वंदे मातरम् और कांग्रेस की विरासत!

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Vande Mataram and the Congress's legacy!

Gurdeep Singh Sappal

— गुरदीप सिंह सप्पल —

स्कर फर्नांडिस लगभग चार दशकों तक कांग्रेस संगठन के एक बड़े स्तंभ रहे। उन्होंने चुपचाप कई पीढ़ियों के युवा कांग्रेसियों को गढ़ा और सँवारा। अक्सर जब कोई छात्र या युवा नेता उनके पास पार्टी में किसी पद के लिए आता था, तो वे पहले उससे एक काम करने को कहते थे। वे कहते थे, पहले वंदे मातरम् गाओ। उनके लिए राष्ट्रगीत और कांग्रेस की विचारधारा एक ही धारा के दो किनारे थे। उनके अनुसार, कोई व्यक्ति तब तक पार्टी के किसी पद की आकांक्षा नहीं कर सकता, जब तक उसे राष्ट्रगीत का गौरव महसूस न हो।
अब जरा आज वंदे माँतरम के मौजूदा संदर्भ में इस परंपरा को समझिये। जो कांग्रेस अपने अधिवेशनों में वंदे मातरम् गाती है, जिस कांग्रेस ने इसे राष्ट्रगीत के रूप में अपनाया, जिस कांग्रेस ने यह सुनिश्चित किया कि संसद और विधानसभाओं का हर सत्र इसी गीत के साथ समाप्त हो, उसी कांग्रेस को आज वंदे मातरम् विरोधी बताया जा रहा है। इस से बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है।

1937 : उस दौर का महत्व

1937 में कांग्रेस के नेताओं ने तय किया था कि वंदे मातरम् के दो छंद गाये जाएँगे। इन नेताओं में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल शामिल थे, और इनके साथ रवींद्रनाथ टैगोर भी थे।

उस दौर का संदर्भ बहुत मायने रखता है, जो तुष्टीकरण के आरोप को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है। 1937 वही वर्ष था जब कांग्रेस ने आज़ादी से पहले हुए प्रांतीय चुनावों में जबरदस्त जीत हासिल की, और मुस्लिम लीग बुरी तरह हार गई। लीग तो मुस्लिम बहुल प्रांतों में भी अपना दबदबा नहीं बना पाई। यही वह दौर था जिसे इतिहासकार रास्तों के अलग होने का दौर कहते हैं। दो दशकों के टकराव के बाद कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच आखिरी निर्णायक भिड़ंत शुरू हो चुकी थी। जिन नेताओं ने वंदे मातरम् को दो छंदों तक सीमित किया, वे लीग के सामने झुक नहीं रहे थे। वे तो लीग से लड़ रहे थे, विचार में, कार्यक्रम में और राजनीति में, और जीत भी रहे थे।

आज उन्हीं कांग्रेसी नेताओं की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाया जा रहा है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और मुस्लिम लीग से लड़े। और यह सवाल वह पार्टी उठा रही है जिसका वैचारिक परिवार, यानी आरएसएस और हिंदू महासभा, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के साथ खड़ा था और मुस्लिम लीग के साथ साझेदारी करता था।

1937 के चुनावों के बाद, उन्हीं वर्षों में जब कांग्रेस मुस्लिम लीग से लड़ रही थी, सावरकर के नेतृत्व वाली हिंदू महासभा तीन प्रांतों में मुस्लिम लीग की गठबंधन साझेदार थी। ये प्रांत थे, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत और बंगाल।

आज के भाजपा नेता, जो आरएसएस और हिंदू महासभा के अंग्रेज परस्त रिकॉर्ड के उत्तराधिकारी हैं, उनमें अब यह दुस्साहस है कि वे उन्हीं कांग्रेसी नेताओं की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाएँ जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व किया। वे कांग्रेस की वंदे मातरम् की विरासत को खत्म करना चाहते हैं। इसके लिए वे मनमाने ढंग से गीत का एक लंबा रूप सामने ला रहे हैं और उसे भारत के लोगों पर और भारत के इतिहास पर थोपना चाहते हैं। लेकिन कट्टरपंथी चाहे जितना जोर लगा लें, या सत्ता में बैठे लोग चाहे जितना इतिहास को पोतने की कोशिश कर लें, ऐतिहासिक तथ्य नहीं बदलते।
परंपरा 1896 में शुरू होती है

