
समाजवादी कार्यकर्ता होने के नाते, चन्द्रशेखर जी से व्यक्तिगत परिचय होने से पहले ही मैंने उनके बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। वे कांग्रेस पार्टी में थे, जबकि मैं संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का सदस्य था। कांग्रेस-विरोधी होने के कारण मैं उनका भी विरोधी था, परंतु अन्य समाजवादियों से उनके बारे में जो बातें सुनने को मिली थीं, उनके आधार पर मेरे मन में उनके प्रति आदर और सम्मान की भावना बनी रहती थी।
सन् 1974 में जयप्रकाश जी का आंदोलन शुरू हो चुका था। चन्द्रशेखर जी कांग्रेस पार्टी के नेता थे। इन्दिरा जी जयप्रकाश जी के विरोध में थीं, किंतु चन्द्रशेखर जी जे.पी. और इन्दिरा जी के बीच मतभेदों को पाटना चाहते थे। इन्दिरा जी की नापसंदगी के बावजूद उन्होंने अपने घर पर जयप्रकाश जी के सम्मान में एक चाय-गोष्ठी का आयोजन किया। राजनीतिक हलकों में यह एक बड़ी खबर थी।
इसी बीच दिल्ली के कुछ कांग्रेसी नेताओं, जिनमें पी. एन. सिंह प्रमुख थे, ने उनके विचार सुनने के लिए सब्जी मंडी और सरोजिनी नगर में दो जनसभाओं का आयोजन किया। मैं भी उत्सुकतावश उस सभा में पहुँच गया। चन्द्रशेखर जी के भाषण के आरम्भ में ही कुछ इन्दिरा-समर्थक कांग्रेसियों ने यह कहते हुए हंगामा शुरू कर दिया कि “यह जे.पी. का दलाल है।” कुछ ही क्षणों में शोर-शराबा और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। मैं अनायास ही चन्द्रशेखर जी के समर्थन में नारे लगाने लगा।
25 जून 1975 को जब यह पता चला कि आज़ादी के अग्रदूत जयप्रकाश जी को गिरफ्तार करके पार्लियामेंट थाने ले जाया गया है, तो चन्द्रशेखर जी स्वयं उनसे मिलने थाने पहुँच गए। इसी कारण उन्हें भी मीसा के अंतर्गत बंद कर दिया गया। उस दिन मुझे लगा कि चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले नेता हैं।
सत्ता के गलियारों में रहकर सत्ता की बंदरबांट में शामिल हो जाना बहुत आसान होता है, परंतु चन्द्रशेखर जी हमेशा इसके विपरीत रहे। राजनीति के केंद्रीय मंच पर रहते हुए भी सत्ता और पद का लोभ उन्हें विचलित नहीं कर पाया। इन्दिरा जी के केंद्रीय मंत्रिमंडल से लेकर 1977 की जनता पार्टी सरकार तक, जब उनका नाम पहले पाँच मंत्रियों की सूची में था, तब भी उन्होंने मंत्री बनना स्वीकार नहीं किया। इसी तरह वी.पी. सिंह की सरकार में उपप्रधानमंत्री का पद ठुकरा देना उनके त्याग और साहस का अनूठा उदाहरण है। राजीव गांधी की एक संविधानेत्तर टिप्पणी सुनकर प्रधानमंत्री पद से तत्काल इस्तीफा देने की घोषणा कर उन्होंने राजीव गांधी को हक्का-बक्का कर दिया था। भारतीय राजनीति में ऐसे विरल उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।
अन्याय के प्रतिकार के लिए बिना लाभ-हानि का हिसाब लगाए खड़े हो जाना, चाहे उसमें कितना भी जोखिम क्यों न हो, चन्द्रशेखर जी के स्वभाव का हिस्सा था। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जरनैल सिंह भिंडरांवाले के विरोध में ब्लू स्टार ऑपरेशन हो चुका था। चन्द्रशेखर जी ने ब्लू स्टार का विरोध करते हुए कहा कि यह गलत है; हम देश को गोली से नहीं, बोली से सुधार सकते हैं। भारत के शहरी मध्यम वर्ग में उनके इस वक्तव्य के विरोध में भावनाएँ उभरी थीं।
