सबसे बड़ा जन आंदोलन था बयालीस का भारत छोड़ो आंदोलन

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— अरविंद मोहन —

डॉ. लोहिया मानते थे कि बयालीस के आंदोलन की वर्षगांठ स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस से भी ज्यादा धूमधाम से मनाई जानी चाहिए, क्योंकि असली जन आंदोलन यही था और ऐसी दूसरी मिसाल नहीं है। बाकी दोनों तो सरकारी हिसाब वाले आयोजन हैं।

गौर करेंगे तो हमारे अपने इतिहास में भी दो-तीन ही ऐसे अवसर हैं, जिनसे 9 अगस्त 1942 को शुरू हुए ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की तुलना की जा सकती है। इनमें से दो—असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन—तो उसी गांधी के आह्वान पर हुए थे, जिन्होंने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ और ‘करेंगे या मरेंगे’ का नारा बुलंद किया था। तीसरा अवसर 1857 का है, लेकिन उसमें बहादुरी और जान-माल के नुकसान के बावजूद वह विस्तार और आम लोगों की भागीदारी का वह स्तर नहीं था, जो बयालीस में बिना नेतृत्व, सिर्फ एक आह्वान पर हासिल हुआ था।

पर हमारा मतलब न तो कुर्बानियों को कम गिनना है, न किसी आंदोलन को छोटा बताना। हम सिर्फ बयालीस के महत्व को रेखांकित कर रहे हैं। बयालीस को याद करने के पहले उस समय की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्थितियों को याद करना जरूरी है, क्योंकि उन्होंने इसके स्वरूप को तय करने में भूमिका निभाई और आंदोलन के चरित्र को और निखारा।

देश और कांग्रेस इससे दस-एक साल पहले हुए सविनय अवज्ञा या नमक सत्याग्रह की अच्छी यादों और जख्मों को भुलाते गए थे और आम लोग यह बेचैनी महसूस कर रहे थे कि गांधी ने तो एक साल में आजादी दिलाने की बात की थी, दस साल में भी यह क्यों नहीं आई है और गांधी चुप क्यों हैं।

1937 का चुनाव कराकर सरकार ने प्रांतीय सरकारें बनवाने-गिराने का खेल कर लिया था और लोग सारी सीमाओं के बावजूद कांग्रेसी सरकारों के अच्छे कामों को याद कर रहे थे। हिन्दुस्तानियों को ज्यादा भागीदारी और ‘आजादी’ देने के नाम पर क्रिप्स मिशन भारत आकर खाली हाथ लौट चुका था।

उधर दुनिया दूसरे विश्व युद्ध में फँसी थी, जो नित नया करवट ले रहा था और भारत को अंग्रेजों ने बिना किसी सहमति के युद्ध में झोंक दिया था। हमारे संसाधनों का दुरुपयोग तो हो ही रहा था, हमारे जवानों को मरने के लिए छोड़ दिया गया था, जिससे इस लड़ाई में हमारे सबसे ज्यादा जवान मारे गए, जबकि हमारा इस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था।

और यह भी होने लगा था कि धुरी राष्ट्र जापान का सहयोग पाकर तेजी से हमारी तरफ बढ़ते आ रहे थे। उनके बर्मा जीतने के समय अंग्रेज जिस तरह वहाँ से दुम दबाकर भागे और वहाँ फँसे भारतीयों को जिस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उसकी भी मुल्क में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी।

अंग्रेज पूर्वोत्तर से, बंगाल और ओडिशा ही नहीं, मद्रास तक से अपना कारोबार समेटने लगे थे। महत्वपूर्ण दस्तावेज हटा लिए गए, परिवहन के सारे साधन जब्त हो गए थे, फसलें बर्बाद करा दी गईं, जबकि अकाल की स्थिति थी और बंगाल में भुखमरी शुरू हो गई थी। यह सब इस रणनीति से हुआ था कि हमलावर फौज जब आए तो उसे स्थानीय रूप से हर तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़े। स्थानीय लोगों को क्या तकलीफ होगी, इसका कोई हिसाब नहीं रखा गया। अंग्रेज भारत को सैनिक ठिकाने की तरह और यहाँ के संसाधनों का इस्तेमाल भर करना चाहते थे।