1896 से लेकर आज तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन वंदे मातरम् से शुरू होते आए हैं, और यह परंपरा आज भी जारी है। यह रवींद्रनाथ टैगोर ही थे जिन्होंने इस गीत को पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया, 1896 के कलकत्ता अधिवेशन में। उन्होंने केवल गाया ही नहीं, बल्कि इसे एक धुन भी दी। और उस अधिवेशन की अध्यक्षता रहीमतुल्ला सयानी ने की, जो एक मुसलमान थे। यह एक तथ्य ही उनके लिए काफी है, जो इस गीत को एक समुदाय के खिलाफ दूसरे समुदाय का हथियार बनाना चाहते हैं।
कांग्रेस द्वारा विधिवत अपनाने के बाद यह गीत साहित्य से निकलकर सड़कों पर आ गया। 1905 के बंगाल विभाजन के बाद, स्वदेशी आंदोलन के दौरान, वंदे मातरम् एक जन नारा बन गया। यह जुलूसों और मार्च में गूँजा, पर्चों पर छपा और फाँसी के तख्ते तक इसे क्रांतिकारी ले जाने लगे। सीधे शब्दों में कहें तो यह स्वतंत्रता आंदोलन का एक कांग्रेसी रणघोष था।

1907 में जब भीकाजी कामा ने स्टटगार्ट में राष्ट्रीय ध्वज का एक शुरुआती रूप फहराया, तो उस पर वंदे मातरम् शब्द सिले हुए थे। वह ध्वज और वंदे मातरम् का वह रणघोष, दोनों कांग्रेस की विरासत हैं।

1946 में गुवाहाटी में जब महात्मा गांधी ने जय हिंद अभिवादन को स्वीकृति दी, जिसका इस्तेमाल सबसे पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया था, तब भी उन्होंने सावधानी से कहा कि जय हिंद को वंदे मातरम् की जगह नहीं लेना चाहिए। उन्होंने दशकों के उस भावनात्मक भार को रेखांकित किया जो इस गीत के साथ जुड़ा था। एक नए नारे को आशीर्वाद देते समय भी गांधी ने पुराने नारे की रक्षा की।

गांधी खुद इस गीत को लेकर सावधानी भी बरतते थे। वे इसके अंधभक्त कभी नहीं रहे। 1 जुलाई 1939 को हरिजन में लिखते हुए उन्होंने कहा था कि वंदे मातरम् वहाँ नहीं गाया जाना चाहिए जहाँ लोग न चाहते हों। अपने रचनात्मक कार्यक्रम में उन्होंने छात्रों से कहा था कि वे इसे दूसरों पर न थोपें। इसलिए 1946 में इसका बचाव करना कोई बहुसंख्यकवादी जिद नहीं थी। यह एक ऐसे व्यक्ति की बात थी जो गीत के भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व को समझता था, और इसे विरासत के रूप में सँभालना चाहता था, पर किसी के खिलाफ हथियार नहीं बनने देना चाहता था। उन्होंने एक साथ दो बातें थामी हुई थीं, पुराने गीत को विस्मृत होने से बचाना, और उसे कभी किसी अनिच्छुक व्यक्ति पर न थोपना।

बराबरी का दर्जा 1950 में मिला, आज नहीं

यह अमित शाह या नरेंद्र मोदी नहीं हैं जो आज वंदे मातरम् को बराबरी का दर्जा दे रहे हैं। यह तो छिहत्तर साल पहले तय हो चुका था। यह बाबू राजेंद्र प्रसाद ने किया था, जो संविधान सभा के अध्यक्ष थे और बाद में भारत के पहले राष्ट्रपति बने। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की आखिरी बैठक में उन्होंने अध्यक्ष की कुर्सी से घोषणा की कि जन गण मन राष्ट्रगान होगा, और फिर ये निर्णायक शब्द जोड़े कि वंदे मातरम्, जिसने भारत की आज़ादी की लड़ाई में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे जन गण मन के बराबर सम्मान दिया जाएगा और उसका दर्जा भी बराबर होगा। रिकॉर्ड बताता है कि इस घोषणा का तालियों से स्वागत हुआ और किसी भी सदस्य ने कोई आपत्ति नहीं की।वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत का सम्मान आज़ादी के बाद से मिलता रहा है, क्योंकि कांग्रेस के नेता ने इस बारे में बात की और कांग्रेस के ही नेतृत्व वाली पूरी संविधान सभा ने इसका समर्थन किया और तालियाँ बजाईं।

भाजपा, जिसकी वैचारिक जड़ आरएसएस है, इसमें कहीं शामिल नहीं थी। फिर भी आज वह राष्ट्रगीत को हथियाना चाहती है, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन से अपनी अनुपस्थिति को छिपा सके। उसमें यह दुस्साहस है कि वह यह कहे कि प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, महात्मा गांधी, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, डॉ राजेंद्र प्रसाद और आचार्य नरेंद्र देव, ये सब गलत थे।

अगर भाजपा आज यह दावा करती है कि वंदे मातरम् के केवल दो छंद गाना राष्ट्रविरोधी है, तो असल में वह इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को राष्ट्रविरोधी घोषित कर रही है। वह ठीक यही कर रही है। इतिहास को व्हाइटवॉश कर रही है।

