
संस्थानों की दीवारें केवल ईंट और पत्थर से नहीं बनी होतीं; वे महत्त्वाकांक्षाओं, आशंकाओं और अनकहे प्रतिस्पर्धात्मक भावों से भी निर्मित होती हैं। जहाँ मनुष्य एक साथ काम करते हैं, वहाँ सहयोग और सहकार के साथ-साथ एक सूक्ष्म ईर्ष्या भी जन्म लेती है। यह ईर्ष्या प्रायः प्रत्यक्ष नहीं होती; वह मुस्कानों के भीतर छिपी रहती है, औपचारिक प्रशंसाओं के पीछे धीरे-धीरे साँस लेती है।
संस्थान किसी विश्वविद्यालय का हो, किसी कार्यालय का या किसी सांस्कृतिक केंद्र का—हर जगह एक अदृश्य मंच सजा रहता है। इस मंच पर प्रतिभाएँ अपनी-अपनी भूमिका निभाती हैं। कोई शोध में आगे है, कोई प्रशासन में दक्ष, कोई लेखन में प्रतिष्ठित, कोई विद्यार्थियों में लोकप्रिय। इन विविध क्षमताओं का उत्सव होना चाहिए पर प्रायः यही विविधता तुलना का कारण बन जाती है। तुलना से असंतोष जन्म लेता है और असंतोष से ईर्ष्या।
ईर्ष्या का स्वभाव बड़ा विचित्र है। वह सीधे आक्रमण नहीं करती; वह वातावरण को थोड़ा-सा ठंडा कर देती है। संवाद में एक कृत्रिमता आ जाती है, सहयोग में एक औपचारिकता। किसी की उपलब्धि पर तालियाँ तो बजती हैं पर उन तालियों में वह ऊष्मा नहीं होती जो सच्ची प्रसन्नता से आती है। धीरे-धीरे संस्थान का वातावरण गत्यात्मकता खोने लगता है। रचनात्मकता की जगह सतर्कता ले लेती है—कौन क्या कर रहा है, किसे कितना मान मिला, किसका नाम किस सूची में है।
ईर्ष्या का मूल कारण प्रायः असुरक्षा होती है। जब किसी को यह भय होता है कि दूसरे की उपलब्धि उसकी अपनी छवि को धूमिल कर देगी, तब वह अनजाने में प्रतिस्पर्धा को शत्रुता में बदल देता है। वह भूल जाता है कि किसी एक का प्रकाश दूसरे का अंधकार नहीं बनता। संस्थान तो ऐसा दीपमालिकाओं का उत्सव होना चाहिए जहाँ एक दीपक दूसरे से ज्योति ले, न कि उसे बुझाने का प्रयास करे।
कभी-कभी यह ईर्ष्या प्रशासनिक निर्णयों में भी झलकती है। किसी की परियोजना को समर्थन मिलने पर फुसफुसाहटें शुरू हो जाती हैं; किसी की पुस्तक प्रकाशित होने पर मूल्यांकन की कठोर दृष्टि अचानक तीक्ष्ण हो उठती है। आलोचना आवश्यक है पर जब वह निष्पक्ष न रहकर व्यक्तिगत हो जाए, तब वह ईर्ष्या का ही रूप होती है।
सबसे अधिक क्षति तब होती है जब यह भाव विद्यार्थियों या अधीनस्थ कर्मचारियों तक पहुँचता है। वे अनजाने ही खेमों में बाँट दिए जाते हैं। ज्ञान का परिसर राजनीति का परिसर बन जाता है। संवाद की जगह संकेत, सहयोग की जगह संदेह, और स्नेह की जगह दूरी आ जाती है।
ईर्ष्या का एक सकारात्मक पक्ष भी है, यदि उसे पहचाना जाए। वह संकेत देती है कि भीतर कहीं कोई अधूरी आकांक्षा है। यदि व्यक्ति उस आकांक्षा को स्वीकार कर ले और उसे साधना में बदल दे, तो वही ईर्ष्या प्रेरणा बन सकती है। तब वह दूसरे को गिराने की चेष्टा नहीं करेगा, बल्कि स्वयं को ऊँचा उठाने का प्रयास करेगा।
संस्थानों को चाहिए कि वे पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति विकसित करें। उपलब्धियों को सामूहिक उत्सव की तरह मनाया जाए, ताकि किसी एक की सफलता सबकी सफलता लगे। वरिष्ठों का आचरण यहाँ निर्णायक होता है। यदि नेतृत्व निष्पक्ष और उदार हो तो ईर्ष्या की तीव्रता स्वतः कम हो जाती है।
ईर्ष्या मनुष्य की ही छाया है। उसे पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता पर उसकी दिशा बदली जा सकती है। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की यात्रा भिन्न है, उसकी गति और लक्ष्य भिन्न हैं तब तुलना की धार कुंद हो जाती है। संस्थान तब केवल कार्यस्थल नहीं रहते, वे साधना-स्थल बन जाते हैं—जहाँ व्यक्ति अपनी सीमाओं से जूझता है पर दूसरे की सफलता से भयभीत नहीं होता।