नवंबर 1984 की घटना मैं कभी नहीं भूल सकता। इन्दिरा जी की हत्या के प्रतिशोध में दिल्ली के बेकसूर सिखों का कत्लेआम हो रहा था। दिल्ली धू-धू कर जल रही थी। चन्द्रशेखर जी दिल्ली में ही थे और इन समाचारों से अत्यंत बेचैन थे। सहसा उनका जुझारू समाजवादी रूप जाग उठा। उस समय पास बैठे दस-बारह लोगों और कुछ अन्य साथियों को लेकर वे दिल्ली के सर्वाधिक पीड़ित इलाके भोगल की ओर शांति मार्च के लिए निकल पड़े। भोगल जल रहा था। चारों ओर ईंटों, पत्थरों, बोतलों, लाठियों और तलवारों से हमले हो रहे थे। चन्द्रशेखर जी आगे ही बढ़ते जा रहे थे और हम कार्यकर्ता उनके पीछे “हिंदू-सिख एकता ज़िंदाबाद” के नारे लगा रहे थे। मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों ने कहा, “चन्द्रशेखर जी, आगे मत जाइए, बहुत खतरा है।” परंतु उन्होंने उनकी बात अनसुनी कर आगे बढ़ना जारी रखा। मुझे लगता है कि अगर उस दिन स्वामी अग्निवेश अपने भगवा वस्त्रों में उस जुलूस में न होते, तो कोई भी अनहोनी घट सकती थी।
कई बार हमारे नेता सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में जन-विरोधी नीतियों का समर्थन कर बैठते हैं, जो बाद में बहुत घातक सिद्ध होता है। नई आर्थिक नीतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, मुक्त व्यापार, विनिवेशीकरण आदि के दुष्परिणाम आज जनता भोग रही है। जब नई औद्योगिक नीति प्रारंभ हुई, तब चन्द्रशेखर जी ने उसका विरोध करते हुए चेताया था। उस समय नई आर्थिक नीति से “स्वर्ग का राज” स्थापित होने के सपने बुने जा रहे थे। सरकार और मध्यम वर्ग का घोर विरोध सहते हुए भी उन्होंने नई आर्थिक नीतियों के विरुद्ध अलख जगाई।
समाजवादी नेता राजनारायण जी साधारण गरीब कार्यकर्ताओं और जरूरतमंदों की शिद्दत के साथ मदद करते थे। चन्द्रशेखर जी में भी वैसा ही रूप देखने को मिलता था। उनकी बैठक में यदि कोई धनाढ्य व्यक्ति कीमती शाल-दुशाला ओढ़े विराजमान हो और सामने कोई जरूरतमंद कार्यकर्ता अपर्याप्त वस्त्रों में बैठा हो, तो वे अपनी चिर-परिचित भोजपुरी शैली में बतियाते हुए उसकी गर्म शाल लेकर उस जरूरतमंद कार्यकर्ता को दे देते थे।
समाजवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए चन्द्रशेखर जी बड़े दावे नहीं करते थे, परंतु वास्तविकता कुछ और ही थी। दिल्ली में डॉ. राममनोहर लोहिया समता न्यास की जमीन से लेकर उसके निर्माण तक की जिम्मेदारी चन्द्रशेखर जी ने उठाई। कमल मोरारका के सहयोग से उसका निर्माण संभव हो सका। डॉ. लोहिया का सपना था कि भारत के ठीक बीचोंबीच करोंदी में कोई केंद्र बने। उसी स्थान पर “मनोहर गाँव” के नाम से केंद्र स्थापित कराने का कार्य भी चन्द्रशेखर जी ने ही पूरा किया।