क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद मुल्क गांधी और कांग्रेस का मुँह देख रहा था। सो, 29 अप्रैल से 2 मई 1942 तक इलाहाबाद में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की जो बैठक हुई, वह अचानक बहुत महत्व की हो गई। गांधी तब तक कांग्रेस से पूरी तरह अलग नहीं हुए थे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस की चवन्निया सदस्यता छोड़ दी थी। बैठक का न्यौता उनको भी था, पर वे आए नहीं। उन्होंने अपना प्रस्ताव मीरा बहन के हाथों भेजा।

इसमें बहुत साफ शब्दों में कहा गया था कि अंग्रेजों को देश से चले जाने को कहने के अलावा अब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि अब अंग्रेज हमारी रक्षा करने में भी सक्षम नहीं हैं और उनके चलते हम दुनिया में काफी लोगों के दुश्मन बन गए हैं। हम चाहते हैं कि विश्व युद्ध में फासीवादी ताकतें हारें, लेकिन उसके लिए हम अंग्रेजी गुलामी को चलाते रहने के पक्ष में नहीं हैं।

यह बात वहाँ मौजूद नेताओं को बहुत पसंद न थी। राजेंद्र बाबू, सरदार पटेल और कृपलानी जैसे लोग ही इस आधार पर इसका समर्थन करते लगे कि गांधीजी कह रहे हैं तो मान लेना चाहिए। इस प्रस्ताव पर चर्चा के बाद इसे पास कर दिया गया। पर अगले ही दिन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आजाद पलट गए और कहा कि ऐसा प्रस्ताव कांग्रेस नहीं दे सकती। बात बढ़ी तो उन्होंने इस्तीफे की धमकी दी।

नेहरू और उनके समर्थक पहले भी युद्ध के बीच इस तरह के आह्वान के पक्ष में न थे। उन्हें लगता था कि ऐसे नाजुक वक्त में अंग्रेजों का साथ न दिया गया तो फासीवादी ताकतें जीत जाएँगी। मौलाना अध्यक्ष तो थे ही, कांग्रेसी धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण भी थे और जब जिन्ना तथा लीग ने पाकिस्तान की माँग उठा दी थी, तब उनका इस्तीफा देना परेशानियाँ पैदा करता। सो, प्रस्ताव पर नए सिरे से विचार हुआ और बदलावों के साथ एक नया प्रस्ताव पास किया गया।

इस बीच सुभाष बाबू मुल्क से निकले और जबरदस्त ढंग से उन्होंने विदेश में ही विशाल आजाद हिंद फौज खड़ी कर ली थी। उनका हिंसा-अहिंसा की बहस में भरोसा न था और वे ‘दुश्मन का दुश्मन हमारा दोस्त’ के सिद्धांत पर जापान और धुरी राष्ट्रों की मदद से युद्ध और मुल्क को आजाद कराना चाहते थे। और असहमति के बावजूद गांधी और वे एक-दूसरे के प्रशंसक थे तथा मुल्क में उनके प्रशंसकों की गिनती तो असंभव थी।

एक और जमात है, जिसे तब के नाजी और फासीवादी दर्शन का आकर्षण था और हिन्दू महासभा के नेता बी.एस. मुंजे मुसोलिनी से मिलने पहुँच गए थे। गांधी अपनी राय पर कायम थे कि इस मौके पर अंग्रेजों की मदद से हमें कुछ नहीं मिलने वाला है और हमारी बर्बादी ही होगी। वे भी मित्र राष्ट्रों की जीत की कामना करते थे, लेकिन अंग्रेजों को अब बर्दाश्त नहीं करना चाहते थे।

उनका साफ मानना था कि अंग्रेज चले जाएँ, हम अपने मामले किसी तरह सँभाल लेंगे। वे यह भी मानते थे कि अंग्रेज जाएँगे तो हम पर हमले का खतरा कम होगा, क्योंकि हमसे किसी का बैर नहीं है। और अगर हमला हुआ भी तो हम हर सम्भव तरीके से उसका प्रतिरोध करेंगे। और जो अंग्रेजी शासन की हालत है, उससे ज्यादा अच्छी तरह मुकाबला करेंगे, क्योंकि तब हमारे लोग आजाद भाव से अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने की कोशिश करेंगे।