स्वतंत्रता आंदोलन में कौन कहाँ था

अगस्त 1942 में जब कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तब सावरकर के नेतृत्व वाली हिंदू महासभा ने खुलकर उसका विरोध किया और आधिकारिक रूप से उसका बहिष्कार किया।

सावरकर ने अपने समर्थकों को एक पत्र जारी किया, जिसका शीर्षक था ‘Stick to your posts’ यानि अपने पदों पर बने रहो। इसमें उन्होंने उन हिंदू सभाइयों को निर्देश दिया, जो नगरपालिकाओं, स्थानीय निकायों, विधानमंडलों या सेना में थे, कि वे अपने पदों पर बने रहें और आंदोलन में शामिल न हों।

इसी दौर में हिंदू महासभा ब्रिटिश सेना में हिंदुओं की भर्ती के अभियान चला रही थी। यह वही ब्रिटिश सेना थी जो सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज के खिलाफ भी लड़ी। हिंदू महासभा के मदुरै अधिवेशन में सावरकर ने ब्रिटिश सेना में एक लाख हिंदुओं की भर्ती कराने की सफलता की रिपोर्ट पेश की थी।

उन्हीं वर्षों में हिंदू महासभा तीन प्रांतों में मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में साझेदार थी, बंगाल, सिंध और उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत।
बंगाल में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो बाद में जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष बने, फजलुल हक की सरकार में एक वरिष्ठ मंत्री थे। जनसंघ भाजपा का ही पुराना रूप था।

26 जुलाई 1942 को बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर को लिखे एक पत्र में मुखर्जी ने लिखा कि फजलुल हक की सरकार, अपने सहयोगी हिंदू महासभा के साथ मिलकर, प्रांत में भारत छोड़ो आंदोलन को हराने की हर संभव कोशिश करेगी। उन्होंने इसके लिए एक ठोस प्रस्ताव भी रखा।

एक गीत, दो मकसद

असली फर्क यहीं छिपा है। 1947 से पहले इन्हीं तीन शब्दों के दो अलग अलग अर्थ थे। कांग्रेस के हाथों में वंदे मातरम् एक ऐसी मातृभूमि का अभिवादन था, जो साकार तो थी पर समावेशी थी। इसे दो छंदों तक इसीलिए सीमित रखा गया, ताकि हर भारतीय इसे साझा कर सके। वंदे मातरम् का नारा विदेशी शासन से आज़ादी के लिए एक रणघोष था।

संघ परिवार, जो हिंदू महासभा और आरएसएस की कोख से निकला, उसने वंदे मातरम् का इस्तेमाल कभी आज़ादी की लड़ाई के लिए नहीं किया। उसने इस गीत का इस्तेमाल भारत के लिए एक सांप्रदायिक पहचान गढ़ने और सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने के लिए किया। और आज भी वह इसे इसी मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। कांग्रेस के लिए यह ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ भारतीयों को एकजुट करने का नारा था। दूसरे के लिए यह धीरे धीरे एक सांप्रदायिक पहचान का निशान बनता चला गया।

इसीलिए दो छंदों वाले संस्करण को राष्ट्रविरोधी बताने की आज की कोशिश इतनी कुछ उजागर कर देती है। अगर 1937 में चुना गया संस्करण गाना राष्ट्रविरोधी है, तो गांधी, टैगोर, नेहरू, पटेल, आज़ाद और राजेंद्र प्रसाद भी राष्ट्रविरोधी थे। दो छंदों वाले वंदे मातरम् को नाजायज ठहराना, दरअसल आज़ादी के शिल्पकारों को राष्ट्रविरोधी घोषित करना है। यह एक ऐसी बेतुकी बात है जो केवल सत्ता मद में चूर लोग ही कहने का दुस्साहस कर सकते हैं।
विरासत बनी रहती है

सत्ता में बैठे लोग इतिहास को अपने ढंग से घुमा सकते हैं, पर इस घुमाव से तथ्य नहीं बदलते। कांग्रेस ने वंदे मातरम् का विरोध नहीं किया। उसने इस गीत को एक बंगाली उपन्यास से निकालकर एक राष्ट्रीय आंदोलन के हृदय तक पहुँचाया, उसे एक धुन दी, उसे पहले राष्ट्रीय ध्वज पर छापा, उसे जेल में और फाँसी के तख्ते की ओर जाते हुए गाया, और संविधान सभा में उसे बराबरी का दर्जा दर्ज किया। कांग्रेस के लिए वंदे मातरम् कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे 2026 में हथियाया जाए। कांग्रेस के लिए यह स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत है, उसके इतिहास का हिस्सा है और उसकी राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है।

यह ऐसी ही बनी रहेगी, उसी रूप में जो 1937 में तय हुआ था, आरएसएस चाहे जितनी कोशिशें कर ले।


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