लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण अभियान के पाक्षिक बैठक की रपट

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Report of the fortnightly meeting of the Democratic Nation-Building Campaign

सहचिन्तन शिविर की समीक्षा

बैठक में उपस्थित शिविर के सारे सहभागियों ने सहचिन्तन शिविर के बारे में अपनी राय रखी। सभी साथियों ने सहचिन्तन शिविर को सफल और संभावनाप्रद माना। समीक्षा में आयीं मुख्य बातें संक्षेप में इस प्रकार हैं:

–  जयपुर सहचिंतन शिविर के मुकाबले ज्यादा चुस्त-दुरुस्त संचालन रहा और ज्यादा अच्छी चर्चा रही। UAPA के विरोध में और चुनाव आयोग की भूमिका के विरोध में विशेष जोर हो।
– इस शिविर में नए चेहरे थे, नयी महिलाएं थीं।
– इन दिनों इतने मुद्दे उभर रहे हैं कि उन पर चर्चा करने के लिए ज्यादा समय मिलना चाहिए था। समय की कमी थी। और मुद्दों पर ज्यादा खुलकर बात होनी चाहिए थी। प्लानिंग पर और समय दिया जाना चाहिए था। कोंकण के युवा साथी प्रसाद को बोलने का मौका दिया गया, अच्छा लगा। किसी भी साथी ने बीच में टोका नहीं यह और अच्छा लगा। कोशिश के बाद भी दो-तीन युवा नहीं आ सके। अब महाराष्ट्र के आयोजन में युवाओं को जोड़ने की कोशिश होगी।
– जीवंत बहस हुई । आपस का रागात्मक संबंध बना। एआई की दुनिया पर बहस होनी चाहिए थी। आज दुनिया के देश जो कर रहे हैं, उनके बारे में चर्चा होनी चाहिए थी। बनती हुई दुनिया के बरक्स नई दुनिया बनाने की कितनी संभावना है, इस पर बातचीत होनी चाहिए थी। हमारी अर्थनीति की दृष्टि कैसी है, इस पर बातचीत होनी चाहिए थी। हमने समय गंवाया नहीं।
– काफी अच्छा रहा। महाराष्ट्र में अच्छी संभावना बनी है। लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को केन्द्रीय मुद्दा बनाना चाहिए। 2029 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए सारी गतिविधियां केंद्रित होनी चाहिए। छोटे-छोटे मीटिंग लेने चाहिए।
– उपयोगी रहा। कुछ द्वन्द्व जो उभरे थे, उन पर विराम लगा। नए साथियों ने जिम्मेदारी ली। बड़ी स्थानीय टीम के साथ संवाद हुआ। बहुत सारी नई जिम्मेदारियां तय की गईं।
– थकान वाला था। बड़ी लंबी दूरी तय करनी पड़ी। लेकिन महाराष्ट्र के एक नए क्षेत्र को देखने का अवसर मिला।
– शिविर अच्छा रहा। प्लानिंग अच्छी रही।
– सहचिन्तन शिविर के पुनर्गठन की जरूरत है। पहला दिन परिचय हो। एक दिन चर्चा का हो, अगला दिन विश्राम का।इस तरीके से 6-7 दिनों का कार्यक्रम हो।
– मौजूदा भाजपा सरकार के नैरेटिवों के मुकाबले विचारों की स्पष्टता होनी चाहिए थी।
– बहुत चर्चा हुई। एक टीम बनी। कुछ अच्छे निर्णय हुए। युवाओं से जुड़ाव हुआ। लेकिन युवाओं के लिए कोई प्रोग्राम नहीं बन सका।
– एक ताजगी वाले माहौल में विचार विमर्श हुआ। अच्छी चर्चा में सुन्दर जगह का बड़ा योगदान रहा। चिंतन के लिए ऐसी ही जगह होनी चाहिए। सभी को अपनी बात रखने का मौका मिला। कार्यक्रमों को विचारों और एक्शन दोनों स्तर पर कैसे डिजाइन किया जाय, इस पर और ध्यान देकर सोचने की जरूरत है। ऐसा कार्यक्रम बने जो लोग ऑन करें, अपना मान शुरू कर दें।
– उत्साहजनक रहा। फोकस कार्यक्रम बना। एक सुझाव है कि 2029 की तैयारी अभी से करें।
– तीनों सहचिंतन शिविर में सबसे ज्यादा सफल। लेकिन असली सफलता तो तब मानी जाएगी जब कार्यक्रम पर अमल होगा। सफलता का एक बड़ा कारण इस शिविर का संगठन और कार्यक्रम पर केन्द्रित रहना रहा। नेतृत्वकारी साथी अगर कमिटियों को बनाने में सामूहिक रूप से सचेत रहते और पहले से सुझाव देते तो जो कुछ कमियां रह गईं, वे नहीं होतीं।
– कार्यक्रम तो प्रांतीय स्तर पर ही हो सकते हैं। कोर कमिटी में रणधीर गौतम का नाम छूट गया है। जोड़ लेना चाहिए। कुछ और ऐसे नाम छूटे हैं तो उन्हें भी जोड़ लेना चाहिए।

युजीसी नियमों पर उभरा विवाद

इस पर रामशरण, विरेन्द्र कुमार, दीपक धोलकिया, मणि माला, योगेन्द्र, शशिशेखर सिंह, मंथन, मीनाक्षी और आनंद कुमार ने अपनी बातें रखीं। सबों की बात में यह कॉमन था कि युजीसी के नियम निर्देशों का स्वरूप उचित था। उस पर भड़का या भड़काया गया विरोध जातीय नकारात्मकता से भरा था। सुप्रीम कोर्ट का रोक अतार्किक है।

इस पर एक स्वतंत्र विस्तृत चर्चा की जरूरत बतायी गयी। सवर्ण युवाओं को भड़काने में प्रोफेसरों की भूमिका भी रही। इस विवाद में भाजपा का आन्तरिक अंतर्विरोध भी काम कर रहा है। सरकारी वकील की सुप्रीम कोर्ट में नियमों के पक्ष में स्पष्ट भूमिका न लेने से यह जाहिर है कि सरकार युजीसी नियम निर्देश पर स्टे चाहती थी।

सवर्ण युवाओं के अशिष्ट उग्र विरोध को एक सामान्य घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह बताता है कि जाति तोड़ो आंदोलन की आज खास जरूरत है। राष्ट्रनिर्माण और जातिवाद साथ साथ नहीं चल सकते।

उपस्थिति

1.मंथन 2.विभूति विक्रम 3.योगेंद्र 4.मनीषा बनर्जी 5.मणिमाला 6.अशोक विश्वराय 7.ईश्वर अहिरे 8.कारू 9.किरण 10.दीपक धोलकिया 11.गुड्डी एस एल 12.राजश्री 13.विरेंद्र कुमार 14.भाषाण माझी 15.शशिशेखर सिंह 16. सुखचंद्र झा 17.रीता धर्मरीत 18.संध्या एदलाबादकर 19.रामशरण 20.दिनेश प्रियमन 21.नूतन मालवी 22.ज्योति पासवान 23.ज्ञानेंद्र कुमार 24.गोविन्द चव्हान 25.जयंत दिवान 26.मीनाक्षी सखी 27.पी एम टोनी 28.आनंद कुमार 29.कुमार दिलीप 30.अरविंद अंजुम


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