देशज पसमांदा: यथार्थ और वर्तमान स्थिति – डॉ फैयाज अहमद फैज़ी

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Indigenous Pasmanda: Reality and Current Status

Dr. Faiyaz Ahmad Faizi

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक याचिका में ‘पसमांदा’ मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग उठाई गई है। यद्यपि भारतीय संविधान सामान्यतः धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता, फिर भी इस बहस ने यह प्रश्न अवश्य खड़ा किया है कि देशज पसमांदा समुदायों की वास्तविक स्थिति पर गंभीरता से विचार किया जाए।

समय-समय पर गठित सरकारी समितियों ने पसमांदा मुसलमानों के पिछड़ेपन की पुष्टि की है। सच्चर कमेटी (2006) ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया था कि मुस्लिम समुदायों के भीतर एक ‘पदानुक्रम’ है और अधिकांश मुसलमान सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। इसके बाद रंगनाथ मिश्र आयोग ने मुस्लिम समाज के भीतर की जातियों की विशिष्ट समस्याओं को रेखांकित किया। कुंडू कमेटी ने भी इस बात की पुष्टि की कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुँच रहा है, जहाँ इनकी सबसे अधिक आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR) द्वारा समय-समय पर किए गए शोध यह स्थापित करते हैं कि पसमांदा मुसलमानों की स्थिति बदतर बनी हुई है।

इन विषमताओं की जड़ मुस्लिम समाज की जाति-आधारित संरचना में निहित है। यहाँ जाति केवल सामाजिक प्रथा नहीं, बल्कि ‘रक्त की शुद्धता’ और वंशवाद पर टिकी एक गहरी संस्थागत व्यवस्था है। स्वयं को पैगंबर मोहम्मद या अरब मूल से जुड़ा मानने वाला ‘अशराफ’ वर्ग इस ऊँच-नीच को अक्सर धार्मिक व्याख्याओं के पर्दे में छिपा देता है। जब इस पर प्रश्न उठते हैं, तो यह तर्क दिया जाता है कि “इस्लाम में जाति नहीं होती।” विडंबना यह है कि समानता की बात करने वाला यही नेतृत्व पसमांदा आंदोलनों को ‘विभाजनकारी’ बताता है। दरअसल यह शक्ति, संसाधनों और धार्मिक संस्थाओं पर वर्चस्व बनाए रखने की रणनीति है, जो पसमांदा मुसलमानों के बुनियादी मानवाधिकारों का हनन करती है।

पसमांदा मुसलमानों को केवल बाहरी समाज से ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर भी अशराफ वर्ग के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई स्थानों पर दलित मुसलमानों के साथ एक ही गिलास से पानी पीने से इंकार, उन्हें सार्वजनिक जलस्रोतों से दूर रखना, अलग या बचा हुआ भोजन देना और सामाजिक आयोजनों में अलग और नीचे बैठाकर खिलाने जैसी घटनाएँ दर्ज की गई हैं। कई गाँवों में वे अलग बस्तियों में रहते हैं, जिससे सामाजिक दूरी और गहरी हो जाती है। कुछ मामलों में मस्जिदों में उन्हें पीछे की पंक्तियों तक सीमित रखा जाता है, इसलिए कई जगह उन्होंने अपनी अलग मस्जिदें और कब्रिस्तान बनाए, जो जातिगत विभाजन को स्पष्ट करते हैं।

दलित मुसलमानों को अशराफ समूहों द्वारा “नीचा”, “अशुद्ध” या सामाजिक रूप से कमतर समझा जाता रहा है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि अस्पृश्यता” को केवल उसके शाब्दिक अर्थ यानी शारीरिक स्पर्श से बचना तक सीमित कर देना उसके सामाजिक आयामों को संकुचित कर देता है। समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय दृष्टि से अस्पृश्यता एक व्यापक सामाजिक व्यवस्था है, जो केवल शारीरिक दूरी नहीं, बल्कि संरचित अपमान, बहिष्कार और असमानता को संस्थागत रूप देती है।

