समाजवादी मूल्यों के प्रणेता मधु लिमये – डॉ अवधेश राय 

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मधु लिमये (1 मई 1922 - 8 जनवरी 1995)
Dr. Awadhesh Kumar Rai
प्रखर समाजवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी मधु लिमये आधुनिक भारत के ऐसे राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और गोवा की मुक्ति दोनों  के लिए संघर्ष किया । वे एक प्रखर सांसद, संविधानविद और समाजवाद के लिए समर्पित नेता थे । उन्होंने  समाजवादी मूल्यों के लिए आजीवन  संघर्ष  किया ।  वे लोहिया जी  के सहकर्मी और सच्चे  अनुयायी थे । वे एक गंभीर चिंतक, अध्येता और प्रखर वक्ता व सच्चे गांधीवादी थे, जिनका गांधी के सत्य और अहिंसा में अटूट विश्वास था । उनका जीवन उच्च मूल्यों वाला सादगीपूर्ण था । उन्होंने भारतीय समाजवादी आंदोलन को एक नई ऊँचाई प्रदान की ।
मधु लिमये का जन्म १ मई ,१९२२ को पुणे में हुआ था । उनके पिता का नाम श्री रामचंद्र महादेव लिमये था । उन्होंने अपनी शुरूआती शिक्षा  मुंबई के राबर्ट मनी स्कूल तथा पूना के सरस्वती मंदिर स्कूल में की । उन्होंने १९३७ में हाईस्कूल की परीक्षा  उत्तीर्ण की व उच्च शिक्षा के लिए पूना के फर्ग्युशन कॉलेज में दाखिला लिया । इसी समय उनका झुकाव समाजवादी विचारधारा के प्रति हुआ । यहीं पर वे आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य बन गए । १ मई १९३७ को १५ वर्ष की आयु में वह ‘मई दिवस’ के आंदोलन में भाग लिए । यहीं पर वे प्रख्यात समाजवादी नेता एस.एम.जोशी, एन.जी.गोरे, साने गुरूजी के संपर्क में आए। ३१ दिसंबर १९३८ को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी के सदस्य बन गए । उस समय एस.एम.जोशी कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी के प्रांतीय जनरल सेक्रेटरी थे । उन्होंने मधु लिमये को युवा कांग्रेस सोशलिष्ट पार्टी का महासचिव बना दिया । सन १९४० में साक्री में लिमये को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध विरोधी भाषण देने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया । उन्हें धूलिया जेल भेज दिया गया जहाँ उनकी भेंट साने गुरूजी से हुई । यहीं पर  उनकी  सान्निधता  गुरूजी से बढ़ी और विचार मंथन भी हुआ । उस समय गुरूजी ४२ वर्ष के थे व मधुलिमये जी मात्र १८ वर्ष के । साने गुरूजी जितने क्रांतिकारी थे, उतने ही विनम्र और उच्च चरित्र के व्यक्ति थे । उनके व्यक्तित्व की छाप मधु जी पर पड़ी । १९३९ में ही समाजवादी आंदोलन के पुरोधा जयप्रकाश नारायण व राममनोहर लोहिया ने पूना का दौरा किया और वे मधु लिमये की प्रतिभा से प्रभावित हुए ।स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने के कारण उनकी शिक्षा बाधित हो गई । उन्होंने १९४० -४५ के बीच चार वर्ष तक जेल में रहें ।
१९४२ के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के शुरूआती दौर में वे भूमिगत होकर अच्यूत पटवर्धन व अरुणा आसफअली के समय आंदोलन चलाते रहे । यहीं  पर उन्होंने ‘क्रांतिकारी’ नाम का एक मराठी पत्र भी निकाला । सितंबर ,१९४३ में उन्हें भारतीय रक्षा कानून के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया  और जुलाई १९४५ में रिहा कर दिया गया । वे १९३८  से लेकर १९४८ तक कांग्रेस पार्टी व कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े रहें लेकिन जब फ़रवरी १९४७  के अधिवेशन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से कांग्रेस शब्द हटा दिया गया, तो वे सोशलिस्ट  पार्टी के उन अग्रणी  नेताओं में से थे, जो पार्टी को मजबूत करने में जूट गये । वे २१ नवंबर १९४७ को यूरोपीय  सोशलिस्ट इंटरनेशनल में भाग लेने के लिए  बेल्जियम गए । वे १९४८ में सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए और डॉ. लोहिया के नेतृत्व वाली विदेश विभाग के सदस्य भी । वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के संयुक्त सचिव बनाए गये । १९५२ में उनका विवाह प्रो. चंपा लिमये से हुआ, जो समाजवादी आंदोलन में भी उनकी सहधर्मिणी थी ।
