे-कानून, सत्ता संचालन की गतिविधि, हिस्सेदारी महज एक जाति वर्ग समूह तक सीमट रही थी। एक ही जाति के प्रधानमंत्री के साथ , एक ही जाति के चौकीदार, थानेदार, जज, चपरासी आदि!
इस जातीय वर्चस्व को खत्म करने के लिए, वास्तविकता में लोकतांत्रिक व्यवस्था, समता, अवसर की पहुंच को देश के बहुसंख्यक वर्ग किसान,मजदूर , सर्वहारा तक पहुंचाने…
डॉ. लोहिया, भूपेंद्र बाबू ,मधु लिमए, जननायक कर्पूरी ठाकुर, पुरी की पुरी समाजवादी जमात पिछड़ा वर्ग के लिए आबादी के अनुपात में 60% आरक्षण की वकालत करते।
“संशोपा (संयुक्त शोशिलिष्ट पार्टी) ने बांधी गांठ पिछड़ा पावै सौ में साठ”
तीन आना बनाम पच्चीस हजार
डॉ लोहिया उन दिनों संसद सदस्य नहीं हुआ करते थे तैयार करते हैं एक विस्तृत दस्तावेज….
दस्तावेज भारतीय समाज, आर्थिक नीति, सरकरिया नियत पर अपनी बारीकी विश्लेषण तैयार करती है।
उन दिनों नव संगठित भारतीय राष्ट्र के प्रति व्यक्ति खर्चा 3 आना प्रतिदिन था और प्रधानमंत्री का खर्चा प्रतिदिन ₹25000 । शायद आज का खर्चा ??
दस्तावेज़ को संसद के सदन में प्रस्तुत करने की जिम्मेवारी डॉक्टर लोहिया द्वारा भूपेंद्र नारायण मंडल को दी जाती है।
मंडल जी सदन में खड़े होते हैं सत्ता दल नेहरू नीत कांग्रेश सदस्यों का तीव्र विरोध का सामना करना पड़ता है…
“ऐ मंडल बैठ जाओ ऐ मंडल बैठ जाओ”।
चारो तरफ से अ कारण ही दवाब बनाया जाने लगा।
मार्शल लॉ तक लगा दिया जाता है तीन तीन दफे खींच के बाहर मंडल जी समेत तमाम सोशिलिष्ट संसद सदस्यों को किया जाता है। परंतु डॉ लोहिया के लौह सिपाही ,कोशकी लाल मंडल जी द्वारा उन दस्तावेज़ को संसद के पटल पर देश के समक्ष रखा जाता है। दस्तावेज़ भारतीय जनमानस में एक अलग विमर्श जागरण पैदा करता है।
मंडल जी द्वारा अडिग संघर्ष को देखकर नेहरू जी ने राजनीति के दोहरे मापदंड लोभ लालच पद प्रतिष्ठा का दांव चला।
नेहरू जी – मंडल जी आप मेरे तरफ आ जाईये।आप प्रधानमंत्री पद छोड़ कर जो कैबिनेट पद मांगेंगें ।वह कैबिनेट पद देगें जैसे वित्त,रक्षा,गृह ,रैल आदि।
मंडल जी – पंडित जी आप मेरी चिन्ता नहीं किजये, मैं जहां हूं मैं वहीं ठीक हुं।आप देश की चिंता किजिये।
सेवानिवृत्त शिक्षाविद् 89 वर्षीय बाबू उदयकृष्ण यादव, बाबू भूपेंद्र नारायण मंडल को याद करते हुए बताते है
“उनका विचार, समाज में लाया जाए तो समाज में जो एक बिखराव की स्थिति है वह संभव नहीं होगी” ।
एक छोटी सी कहानी उनकी है, कहीं जा रहे थे…कहीं उनको रूकना था…रूके… भोजन की व्यवस्था हुई…
उन्हें बुलाया गया और जब भोजन के नजदीक पहुंचे तो, उन्होंने पूछा कि गाड़ी मान को नहीं देखते हैं ,
कहा गया कि खाएगा पीछे…
उन्होंने कहा कि गाड़ी पर गाड़ी को चलाने के लिए अगले कतार में और खाने के चलते उन्हें पीछे कतार में जाना पड़ता, यह दुख की बात है। अंत में लाचार होकर गांव वाले ,समाज वाले ,घर वाले गाड़ी मान को भी लाए और साथ में लाकर भोजन करवाया गया। यह थी उनकी महत्ता।
जब वे वकालत छोड़ राजनीति में आए तो स्टेशन से चलने के बाद लोग कहते थे कि रिक्शा ले आते हैं।
उन्होंने लोगों से कहा रिक्शा से तो मैं तेजी से निकल जाऊंगा, लेकिन जब समाज के लोग हमसे मिलना चाहते हैं, पैदल चलना चाहते हैं,पैदल ही चलेंगे, पैदल चलने में ही अच्छा है।
एक पैजामा कुर्ता ,चप्पल उनके वस्त्र के रूप में हुआ करता था और वह सारी की सारी चीजें जो वकालत के समय में,उनका एक राजकुमार के रूप में पहचाने जाते थे , उन सब को भूल कर के भगवान बुद्ध की तरह सन्यास ले लिए, समाज हित में।
वे ताउम्र पुजींवादी, पाखंड, भ्रष्टआचरण, भेदभाव के खिलाफ रहे। उन्होंने कभी भी कर्तव्य बोध से अपने आप को अलग नहीं किया।उनकी सादगी तथा सरलता से समस्याओं के समाधान पर चिंतन उन्हें भारतीय राजनीति में लोक साधक के रुप में प्रतिस्थापित किया।
उनकी इन्हीं आदर्श आवरण व आचरण “ मंडल जी “ के द्वारा समाजवादी चरित्र चिंतन धारा को मजबूत एवं स्वच्छ राजनीति में अपनी मिशाल कायम करने हेतु , आने वाली पीढ़ी, नस्ल उन पर नाज करती है।
भूपेन्द्र बाबू!आज के जन प्रतिनिधियों से बिल्कुल भिन्न होने के कारण ही याद किये जा रहे हैं,याद किये जाते रहेंगे।
यदि हम सभी समाजवादी सोच की गहराई में जाने की पूरी कोशिश करें तो हमें मिलेगा लोहिया का एक सच्चा हीरा जिस पर नाम लिखा होगा-भूपेन्द्र नारायण मंडल।……….
वे दो बार राजसभा (1966 और 1972 )के लिए चुने गए।उन्होंने प्रजा सोसिलिस्ट पार्टी (चुनाव चिन्ह – झोपड़ी छाप) बिहार प्रान्त के संस्थापक सचिव व चीफ आर्गेनाईजर (1954-55 ),सोशिलिस्ट पार्टी चुनाव चिंन्ह बरगद छाप बिहार के अध्यक्ष (1955),सोशिलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष (1959 एवं 1972 )एवं संयुक्त सोशिलिस्ट पार्टी (संसोपा) के पार्लियामेंट्री बोर्ड के अध्यक्ष (1967) की भूमिका बखुबी निभाई।
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