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक वर्धा में 7 जुलाई को हुई। गांधी ने फिर अपनी वही लाइन दोहराई। इस बार विरोध की पाँत लंबी हुई। मौलाना, नेहरू, पंत के साथ आसफ अली, सैयद महमूद जैसे लोग भी जुड़ गए। राजाजी शुरू से प्रस्ताव के पक्ष में न थे, पर उनका तर्क अलग था।

बैठक तय समय से दो गुना लंबी हुई, एक सप्ताह लगा, लेकिन कार्यसमिति गांधी के तर्कों से सहमत हुई और ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव तथा मुंबई अधिवेशन का एजेंडा पास हुआ। इस बीच गांधी ने वायसराय को सूचना देने और मिलने का समय माँगा, जो कभी नहीं मिला। गांधी अपने सारे आंदोलन सामने वाले पक्ष को सूचित करके ही करते थे।

लिनलिथगो को अपेक्षाकृत नरम प्रशासक माना जाता था, लेकिन ब्रिटेन की पूरी कमान अपने हाथ में ले चुके चर्चिल किसी आंदोलन को कुचलने और गांधी से कुछ निजी खुंदक निकालने की मंशा से काम कर रहे थे। उन्होंने ही आंदोलन को कुचलने और सभी नेताओं की गिरफ्तारी की रणनीति बना ली थी। और हुआ भी वैसे ही।

जैसे अधिवेशन में प्रस्ताव पास हुआ और गांधी ने कुछ सूत्र-वाक्य कहे, सारे नेता गिरफ्तार कर लिए गए। गांधी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ के साथ ‘करेंगे या मरेंगे’ और ‘हर आदमी अपनी इच्छा से अपना काम करने को आजाद है’ का नारा बुलंद किया।

गांधी, कस्तूरबा, महादेव देसाई, मीरा बहन, सुशीला नायर वगैरह को बंबई प्रांत के सबसे बड़े यरवडा जेल में ले जाया गया, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आजाद, नेहरू, पटेल, कृपलानी, शंकर देव, आचार्य नरेंद्र देव, प्रफुल्ल चंद्र सेन, सैयद महमूद, हरेकृष्ण महताब, आसफ अली और पट्टाभि सीतारमैया जैसे नेताओं को अहमदनगर किले में रखा गया। बाहरी दुनिया से इनका संपर्क लगभग काट दिया गया और शुरू में तो यह भी पता न था कि किसे कहाँ ले जाया गया है।

जेल जाते ही महादेव भाई का निधन हो गया तो शव को बाहर न जाने दिया गया और उनकी पत्नी को तीन हफ्ते बाद उनकी मौत की सूचना मिली। बाद में कस्तूरबा की मौत भी वहीं हो गई और उनका अंतिम संस्कार भी जेल में ही हुआ। बल्कि काफी बाद जब गांधी ने 21 दिनों का उपवास शुरू किया तो शासन उनके भी मरने की उम्मीद कर रहा था और उनके अंतिम संस्कार की तैयारी हो गई थी।

गांधी ने जब आह्वान किया तब उनकी उम्र 73 साल थी। सुशीला नायर ने पूरे जेल के समय की बढ़िया डायरी लिखी है, जिसे खुद गांधी ने देखकर पास किया था। यह उपलब्ध है और अंदर की हर घटना का पूरा विवरण उसमें है।

अहमदनगर किला उस हिसाब से शांत रहा और वहाँ नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ लिख ली तो आचार्य जी ने बौद्ध धर्म वाली अपनी किताब और मौलाना ने कुरान का काफी सारा अनुवाद। इस बीच सैयद महमूद माफीनामे पर सक्रिय रहे तो प्रफुल्ल बाबू का पेट मछली न मिलने से गड़बड़ रहा। खैर, शासन के इस तरह के खेल चलते रहे।

दूसरी ओर गांधी के मुँह से भारत छोड़ो का आह्वान निकलते ही देश के करोड़ों लोगों को जैसे जुबान मिल गई—सचमुच करोड़ों लोगों को। वे निकल पड़े।

गांधी जी ने यह भी कह ही दिया था कि जिसको जो मन करे, वह करे, लेकिन ‘करेंगे या मरेंगे’ की बात आजादी तक कायम रहनी चाहिए। लोगों ने थानों पर, रेलवे स्टेशनों पर, सरकारी दफ्तरों पर कब्जा कर लिया। गुस्सा बना रहा तो रेल की पटरियाँ उखाड़ीं, टेलीफोन के तार काटे, कई जगह पुल और सड़कों को उड़ाया, जिससे शासन न चल पाए।