१९४६ में डॉ. लोहिया द्वारा चलाए गया गोवा मुक्ति आंदोलन, १९५५ में पुनः ‘गोवा मुक्ति समिति’ के द्वारा शुरू किया गया । इस समिति के अध्यक्ष वयोवृद्ध नेता सेनापति बापट थे । इसमें नाना साहेब गोरे, विपिन चौधरी, जगन्नाथ राव जोशी, सुधा ताई व मधु लिमये आदि प्रमुख नेता थे । २५-२६ जुलाई १९५५ को सत्याग्रहियों पर जबर्दस्त आक्रमण किया गया और पुलिस ने बर्बरतापूर्वक पिटाई की । गोवा मिलिटरी ट्रिबूनल ने मधु लिमये को १२ साल की सजा दी लेकिन २५ फरवरी १९५७ को उन्हें १९ महीने बाद छोड़ दिया गया ।
१९५४ में मधु लिमये जी ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ ट्रेड यूनियन की स्थापना की । रेल, डाक, टैक्सी, महानगरपालिका सभी में इनकी यूनियन बनी ।
१ जनवरी १९५६ को हैदराबाद में डॉ. लोहिया ने प्रजा सोशलिस्ट  पार्टी से  अलग सोशलिस्ट  पार्टी की स्थापना की । उस समय मधु लिमये गोवा जेल में बंद थे, इसलिए पार्टी की स्थापना में भाग नहीं ले पाए। १९५८ में इस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए और उन्हीं  की अध्यक्षता में पिछड़ो को विशेष अवसर देने का प्रस्ताव पारित किया गया ।
१९६४ में वे संयुक्त सोशलिस्ट  पार्टी के उमीद्वार के रूप में मुंगेर से सांसद चुने गए । १९६७ में पुनः इसी चुनाव क्षेत्र से संसद में प्रवेश किया और पार्टी के संसदीय दल के नेता बनाए गए ।
मधु लिमये एक प्रखर सांसद व संविधानविद थे । उनकी तेजस्विता से पूरा संसद विशेषकर सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी आंतकित रहती थी कि किस पर उनकी नजर पड़ जाए । वे संसदीय नियम-कानून के व्याख्याकार थे । संसद में मानवाधिकारों व आजादी के लिए संघर्षरत रहे । वे गंभीर चिंतक, अध्येता और राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ थे । मधु जी की पत्नी प्रो. चंपा लिमये  उन के जीवन संघर्षों में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली  योग्य विदुषी व साहसी महिला थी । १९५९ में जब वे सोशलिस्ट पार्टी के चेयरमैन थे तब वे पंजाब में मूल्यवृद्धि के लिए सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार हुए । और उन्होंने पंजाब हाईकोर्ट के हैवियस कारपस  दाखिल किया और हाईकोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी को अवैध ठहराया ।
दूसरी बार ५ नवंबर,१९६८ को लखीसराय (गया) बिहार में धारा १४४ के उल्लंघन पर गिरफ्तार हुए । यहाँ भी उन्होंने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी व कोर्ट ने भी उनकी गिरफ्तारी के अवैध ठहराते हुए उन्हें रिहा किया । मधु लिमये गुटनिरपेक्षता के प्रबल समर्थक थे । वे चाहते थे किसी भी प्रकार के साम्राज्यवादी खेमे से दूर रहना चाहिए तथा राजनीतिक रूप से हर देश को स्वतंत्रतापूर्वक अपना निर्णय लेना चाहिए ।