शिक्षा के स्तर पर देशज पस्मान्दा मुसलमान अन्य सभी सामाजिक समूहों से मीलों पीछे हैं। उच्च शिक्षा (स्नातक, स्नातकोत्तर) में इन समुदायों की भागीदारी नगण्य है। निरक्षरता दर अन्य समूहों की तुलना में अधिक है, और मदरसा शिक्षा तक सीमित रहने का चलन भी अधिक है। तकनीकी शिक्षा और कौशल निर्माण की भारी कमी ने इन समुदायों को आधुनिक अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से बाहर कर दिया है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि जो थोड़े-बहुत युवा शिक्षित हो भी पाते हैं, वे ‘शिक्षित बेरोजगारी’ का शिकार हो रहे हैं। इसके मुख्य कारणों मे विभागों मे पस्मान्दा प्रतिनिधित्व का अभाव,संस्थागत भेदभाव तथा तकनीकी शिक्षा तक पहुँच न होना हैं।यह स्थिति पसमांदा युवाओं में भारी कुंठा पैदा कर रही है और उन्हें असंगठित क्षेत्र में मजदूरी करने या मौसमी प्रवास के लिए मजबूर कर रही है।

आर्थिक दृष्टि से भी पसमांदा मुसलमानों की स्थिति कमजोर बनी हुई है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में इन समुदायों के लोग मुख्यतः असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं। छोटे व्यवसाय, कारीगरी, दिहाड़ी मजदूरी और पारंपरिक पेशे इनके प्रमुख आजीविका स्रोत हैं। नियमित और सुरक्षित रोजगार के अवसर सीमित होने के कारण इनकी आय अस्थिर रहती है। कई परिवारों को आजीविका के लिए मौसमी प्रवास का सहारा लेना पड़ता है। बाल श्रम की अपेक्षाकृत अधिक उपस्थिति भी इसी आर्थिक असुरक्षा का परिणाम है।

जहाँ तक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का प्रश्न

यहाँ भी संकेतक बताते हैं कि पस्मान्दा की स्थिति बदतर हुई है। बच्चों में टीकाकरण की कम दर और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों (जैसे गरीबी-उन्मूलन योजनाएं) तक पहुंच की कमी यह बताती है कि इन समुदायों तक राज्य की कल्याणकारी योजनाएं ठीक से नहीं पहुँच पा रही हैं। ये सर्वविदित है कि स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव एक दुष्चक्र बनाता है जो पीढ़ियों तक इनके पिछड़ेपन को बनाए रखता है।

देशज पसमांदा समाज OBC और ST श्रेणी में शामिल होने के बावजूद सबसे अधिक उपेक्षा का शिकार है। सरकारी सेवाओं में उनका बेहद कम प्रतिनिधित्व एक गंभीर नीतिगत विफलता को दर्शाता है, जो उन्हें सत्ता और निर्णय-निर्माण के केंद्रों से दूर रखता है। संविधानिक दृष्टि से भी यह असमानता चिंताजनक है। इंदिरा साहनी (1992) के फैसले ने अवसरों की समानता के लिए पिछड़े वर्गों के भीतर उप-वर्गीकरण की आवश्यकता को स्वीकार किया था। उत्तर प्रदेश की सामाजिक न्याय समिति (2001) और रोहिणी आयोग ने भी OBC के भीतर असमान वितरण की ओर ध्यान दिलाया। 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा SC में उप-वर्गीकरण को वैध ठहराने के बाद OBC में ‘कोटा-अंदर-कोटा’ की मांग और अधिक न्यायसंगत बनती है। जिससे पसमांदा प्रभावशाली ओबीसी समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।

इन सभी परिस्थितियों से स्पष्ट है कि देशज पसमांदा समुदायों का प्रश्न केवल आर्थिक सहायता या आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक सम्मान, समान अवसर और मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है। इस स्थिति में सुधार के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। सबसे पहले मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद सामाजिक असमानताओं को ईमानदारी से स्वीकार करना होगा और उनके समाधान की दिशा में सकारात्मक संवाद विकसित करना होगा। विभिन्न समितियों की सिफारिशों के अनुसार OBC के भीतर उप-विभाजन लागू करना भी आवश्यक है, ताकि वंचित पसमांदा समुदायों को वास्तविक अवसर मिल सकें। साथ ही शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करनी होगी। अपने अधिकारों और इतिहास के प्रति जागरूक होकर ही पसमांदा समाज स्वतंत्र नेतृत्व विकसित कर सकता है।इसके अतिरिक्त देशज पसमांदा का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के गलियारों में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना अनिवार्य है, ताकि वे केवल ‘वोट बैंक’ न रहकर नीति-निर्धारक बन सकें।सामाजिक न्याय तब ही पूर्ण होगा जब देशज पसमांदा की विशिष्ट चुनौतियों को स्वीकार कर समानता के संवैधानिक सिद्धांत को व्यवहार में उतारा जाए।

लेखक: डॉ फैयाज अहमद फैज़ी
अनुवादक, स्तंभकार ,मीडिया पैनलिस्ट, और पसमांदा सामाजिक कार्यकर्ता हैं


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