सतारा, मिदनापुर, बलिया और बिहार में कई जगहों पर लोगों ने खुद को आजाद घोषित करने के साथ अपनी सरकारों का गठन कर लिया। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पर छात्रों का कब्जा हो गया। 24 परगना के तीस हजार लोग खुद को अंग्रेजी शासन से दूर ले जाने के लिए समुद्र की तरफ चल पड़े। तभी समुद्री तूफान आ गया। काफी लोग बह गए और जो बचे, उनको भी भारी कष्ट झेलने पड़े।

शासन उनकी मदद क्या करता! तब मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा की सरकार थी, जिसमें फज्लुल हक प्रधानमंत्री और श्यामा प्रसाद मुखर्जी उपप्रधानमंत्री थे। उसने दूसरे लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं, जैसे रामकृष्ण मिशन वगैरह, को भी राहत का काम नहीं करने दिया। नेताजी की फरारी के सवाल पर भी इस प्रांतीय सरकार ने अंग्रेजी हुकूमत की हाँ में हाँ मिलाई। उत्तर-पश्चिम में भी लीग और हिन्दू महासभा की साझा सरकार बनी। लोगों पर इन चीजों से फर्क नहीं पड़ा।

सिंध के प्रधानमंत्री अल्लाह बख्श ने इस्तीफा दे दिया और बाद में शासन ने उनको बर्खास्त कर दिया। जिसे जो समझ आया, उसने उसी तरह शासन को चौपट करने, उससे असहयोग करने और आंदोलन को मदद करने की कोशिश की। वेश्याओं तक के चंदा करने और आंदोलनकारियों को अपने यहाँ छुपाने के किस्से हैं। अमरकांत जी का एक भारी-भरकम उपन्यास इसी विषय पर है और माना जाता है कि वह बलिया की क्रांति और सरकार गठन की पृष्ठभूमि पर है।

जमशेदपुर के मजदूरों ने दस दिनों की हड़ताल कर दी। बंबई, अहमदाबाद और हर औद्योगिक केंद्र पर हड़ताल और उत्पादन ठप हुआ। किसान और छात्र तो आंदोलन की जान ही थे। जिसे जो सूझा, उसने वही किया।

करीब 250 रेलवे स्टेशनों, 150 थानों (तब थाने आज की तरह बड़ी संख्या में न थे, लेकिन शासकीय इकबाल का स्रोत वही थे), करीब 500 डाकघरों पर कब्जा किया गया। और रेल लाइन उखाड़ने तथा टेलीफोन लाइन काटने की घटनाएँ इतने बड़े पैमाने पर हुईं कि महीनों तक रेल सेवा और टेलीफोन सेवा सामान्य न हो पाई।

शासन ने भी जुल्म की इंतहा कर दी। लाठी चलाना, आँसू गैस छोड़ना तो किसी गिनती में न था। अकेले दिल्ली में 47 जगहों पर फायरिंग हुई। यूपी में 29 जगहों पर पुलिस ने गोलियाँ चलाईं और 79 लोग मारे गए। मैसूर के एक जुलूस पर गोलियाँ चलाने से सौ लोग मारे गए।

पटना में जब छात्र सचिवालय बिल्डिंग पर तिरंगा फहराने के लिए चढ़े तो फायरिंग शुरू कर दी गई। एक पर एक आठ लड़के मरे, लेकिन उन्होंने झंडा नीचे नहीं होने दिया। बीएचयू पर सेना की मदद से सरकार ने अपना कब्जा वापस पाया।

सिंध में किशोर क्रांतिकारी हेमू कलाणी को सरेआम फाँसी दी गई। मध्य प्रांत के चिमूर में लोगों ने एक थाने पर हमला किया तो पुलिसवालों के हथियार उठाने पर वे भड़के और चार जवान मारे गए। सरकार ने पूरी बस्ती से बदला लिया। 25 लोगों को फाँसी पर लटका दिया गया, जबकि 26 को आजीवन कारावास की सजा हुई।

और सच कहें तो कहाँ जुल्म नहीं हुआ, यह ढूँढना मुश्किल है। सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ भी कीं, जबकि इस बार 1931 की तरह लोग खुद से गिरफ्तारी देने नहीं आए। करीब नब्बे हजार लोग गिरफ्तार किए गए थे।