परमाणु नीति के संबंध में उनका विचार था कि जब तक सभी परमाणु संपन्न देश अपने परमाणु हथियारों को नष्ट नहीं करते तब तक हमें अपना परमाणु कार्यक्रम चालू रखना चाहिए और आत्मनिर्भर बनना चाहिए । जब १९७१ में बांग्लादेश के कारण पूरा विश्व हमारे खिलाफ खड़ा हो गया था तब मधु लिमये ने जयप्रकाश जी को विश्व जनमत को बंगला देश की मुक्ति के लिए जनमत तैयार करने के लिए मनाया और स्वयं भी कई देशों की यात्राएँ की । वे भारत की असहिष्णुता व धर्म निरपेक्षता की नीति के समर्थक थे । इसके अलावा प्रजातांत्रिक मूल्यों, संसदीय संप्रभुता के पोषक थे । उनकी  लोकतंत्र में गहरी आस्था  थी । इसलिए जब इंदिरा गांधी ने पाँचवी लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया तो उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी को कहा कि सरकारी बंगला भी खाली  कर दें  । उन्होंने आपातकाल पूर्व जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए जानेवाले आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग  लिया और जुलाई १९७५ से फरवरी १९१७ तक आपातकाल में जेल काटी ।
जनता पार्टी के गठन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी ।उन्होंने सरकार में मंत्री  बनना अस्वीकार कर दिया और अपनी जगह पर पुरुषोत्तम कौशिक को मंत्री बनवाया । जब जे.पी ने उन्हें गाँधी शांति प्रतिष्ठान  में  कैबिनेट में शामिल होने को  कहाँ  तो उन्होंने कहा , ‘समाजवादी कांग्रेस से बाहर निकले , कारक तत्व तो वही है।‘’ बाद  वे पार्टी के महासचिव बनाए गए । वे लोकसभा में चार बार सांसद रहे (६४-६७), (६७-७१), (७३-७७) को (७७-७९) । जनता पार्टी के विघटन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही ,उन्होंने पार्टी के अंदर दोहरी सदस्यता का प्रश्न उठाया जिससे जनता पार्टी की सरकार गिर गई और १९७९ में  वे जनता (एस) में शामिल हुए, जिसमें राज नारायण और चौधरी चरण सिंह थे । इसके बाद वे लोकदल के भी महासचिव नियुक्त हो गये ।१९८० का  लोकसभा चुनाव उन्होंने जनता (एस )के टिकट पर बांका से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए ।१९८२ में चरण सिंह से मतभेद होने पर उन्होंने  लोकदल(कर्पूरी ) बनाईऔर राजनीति से सन्यास ले लिया । उसके बाद उन्होंने अपना जीवन लिखने – पढ़ने में लगा दिया ।सन १९९० में मंडल कमीशन लागु हुआ तो इस विवाद पर जब सुप्रीम कोर्ट में इंद्रा साहनी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया की  सुनवाई हुई तो  क्रीमी लेयर का मामला लेकर मधुलिमये भी सुप्रीम कोर्ट पहुच गए और कोर्ट ने उनकी बात मान ली ।
मधु लिमये संसदीय लोकतंत्र के पुरोधा थे । वे अपने प्रखर तेजस्विता के कारण संसद में छाए रहते थे, उनके संसदीय ज्ञान  की धाक थी । लोग उन्हें संविधान व संसदीय नियमों की साइक्लोपीडिया बोलते थे । मधु जी सांसदों को मिलने वाली पेंशन के भी खिलाफ थे और अपनी पत्नी को भी कह दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद सरकार से पेंशन का एक रूपया भी  न लें । उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मिलाने वाली पेंशन भी नहीं ली थी । हिंदी, मराठी व अंग्रेजी में उन्होंने १०० से ज्यादा  पुस्तकें लिखी ।  ८ जनवरी १९९५ रात्रि ०९.०५ (रविवार) को ७३  वर्ष की आयु में  उनका निधन राममनोहर लोहिया अस्पताल, नई दिल्ली में हुआ । उनको श्रद्धांजलि देने वालों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री व अन्य गणमान्य लोग थे ।
मधु लिमये भारतीय राजनीति के पुरोधा थे । जिन्होंने देश की आजादी व गोवा मुक्ति के लिए संघर्ष किया । वे समाजवादी धारा के प्रमुख नेता थे तथा समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में प्रमुख रहे । वे आचार्य नरेन्द्र देव ,लोहिया व जयप्रकाश जी  के सहकर्मी रहे । वे सच्चे लोहियावादी नेता थे, जिन्होंने समाजवादी मूल्यों और समतावादी समाज के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया । उनकी जयंती पर सादर नमन।

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