
मानव सभ्यता की स्मृतियों में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब समय अपने ही कंधों पर ठहरकर पीछे देखता है। उन क्षणों में पृथ्वी का हृदय कुछ अधिक कोमल हो उठता है। स्त्री पर्व उसी कोमलता का उत्सव है। यह किसी तिथि का औपचारिक अंकन नहीं बल्कि जीवन की उस गहरी ध्वनि का स्मरण है जो सदियों से मनुष्य की आत्मा में धीमे-धीमे बजती रही है।
जब पृथ्वी पहली बार अपने भीतर जीवन की हरियाली सँजो रही होगी तब शायद किसी स्त्री की ही तरह उसने अपने गर्भ में अनगिनत संभावनाएँ पाल रखी होंगी। स्त्री और पृथ्वी में यही एक अद्भुत साम्य है—दोनों चुपचाप सृजन करती हैं। दोनों अपने भीतर जीवन के लिए जगह बनाती हैं। दोनों ही अपने श्रम और करुणा से संसार को रहने योग्य बनाती हैं।
मनुष्य की आँख जब पहली बार संसार को देखती है तब वह किसी स्त्री की गोद में ही खुलती है। वही गोद मनुष्य का पहला आकाश होती है। वही स्पर्श पहली भाषा बनता है। शब्दों से पहले जो अर्थ जन्म लेते हैं, वे माँ की उँगलियों की ऊष्मा में ही आकार पाते हैं। इसीलिए मनुष्य की स्मृति के सबसे गहरे कक्ष में एक स्त्री की छाया हमेशा रहती है—मृदु, धैर्यवान और उजली।
स्त्री का होना किसी एक भूमिका का होना नहीं है। वह नदी की तरह है जो पहाड़ों से निकलकर मैदानों तक आती है और रास्ते भर जीवन को हरियाली देती चलती है। कभी वह माँ बनती है, कभी बहन, कभी मित्र, कभी प्रेम। पर इन सब रूपों के भीतर एक ही धारा बहती है—स्नेह की धारा, जो मनुष्य को कठोर होने से बचाती रहती है।
दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार शायद यही है कि स्त्री अपनी साधारण दिनचर्या में असाधारण सौंदर्य रच देती है। सुबह का चूल्हा, चाय की धीमी भाप, बच्चों की नींद से भरी आँखें, आँगन में झाड़ू की लय—इन सबमें एक अदृश्य कविता बहती रहती है। यह कविता किसी पुस्तक में नहीं लिखी जाती; यह जीवन के व्यवहार में लिखी जाती है।
स्त्री का श्रम प्रायः धूप की तरह होता है—हर जगह उपस्थित पर अक्सर अनदेखा। खेत की मेड़ से लेकर रसोई की आग तक, विद्यालय की खिड़की से लेकर दफ़्तर की मेज़ तक, वह चुपचाप जीवन को व्यवस्थित करती रहती है। उसका श्रम किसी घोषणा की तरह नहीं बल्कि एक सतत प्रवाह की तरह दिखाई देता है।
इतिहास के पन्नों में युद्धों और विजयों की कहानियाँ अधिक दर्ज हुई हैं पर जीवन के पुनर्निर्माण की कथा अक्सर स्त्रियों के श्रम से ही लिखी गई है। जब किसी नगर पर आपदा आती है, जब कोई घर टूटता है, जब किसी परिवार की आशा बिखरती है—तब वही स्त्री धीरे-धीरे सब कुछ फिर से समेटती है। जैसे कोई कारीगर टूटी हुई माटी को फिर से आकार दे देता है।
स्त्री केवल करुणा और धैर्य की प्रतिमा ही नहीं है। वह शक्ति की भी एक विराट संभावना है। जब परिस्थितियाँ चुनौती बनकर सामने खड़ी होती हैं तब वही स्त्री अपने भीतर छिपे हुए साहस को पहचानती है। उसकी आँखों में एक ऐसी दीप्ति जगती है जो अंधकार को भी पीछे हटने पर विवश कर देती है।