सेंसरशिप लागू किया गया। गांधी जी के सभी अखबार बंद हो गए और पुरानी सारी प्रतियाँ जब्त की गईं। कांग्रेस और उससे जुड़ी संस्थाओं के दफ्तरों पर छपे हुए कागज और उनके खाते सील हो गए। खादी और हरिजन उद्धार के नाम पर गांधी और हजारों कार्यकर्ताओं ने किस तरह एक-एक पैसे जमा किए थे, सभी जानते हैं, पर सब कुछ आंदोलन की भेंट चढ़ गया।

हम लोग एक बार जब ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में काम करते समय उसके पुराने अंक ढूँढ रहे थे, तब हमें नौ अगस्त के बाद के कई अंक नहीं दिखे। हमें अपने आर्काइव पर भरोसा था। बाद में पता चला कि नौ के बाद लगभग एक हफ्ते तक अखबार ही नहीं निकल पाया, क्योंकि सभी प्रमुख लोग गिरफ्तार कर लिए गए थे। ऐसा देश के काफी अखबारों के साथ हुआ। कई जगह होशियार कांग्रेसियों और खादी कार्यकर्ताओं ने अपने कुछ पैसे और स्टॉक को छुपाया भी था।

जाहिर तौर पर यह आंदोलन गांधी के आह्वान पर हुआ था, लेकिन पुराने मानकों से पूरी तरह गांधीवादी न था। अंग्रेजों ने पहले तो गांधी की बात नहीं सुनी और फिर आंदोलन को दबाना चाहा। जब वह भी नहीं हुआ तो आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश शुरू हुई।

पहले गांधी पर दबाव बनाया गया कि वे आंदोलन की हिंसा की निंदा करें, क्योंकि वे तो शांति के पुजारी हैं। गांधी का जवाब था कि मुझे बाहरी दुनिया से काट दिया गया है और मुझे बाहर की सही खबर नहीं मिलती। दूसरे, शासन की तरफ से जितनी हिंसा खुलेआम हुई है, पहले उसकी निंदा जरूरी है। सरकार को यह जवाब भला क्यों पसंद आता!

उसने ‘टोटेनहेम बुकलेट’ नामक एक प्रकाशन किया, जिसमें आंदोलन और गांधी को बदनाम करने के लिए झूठ का पुलिंदा प्रस्तुत किया गया। गांधी ने इसका भी बहुत करारा जवाब बिंदुवार ढंग से दिया। तुरंत जवाहरलाल जी ने आंदोलन के सारे कदमों को अपने ऊपर लेते हुए एक बयान दिया।

एक प्रयास गोपनीय ढंग से अंग्रेजी प्रचार का जवाब देने का भी हुआ, क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत की सच्चाई को दुनिया के सामने लाने की जरूरत थी। और इसके सूत्रधार थे गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी। ‘इंडिया रैवेज्ड’ नामक इस किताब का प्रकाशन गोपनीय ढंग से हुआ और अमेरिकी राजदूत की मदद से इसे देश के बाहर भेजने का इंतजाम हुआ, जिससे दुनिया भर में, खासकर अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ से, अंग्रेजों की थू-थू होने लगी।

पर आंदोलन दो-चार दिन नहीं चला। कई इलाके तो साल भर से ज्यादा शासन के सीधे नियंत्रण से बाहर रहे, तो बाकी में भी छह-सात महीने तक शासन को होश नहीं आया। ऐसा गांधी के लंबे प्रशिक्षण से निकले कार्यकर्ताओं की वजह से तो हुआ ही, आंदोलन के संचालन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के लोगों की भागीदारी और उनके नेताओं के भूमिगत रहकर काम करने के निर्णय का भी हाथ था।

शुरू में लोहिया, अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन, एस. एम. जोशी वगैरह ही सक्रिय रहे। कांग्रेसियों में सुचेता कृपलानी ने भी भूमिगत रहते हुए काफी काम किया। समाजवादी जमात ने पर्चे, बुकलेट से लेकर रेडियो स्टेशन तक चलाया, जिसे कॉलेज की छात्रा उषा मेहता चलाती थीं। बंबई की एक दुधिया बस्ती के निकट ‘मूषक भवन’ नाम से उन्होंने अपना एक अड्डा बना लिया था, जिसे काफी समय बाद अंग्रेजी खुफिया पुलिस ढूँढ पाई।