समाजवादी चिंतक मधु लिमये के साथ मिलकर समाजवादी साहित्य न्यास की स्थापना का कार्य भी उन्होंने ही सम्पन्न किया। जवाहरलाल नेहरू म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के भूतपूर्व उपनिदेशक मरहूम डॉ. हरिदेव शर्मा के माध्यम से आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहर अली, डॉ. राममनोहर लोहिया आदि समाजवादी विचारकों के साहित्य को संग्रहित, व्यवस्थित और प्रकाशित कराने में उन्होंने व्यक्तिगत रुचि लेते हुए हर प्रकार का सहयोग सहर्ष दिया। मधु लिमये और डॉ. हरिदेव शर्मा की असामयिक मृत्यु से इस दिशा में बहुत बड़ी क्षति हुई। अन्यथा मधु लिमये, चन्द्रशेखर और डॉ. हरिदेव शर्मा के संयुक्त प्रयास से समाजवादी आंदोलन वैचारिक रूप से बहुत अधिक पुष्ट हो सकता था।
चन्द्रशेखर जी की जीवटता का सुंदर प्रमाण हमें भोंडसी आश्रम के रूप में दिखाई पड़ता है। आज के इस हरे-भरे उपवन को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि कभी यह स्थान किस हालत में था। जब मैं पहली बार वहाँ गया, तो जो दृश्य मैंने देखा वह अत्यंत विरान था—नंगे पहाड़, उबड़-खाबड़ मिट्टी के ढेले, कहीं-कहीं सूखी कीकर की कंटीली झाड़ियाँ, और चारों ओर ऐसा सूना विस्तार कि न पानी, न पक्षी, न जानवर, न इंसान दिखाई देता था।
बाद में इसी बियाबान जंगल में पलाश के वृक्ष के नीचे कुटिया बनाकर, अकेले धूनी रमाकर, बनियान और धोती पहने चन्द्रशेखर जी एक-एक क्यारी में पेड़-पौधे अपने हाथों से लगाते और सींचते रहे। पर प्रश्न यह है कि इस सिंचाई के लिए पानी कहाँ से आया? जंगल को उपवन बनाने के लिए सबसे बड़ी जरूरत पानी की थी। नंगे पहाड़ पर गिरने वाले बरसाती पानी के अतिरिक्त कोई दूसरा साधन नहीं था। वही बरसाती पानी पास के गाँव बादशाहपुर के लिए भी मुसीबत बन जाता था। उसी पानी को, जो पहले उपद्रव मचाता था, पहाड़ के साथ-साथ खाई खोदकर उसमें इकट्ठा किया गया। फिर ठहरे हुए पानी को, जिसे बार-बार जमीन पी जाती थी, रोककर सूखी धरती के पौधों तक पहुँचाने के लिए चन्द्रशेखर जी को कितनी मशक्कत करनी पड़ी होगी, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।
मैंने उनके निजी कक्ष में आचार्य नरेन्द्र देव और जवाहरलाल नेहरू का एक संयुक्त तैलचित्र लगा देखा था। मुझे लगता है कि चन्द्रशेखर जी का व्यक्तित्व संभवतः इन दोनों विभूतियों के समिश्रण से प्रभावित था। नेता पर जब राजनीति हावी हो जाती है, तो वह अहंकारी, आत्मकेंद्रित और अपनी कुर्सी की चिंता में डूबा रहता है; परंतु चन्द्रशेखर जी इसके अपवाद थे। वे न हठी थे, न दुराग्रही। उनमें खाँटी देशी ठसक थी। भाषा और वेश-भूषा में वे पूरी तरह देशज थे। वे बेलौस और बेबाक होकर अपनी बात कहते थे, पर उसमें बड़बोलापन नहीं होता था। असहमति होने पर भी सामने वाले का सम्मान करना उनकी खूबी थी। राजनीतिक रूप से विरोधी होने पर भी व्यक्तिगत स्तर पर उसकी मदद करने का बड़प्पन उनमें था। वे विपरीत परिस्थितियों में भी हताशा और निराशा के शिकार नहीं होते थे।
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Shandaar vyakhya. 👍👏👏👏👏🌺