कभी वह खेत में सक्रिय दिखाई देती है, कभी विद्यालय में ज्ञान की मशाल जलाती हुई, कभी प्रयोगशालाओं में नई खोजों का स्वप्न सँजोती हुई तो कभी आकाश की सीमाओं को लाँघती हुई। वह केवल घर की चौखट तक सीमित नहीं रहती; वह समय के विस्तृत मैदानों में अपने कदमों के निशान छोड़ती चलती है।
उसकी क्षमता केवल स्नेह तक सीमित नहीं है; वह निर्णय भी लेती है, संघर्ष भी करती है और आवश्यकता पड़ने पर इतिहास की दिशा भी बदल देती है। जिस कोमलता में वह जीवन को सँभालती है, उसी कोमलता के भीतर एक दृढ़ शक्ति भी छिपी रहती है।
स्त्री का संसार बाहर से देखने पर सीमित दिखाई देता है पर उसके भीतर एक विराट ब्रह्मांड धड़कता है। घर की चार दीवारों के भीतर भी वह संबंधों का ऐसा विस्तृत आकाश रच देती है जहाँ प्रेम की अनेक दिशाएँ खुलती रहती हैं।
एक थाली में परोसा हुआ भोजन उसके लिए केवल भोजन नहीं होता। वह उसमें अपने दिनभर की थकान, अपनी चिंता, अपनी उम्मीद और अपना स्नेह सब कुछ मिला देती है। इसलिए वह भोजन केवल शरीर को नहीं, मन को भी तृप्त करता है।
स्त्री की चुप्पी एक भाषा होती है। वह कम बोलती है पर उसकी आँखों में अनगिनत कथाएँ तैरती रहती हैं। उसकी प्रतीक्षा में भी एक गहरा संगीत होता है। जैसे रात के सन्नाटे में दूर कहीं नदी बहती रहती है और उसका स्वर धीरे-धीरे पूरे आकाश में फैल जाता है।
जब समय उसे पुकारता है, तब वही स्त्री अपनी चुप्पी से बाहर निकलकर एक दृढ़ स्वर बन जाती है। वह अन्याय के सामने खड़ी हो सकती है, अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा सकती है, और समाज की जड़ताओं को चुनौती दे सकती है।
मनुष्य की सभ्यता यदि एक वृक्ष है तो उसकी जड़ों में स्त्री का धैर्य है। वही जड़ें समय की आँधियों के बीच भी वृक्ष को थामे रहती हैं। पर उस वृक्ष की शाखाओं में जो विस्तार दिखाई देता है, उसमें भी स्त्री की ही ऊर्जा प्रवाहित होती है।
स्त्री जीवन को केवल जन्म ही नहीं देती, वह उसे दिशा भी देती है। बच्चे की पहली मुस्कान से लेकर समाज की पहली चेतना तक—हर जगह उसका स्पर्श है।
जब कोई बच्चा अपनी माँ की उँगली पकड़कर चलना सीखता है, तब वह केवल चलना नहीं सीख रहा होता। वह जीवन की पहली संवेदना सीख रहा होता है। वह यह सीख रहा होता है कि दुनिया में प्रेम भी है, सुरक्षा भी है और एक ऐसा स्पर्श भी है जो भय को दूर कर देता है।
जब वही बच्चा बड़ा होकर संसार में अपने रास्ते बनाता है, तब उसकी स्मृतियों में कहीं न कहीं उस स्त्री की छवि बनी रहती है जिसने उसे चलना सिखाया था।
स्त्री पर्व इसी स्मृति का उजास है। यह उस स्नेह का उत्सव है जिसने मनुष्य को कठोर होने से बचाए रखा है। यह उस शक्ति का भी उत्सव है जिसने समय-समय पर जीवन को नई दिशा दी है।
शाम जब धीरे-धीरे उतरती है और घरों की खिड़कियों में दीपक जलने लगते हैं, तब उस प्रकाश में अक्सर एक स्त्री की परछाईं भी होती है। वही परछाईं घर को घर बनाती है। वही परछाईं संसार को रहने योग्य बनाती है।
जब वह परछाईं प्रकाश में बदल जाती है तब लगता है कि स्त्री केवल जीवन का एक पात्र नहीं है; वह स्वयं जीवन की सबसे कोमल और सबसे समर्थ लय है—एक ऐसी लय जिसमें स्नेह भी है, शक्ति भी है, करुणा भी है और अनंत सृजन की उजली संभावना भी।
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