जल्दी ही इस मंडली से जयप्रकाश नारायण भी जुड़ गए, जो हजारीबाग जेल से भागकर निकले थे। पहले वे और उनके साथी नेपाल पहुँचे और वहाँ लोहिया भी आ मिले। हथियारों समेत हर तरह के प्रशिक्षण का कार्यक्रम भी चला। पर अंग्रेजी हुकूमत के दबाव में नेपाल सरकार ने कार्रवाई की और ये सब भागे। बाद में हुई गिरफ्तारी के बाद लोहिया को लाहौर जेल में रखा गया और उनको बहुत यातना दी गई।

कभी अपने निजी जीवन या सुख-दुख पर चर्चा न करने वाले लोहिया ने इस अनुभव को लिखा है। रात-रात भर जगाना, तेज रोशनी आँखों पर डालना, बेमतलब बातें करना या एकदम अकेले रखकर उनको पागल बनाने का प्रयास किया गया। इसी चक्कर में उनकी नजर कमजोर हो गई, दाँत खराब हो गए।

इस समाजवादी जमात ने न सिर्फ आंदोलन को जिंदा रखने और हुकूमत को बेचैन रखने की कोशिश की, बल्कि कुछ नए सिद्धांत भी गढ़े। इसका मानना था कि सिर्फ जान लेना हिंसा है। तोड़-फोड़ या ऐसा कोई भी कृत्य हिंसा के दायरे में नहीं आता, जिससे किसी की जान न जाती हो।

ऐसे पर्चे नियमित अंतराल पर बाँटे गए, जिनमें बम बनाने तक की विधि बताने से लेकर गोरी पलटन को डराने के अन्य कारगर नुस्खे बताए गए। जैसे यह पर्चा काफी प्रभावी हुआ कि अंग्रेज बहुत डरपोक कौम हैं। जब वे गाँव या आपके इलाके की तरफ आते दिखें तो नगाड़े बजाइए, शोर मचाइए, पुआल-भूसे के ढेर में आग लगा दीजिए, जिससे उनको लगे कि सारे लोग हमला करने के लिए तैयार बैठे हैं। इस तरह से काफी इलाकों से अंग्रेज खदेड़े भी गए। जब शासन थोड़ा निश्चिंत होता था, ऐसे पर्चे बँट जाते थे। शासन इन पर्चों से आतंकित रहता था। और यह क्रम लंबा चला।

पर आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत ने सात-आठ महीने से लेकर सवा साल तक के अंदर सारे इलाकों पर अपना शासन तो वापस कर लिया, लेकिन अब यह पूरा राज ही बिना जड़ का बन गया था। और इसके आगे की बातचीत सिर्फ सत्ता सौंपने, षड्यंत्र से विभाजन कराने, हिन्दू-मुसलमान दंगे, किसी नेता को चढ़ाने तो किसी को गिराने की रही।

मित्र राष्ट्रों की जीत, इंग्लैंड में शासन का बदलाव और दुनिया भर के दबाव ने भी अपनी भूमिका निभाई, लेकिन हर आदमी हैरान रहा कि अकेले गांधी ने मुल्क की नब्ज को जिस तरह पहचाना और सचमुच के अकेले प्रयास से कांग्रेस को राजी करके आंदोलन का आह्वान किया, वह क्या चीज थी।

तब के सारे नेता जमीन से जुड़े थे, आज के नेताओं की तरह हवा में राजनीति नहीं होती थी। लेकिन कोई भी जनता का मन जानने में सफल नहीं हुआ। एक तरह से गिरफ्तारी उनके लिए रक्षक ही बन गई। यह बात सिर्फ अटकल की है।

जिन तर्कों से वे गांधी से सहमत हुए थे, उनका अपना महत्व था और हर लोकतांत्रिक पार्टी की तरह कांग्रेस में भी अक्सर अलग-अलग लाइन दिखती थी, लेकिन फैसला हो जाने पर सर्वोच्च कमांडर के आदेश का पालन सब करते थे। पर इससे ज्यादा साफ दूसरी चीजें दिखीं, जिनकी कमी क्यों हुई है, यह हैरानी का विषय है। एक तरफ गांधी और देश का आम मानस था।


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