ईर्ष्या की धुंध हटते ही संस्थान का आकाश अधिक स्वच्छ दिखने लगता है। वहाँ रचनात्मकता का प्रकाश फैलता है और सहकर्मी प्रतिद्वंद्वी नहीं, सहयात्री प्रतीत होते हैं। तभी किसी भी संस्था की वास्तविक गरिमा सुरक्षित रह पाती है।
ईर्ष्या बाहर से नहीं आती, वह भीतर की अस्वीकृत वेदना से उपजती है। जो स्वयं से संतुष्ट नहीं है, वही दूसरे की उपलब्धि से विचलित होता है। जो अपने श्रम और अपनी दिशा पर विश्वास रखता है, वह दूसरों की प्रगति में बाधा नहीं देखता। संस्थानों में अक्सर पद, प्रतिष्ठा और प्रकाशन की संख्या ही मूल्यांकन का मानदंड बन जाते हैं किंतु मनुष्य केवल उपलब्धियों का जोड़ नहीं होता; वह अपने संघर्षों, अपने एकांत और अपनी जिजीविषा का भी समुच्चय है।
ईर्ष्या की सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति मौन में होती है। एक प्रकार का चयनात्मक मौन—जहाँ प्रशंसा के शब्द जान-बूझकर रोके जाते हैं, जहाँ सहयोग की संभावना होते हुए भी टाल दी जाती है। यह मौन धीरे-धीरे संबंधों में दरार डालता है। संस्थान का वातावरण तब संवादहीनता की ओर बढ़ता है और संवादहीनता किसी भी बौद्धिक परिसर के लिए सबसे बड़ी क्षति है।
कभी-कभी ईर्ष्या आलोचना का वस्त्र पहन लेती है। वह स्वयं को वस्तुनिष्ठता का नाम देती है, पर भीतर से उसकी दृष्टि संकुचित होती है। ऐसी आलोचना में विश्लेषण कम, आरोप अधिक होते हैं। वह रचनात्मकता को परखती नहीं, उसे संदिग्ध बना देती है। धीरे-धीरे प्रतिभाशाली व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित अनुभव करने लगता है और उसकी सृजन-ऊर्जा क्षीण होने लगती है।
संस्थानों में सब कुछ अंधकारमय नहीं होता। वहाँ मित्रताएँ भी जन्म लेती हैं, सहकार की उजली मिसालें भी बनती हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो दूसरों की सफलता में अपना उत्सव देखते हैं। वे जानते हैं कि ज्ञान का संसार सीमित संसाधनों का खेल नहीं है; यहाँ जितना बाँटा जाए, उतना बढ़ता है। ऐसे लोग ही किसी संस्था की आत्मा होते हैं।
ईर्ष्या को समझने के लिए हमें अपनी मनोभूमि में उतरना होगा। जब भी किसी सहकर्मी की उपलब्धि हमें भीतर से चुभे, तो उस चुभन को दबाने के बजाय उससे संवाद करना चाहिए। स्वयं से पूछना चाहिए—क्या यह मेरी अधूरी आकांक्षा है? क्या यह मेरे प्रयासों की कमी का संकेत है? यदि उत्तर ईमानदार हो, तो वही प्रश्न आत्म-विकास का द्वार खोल सकता है।
संस्थानों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, पर वह प्रतिस्पर्धा जो हमें अधिक श्रमशील, अधिक सजग और अधिक सृजनशील बनाए। जब प्रतिस्पर्धा व्यक्तित्व को छोटा करने लगे, तब वह ईर्ष्या का रूप ले चुकी होती है। और जब प्रतिस्पर्धा आत्म-विस्तार का माध्यम बन जाए, तब वह साधना बन जाती है।
संस्थान मनुष्यों से बनते हैं और मनुष्य अपूर्ण हैं। इस अपूर्णता को स्वीकार करना ही समाधान की शुरुआत है। यदि हम अपने सहकर्मियों को प्रतिद्वंद्वी नहीं, सहयात्री समझें—यदि हम यह मान लें कि किसी एक की उन्नति पूरे परिवेश को समृद्ध करती है—तो ईर्ष्या का ताप धीरे-धीरे कम हो सकता है।
संस्थानों की वास्तविक शक्ति उनकी इमारतों या संसाधनों में नहीं, बल्कि उस वातावरण में होती है जहाँ लोग एक-दूसरे के प्रकाश से भयभीत नहीं होते। जहाँ उपलब्धि पर संदेह नहीं, सम्मान होता है। जहाँ संवाद में पारदर्शिता और व्यवहार में उदारता हो। तब ईर्ष्या की छाया भी रहे तो वह मनुष्य को भीतर झाँकने का अवसर दे, न कि बाहर अंधेरा फैलाने का।
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